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गुरुवार, 11 जून 2020

Stock exchange   -

http://www.clearknowledges.com/2020/06/Stock-exchange-kya-hai-ye-kaise-kary-krta-hai.html?m=1


 normally जैसे हम किसी मंडी को ले लेते है वहाँ एक सब्जी बेचने वाला रहता है और buyers सब्जी buy करने जाता है 
तो यहाँ मंडी एक ऐसा प्लेटफार्म है जो buyers और sellers को मिलाने का काम करता है 

जो एक unorganized market  है 
अब  आप  इसी के उदाहरण से stock exchange को easily समझ पाएंगे |

Stock exchange एक organized market है जो buyers और sellers को एक platform प्रदान करता है इस platform पर trader stocks को खरीद और बेच सकते  है 
शेयर का मतलब होता है हिस्सा. बाजार उस जगह को कहते हैं जहां आप खरीद-बिक्री कर सकें.

  • अगर शाब्दिक अर्थ में कहें तो शेयर बाजार (Stock Market) किसी सूचीबद्ध कंपनी में हिस्सेदारी खरीदने-बेचने की जगह है. भारत में बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) नाम के दो प्रमुख शेयर बाजार हैं.

BSE या NSE में ही किसी लिस्टेड कंपनी के शेयर ब्रोकर के माध्यम से खरीदे और बेचे जाते हैं. शेयर बाजार (Stock Market) में हालांकि बांड, म्युचुअल फंड और डेरिवेटिव का भी व्यापार होता है.
Stock exchange एक secondary market  है  |


Secondary market क्या है? 
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साधारण भाषा में समझे तो जैसे हम किसी शेयर को buy करते है तो stock exchange के पास जाते है क्युकी वह एक platform है जहा हम शेयर का trade करते है 


इस मार्केट में किसी लिस्टेड कंपनी के शेयरों की खरीद-बिक्री होती है. इस बाजार में किसी व्यक्ति के पास मौजूद शेयर बाजार भाव पर कोई दूसरा व्यक्ति रियल टाइम में खरीदता है. आमतौर पर यह खरीद-बिक्री किसी ब्रोकर के जरिये होती है. सेकेंडरी शेयर मार्केट के जरिये ही किसी निवेशक को यह सुविधा मिल पाती है कि वह अपने शेयर किसी और व्यक्ति को बेचकर बाजार से बाहर निकल सकता है.

मसलन, टाटा स्टील के शेयरों का भाव अभी 230 रुपये है. कोई व्यक्ति इन शेयरों को मौजूदा बाजार भाव पर खरीदना चाहता है. उस समय कोई व्यक्ति इन शेयरों को इसी भाव पर बेचना भी चाहता होगा. ब्रोकर खरीदने वाले के लिए बाय आर्डर देकर और पैसे चुकाकर उस निवेशक के लिए इसे खरीद लेता है. इस तरह एक नया निवेशक उस कंपनी में हिस्सेदार बन जाता है.
Stock exchange पर share buy और sell दोनों किया जा सकता है इसीलिए हम इसे secondary market कहते है |

Shares को buy करने के लिए mainly 2 stock exchange है 
1.NSE
2. BSE
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1.NSE (national stock exchange ) –

नेशनल स्टॉकएक्सचेंज  india का   सबसे बड़ा और तकनीकी रूप से अग्रणी stock exchange है  । यह मुंबई में  स्थित है। इसकी स्थापना 1992 में हुई थी। कारोबार के लिहाज से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है। इसके वीसैट (V-SAT) टर्मिनल india के  320 शहरों तक फैले हुए हैं। एनएसई देश में एक आधुनिक और पूरी तरह से स्वचालित स्क्रीन-बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम प्रदान करने वाला पहला एक्सचेंज था। एनएसई की इंडेक्स- निफ्टी 50 है 

2.BSE (bombey stock exchange ) –


मुंबई स्टॉक एक्सचेंज भारत  और एशिया  का सबसे पुराना stock exchange है  । इसकी स्थापना 1875 में हुई थी। इस एक्सचेंज की पहुंच 417 शहरों तक है। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज भारतीय share market में  दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है | भारत को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार में अपना श्रेष्ठ स्थान दिलाने में बीएसई की अहम भूमिका है 
BSE का index सेंसेक्स है 

शेयर खरीदने का मतलब –

मान लो NSE में listed कोई company अपना 10 लाख  शेयर जारी करती है  उस company के प्रस्ताव के अनुसार आप अपना शेयर खरीद लेते हो तो company के उतना मालिकाना हक आपको प्राप्त हो जाता है 
आप उस शेयर को ज़ब चाहे बेच सकते हो |

Stock exchange के गुण

स्टॉक एक्सचेंज के साथ लिस्टिंग से कंपनी की प्रतिभूतियों के लिए विशेष विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।  उदाहरण के लिए, केवल सूचीबद्ध कंपनी के शेयरों को स्टॉक एक्सचेंज में उद्धृत किया जाता है।

 प्रतिष्ठित स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होना कंपनियों, निवेशकों और आम जनता के लिए फायदेमंद माना जाता है 

आप  शेयर बाजार में निवेश की शुरूआत कैसे कर सकते है?
 
आपको सबसे पहले किसी ब्रोकर की मदद से डीमैट अकाउंट खुलवाना होगा. इसके बाद आपको डीमैट अकाउंट को अपने बैंक अकाउंट से लिंक करना होगा.

बैंक अकाउंट से आप अपने डीमैट अकाउंट में फंड ट्रांसफर कीजिये और ब्रोकर की वेबसाइट से खुद लॉग इन कर या उसे आर्डर देकर किसी कंपनी के शेयर खरीद लीजिये.

इसके बाद वह शेयर आपके डीमैट अकाउंट में ट्रांसफर हो जायेंगे. आप जब चाहें उसे किसी कामकाजी दिन में ब्रोकर के माध्यम से ही बेच सकते हैं.


मंगलवार, 31 मार्च 2020

MFI क्या है? 

Microfinance institutions kya hai?

 बड़े-बड़े बैंक की स्थापना होने के बाद भी जब रीजनल रूरल बैंक  की स्थापना की गई फिर भी ग्रामीणों को यह लाभ नहीं पहुंचा पा रही थी

 गांव की गरीब और वंचित लोगों को महा जनों से ऋण अधिक ब्याज दर पर लेना पड़ता था

 यह सब देखते हुए सूक्ष्म  वित्तीय संस्थाओं का गठन किया गया.
   सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं बड़े बड़े बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण लेकर ग्रामीणों को कम ब्याज दर पर ऋण प्रदान  करते है.
ग्रामीण इस ऋण की अदायगी सप्ताह या महीनो में करते है

सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं सिर्फ ऋण दे सकती है.

इस प्रकार  सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं ग्रामीण  क्षेत्र की NBFC है

इस प्रकार RBI द्वारा निर्धारित सर्त जैसे Rbi ने सभी वाणिज्यिक बैंको पर चाहे वो देशी हो या विदेशी को अपने ऋण का 40 % ऋण प्राथमिक क्षेत्र देयता में देने के लिए निर्धारित किया है.

 चुकी MFI ग्रामीण क्षेत्र के वंचित और गरीब लोगो को ऋण देता है.  जो स्वरोजगार स्थापित करना चाहते है. इसलिय MFI प्राथमिक क्षेत्र देयता के अंतर्गत आता है.

इसलिए ज़ब वाणिज्यिक बैंक MFI को कम ब्याज दर पर ऋण देती है तो इससे RBI का मानक भी पूरा हो जाता है

माइक्रोफाइनेंस संस्थान की कार्यप्रणाली?

Micro Finance, इसके तहत दी जानेवाली रकम भले ही छोटी होती है किन्तु ये भी सत्य है कि इसके जरिये ही कामयाबी की राह खोजी गयी.

बड़े – बड़े कर्जदार जैसे बड़े बैंकों के लिए सरदर्द बने हुए हैं वहीँ दूसरी ओर Micro Finance कम्पनियाँ प्रत्येक वर्ष कारोबार में वृद्धि कर रही है

. ये कोई चिटफण्ड कंपनी नहीं है जो लोगों का पैसा लेकर भाग जाएगी क्योंकि MFI सिर्फ कर्ज दे सकती है लोगों का पैसा जमा नहीं कर सकती है.

Micro Finance कम्पनियों की कार्यप्रणाली पारम्परिक बैंकिंग प्रणाली से भिन्न है.

 इस क्षेत्र में सम्बंधित वित्तीय संस्थानों द्वारा एक अधिकारी को नियुक्त किया जाता है. यह नियुक्त किया गया अधिकारी लोगों के समूह के संपर्क में रहता है और आवेदक की आवश्यकताओं को समझते हुए उसी आधार पर अंतिम राशि तय करता है.

 ऋण लेनेवालों को भी माइक्रोफाइनेंस संस्थानों द्वारा निर्धारित की गयी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है.

वास्तव में माइक्रोफाइनेंस संस्थान उन लोगों के लिए उपयोगी है जिन लोगों की पहुँच बैंकों तक नहीं है.

 इसके जरिये कम आय वाले लोग अपने पैरों पर खड़े होते है. माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का काम केवल ऋण देना नहीं होता है बल्कि उधारकर्ता का साथ तब तक नहीं छोड़ते हैं

 जब तक वे स्वयं अपना कारोबार चलाने के लिए सक्षम नहीं हो जाते हैं. यही एक विशेष कारण है कि हमारे देश में MFI कंपनियों की सफलता दर अधिक है.

Silent features of MFI

गरीब और वंचित लोगों को जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए होते हैं उन्हें  ऋण  प्रदान करते हैं

एम एफ आई एक प्रकार का एनबीएफसी है
यह मुख्यतः महिलाओं को ऋण प्रदान करता है

आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को ऋण प्रदान करता है तथा उन्हें प्रशिक्षित भी करता है जिसे वे छोटी-छोटी रोजगार कर सके

इसके द्वारा दिए यह ऋण  की भुगतान सप्ताह या महीनों में किया जाता है

एमएफआई द्वारा प्रदान किए गए माइक्रो लोन की पुनर्भुगतान आवृत्ति अधिक है और उधारकर्ता को त्वरित अंतराल पर राशि चुकाने की जरूरत है।

ज्यादातर मामलों में, इन संगठनों द्वारा आय-पीढ़ी के उद्देश्यों के लिए ऋण प्रदान किए जाते हैं।


कैसे एमएफआई उधारकर्ताओं को ऋण देते हैं [How MFIs Give Loan to the Borrowers in hindi]


समाज के गरीब वर्गों को सूक्ष्म वित्तीय सहायता देना एक बहुत जटिल मामला है।

 लेकिन मिक्रोफिनांस संगठन इस कार्य को पूर्णता के साथ करते हैं।

 प्रशासनिक अधिकारी को जगह पर जाना, उधारकर्ताओं से मुलाकात करना और उनके कौशल का विश्लेषण करना है।

इस पूरी प्रक्रिया में समय, ऊर्जा और जनशक्ति होती है।

ज्यादातर समय वित्तीय संस्थान उन्हें कुशल श्रम में विकसित करने के लिए सभी आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था करते हैं।

ऋण देने से पहले एमएफआई द्वारा विचार किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निम्नानुसार हैं:

ऋण अवधि- कभी-कभी उधारकर्ताओं को समय की छोटी अवधि के लिए ऋण दिया जाता है जो कुछ महीनों से 1 वर्ष तक हो सकता है। ऋण की चुकौती मासिक, साप्ताहिक या दैनिक आधार पर की जाती है।

जोखिम कारक- क्षेत्रीय अधिकारी को ऋण मंजूर करने से पहले आवेदकों की पुनर्भुगतान क्षमता का विस्तृत विश्लेषण करना पड़ता है।

पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन विभिन्न मानदंडों के आधार पर किया जाता है और यह कार्य अधिकारी द्वारा आयोजित किया जाता है।

शिक्षा- क्षेत्रीय अधिकारी भी सफल व्यवसाय शिक्षा चलाने के लिए उधारकर्ता के शिक्षा स्तर की जांच करता है, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विशिष्ट कौशल- उधारकर्ता को व्यवसाय का पूरा या न्यूनतम ज्ञान होना चाहिए। एमएफआई उम्मीद करता है कि उधारकर्ता को उस व्यवसाय के बारे में पर्याप्त जानकारी हो जो वह आगे बढ़ने जा रही है।

समझौता- उधारकर्ता और ऋण प्रदान करने वाली संस्था के बीच एक समझौता होगा। समझौते में पुनर्भुगतान प्रक्रिया और धन आवंटन शामिल होगा। दोनों पार्टियों को सहमत होना है और फिर धनराशि का अंतिम आवंटन होगा।

भारत में एमएफआई के प्रकार क्या हैं [What are the Types of MFIs in India in hindi]


जेएलजी या संयुक्त देयता समूह
एसएचजी या सेल्फ हेल्प ग्रुप
ग्रामीण बैंक मॉडल
ग्रामीण सहकारी समिति



भारत में प्रमुख एमएफआई कौन सा हैं [Which are the Prominent MFIs in India in hindi]

भारत के कुछ प्रमुख वित्तीय संस्थान निम्नलिखित हैं जो समाज के आर्थिक रूप से वंचित वर्ग को वित्तीय सहायता दे रहे हैं:
भारत वित्तीय समावेशन लिमिटेड
स्पंदना स्पोर्टी फाइनेंशियल लिमिटेड
माइक्रोफिन लिमिटेड साझा करें
Asmitha Microfin लिमिटेड
श्री क्षेत्र धर्मस्थल ग्रामीण विकास परियोजना
भारतीय समृद्धि फाइनेंस लिमिटेड (बीएसएफएल)
बंधन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
कैशपोरो माइक्रो क्रेडिट (सीएमसी)
ग्रामा विद्यालय माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड (जीवीएमएफएल)
ग्रामीण कुट्टा फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (जीएफएसपीएल)
उत्कर्ष माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
उज्जिवन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
स्वधा फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड
अन्नपूर्णा माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
अरोहान फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
असिवाड माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
बीएसएस माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
दीशा माइक्रोफिन प्राइवेट लिमिटेड
इक्विटास माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
ईएसएफ़ माइक्रोफाइनेंस एंड इंवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड
फ्यूजन माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
जनलक्ष्मी फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
मदुरा माइक्रो फाइनेंस लिमिटेड
आरजीवीएन (उत्तर पूर्व) माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
साटन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड
एसएमआईएलई माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
सोनाटा फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
एसवी क्रेडिटलाइन प्राइवेट लिमिटेड
स्वधा फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड
सूर्योदय माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
अधिकारी माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
महासाम ट्रस्ट
मार्गदारशक फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड
पहल फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
राष्ट्रीय सेवा समिति
राष्ट्रीय ग्रामीण विकास निधि
सहारा उत्तरागा कल्याण सोसायटी
सहयोग माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
साईं फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
संहिता सामुदायिक विकास सेवाएं
संघमित्र ग्रामीण वित्तीय सेवाएं
सरला महिला कल्याण सोसायटी
शिखर माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
उत्तरायन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
वेदिका क्रेडिट कैपिटल लिमिटेड
ग्राम फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
वाईवीयू फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
हाथ में हाथ (HIH)
आरओआरईएस माइक्रो उद्यमी विकास ट्रस्ट (आरएमईडीटी)

एमएफआई की सफलता दर क्या है [What is the Success Rate of MFI in hindi]

भारत वर्तमान में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है जो सफलतापूर्वक बहुत से मिक्रोफिनांस इंस्टीटूशन चला रहा है।

 सभी सरकारी और गैर-सरकारी संगठन वंचित अनुभाग के जीवन को ऊपर उठाने के लिए विभिन्न परियोजनाएं चला रहे हैं और सफलता दर काफी अधिक है।

 इन संस्थानों का काम केवल ऋण प्रदान करने के साथ खत्म नहीं होता है।

वे उधारकर्ता से भी चिपके रहते हैं जब तक कि वे अपने कारोबार को अपने आप चलाने में सक्षम न हों।

नतीजतन, जोखिम कारक नीचे आता है और पुनर्भुगतान की संभावना निश्चित रूप से उच्च हो जाती है।

इसलिए, यह रिकॉर्ड है कि भारत में एमएफआई की सफलता दर बहुत अधिक है और ये संस्थान हर गुजरने वाले दिन के साथ बढ़ रहे हैं।

भारत में एमएफआई जितना अधिक सफल होगा, देश में गरीब वर्ग की सुधार दर अधिक होगी।

Microfinance : अंत में हमारा निष्कर्ष

एक ओर जहाँ Microfinance कम्पनियाँ वित्तीय सेवाएं प्रदान करने का कार्य कर रही है

 वहीँ दूसरी ओर गरीब और वंचित वर्ग की मदद करके देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का कार्य भी कर रही है.

साथ ही साथ ये कम्पनियाँ लोगों को धन का समुचित उपयोग करने के बारे में भी शिक्षित कर रही है.

माइक्रोक्रेडिट माइक्रोफाइनेंस के लिए एक और शब्द है जिसका प्रयोग भी लोगों के द्वारा किया जाता है.

हम सभी जानते हैं कि कम आय वाले वंचित लोगों को आसानी से अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का अवसर प्राप्त नहीं होता है.

ऐसे लोग बैंक ऋण के लिए भी योग्य नहीं होते हैं. ऐसे लोग ही Microfinance कंपनियों से वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं.
आपकी राय हमारे मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है. आपको आज का लेख Microfinance kya hai? कैसा लगा हमें comment करके सूचित जरुर करें. यदि पसंद आई हो तो दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूलें.

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

जानें क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर

जानें क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर


रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया मॉनिटरी पॉलिसी का रिव्यू करते समय सीआरआर, रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट से संबंधित ऐलान भी करता है।

कई बार यह इसे यथावत रखता है और कई बार इसमें आमूलचूल परिवर्तन करता है।

 आइए जानें कि आखिर रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर (कैश रिजर्व रेशियो) होता क्या है और एसएलआर यानी  स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो के क्या मायने हैं :

रेपो रेट

 सभी कॉमर्सिअल बैंक जनता को ऋण देती है कभी कभी एक ही दिन में बहुत ज्यादा मात्रा  में ऋण की मांग आ जाति है.

 और उस स्थिति में बैंक के पास जनता को ऋण देने के लिए पर्याप्त मात्रा में धन् नही होता है.

 तब बैंक केंद्रीय बैंक (भारत में रिजर्व बैंक) से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेने का विकल्प अपनाते हैं।

इस कर्ज पर रिजर्व बैंक को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो रेट कहते हैं।

रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है और तब ही बैंक ब्याज दरों में भी कमी करते हैं

 ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके।

 अब अगर रेपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से रात भर के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा।

ऐसे में जाहिर है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा।

 महंगाई पर प्रभाव-

 यदि रेपो रेट बढ़ा दिया जाए तो बैंकों को महँगा  ऋण  मिलेगा तो ब्याज दरें बढ़ जाएंगे जिससे जनता के मनोबल कम होगा

 वस्तु एवं सेवा की मांग कम हुई कीमत कम होगी महंगाई नियन्त्रित होगा

रिवर्स रेपो रेट –

 जब कोई भी वाणिज्य बैंक अतिरिक्त धन को जिसे वह मार्केट में नहीं निकल पा रही हूं

 उसे अगर आरबीआई के पास रख देती है अल्पावधि के लिए आरबीआई कमर्शियल बैंक को जो ब्याज देती है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं

 महंगाई पर प्रभाव

 यदि रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा दिया जाए तो आरबीआई के पास धन जमा करने के लिए बैंके  आकर्षित होंगीं .

तो  बाजार में धन कम हो जाएगा,  बाजार में धन कम हो जाएगी तो तरलता कम हो जाएगी तरलता कम हो जाने पर बैंक अधिक ब्याज दर पर धन  देने लगेन्गे

 जिसे जनता के मनोबल कम हो जाएगी मनोबल कम होने से मांग कम हो जाएगा जिससे महंगाई कम हो  जाएग


स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (एसएलआर)


एसएलआर यानी कि स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो। वाणिज्यिक बैंकों के लिए

 अपने प्रतिदिन के कारोबार के आखिर में नकद, सोना और सरकारी सिक्यॉरिटीज में निवेश के रूप में एक निश्चित रकम रिजर्व बैंक के पास रखनी जरूरी होता है।

 इस रकम का इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

 अब वह रेट जिस पर बैंक यह पैसा सरकार के पास रखते हैं, उसे ही एसएलआर कहते हैं।

 इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना आरबीआई के पास रखना होता है।


 नकद आरक्षित अनुपात( कैश रिजर्व रेसिओ ) सीआरआर-

 सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को अपनी समग्र जमाव का एक निश्चित प्रतिशत भारतीय रिजर्व बैंक के पास अनिवार्य रखना पड़ता है जिसे ‘ नगद आरक्षित अनुपात’ कहा जाता है.

 यह विधि साख नियंत्रण के अति महत्वपूर्ण एवं नवीनतम विधि है इसका प्रयोग सर्वप्रथम 1935 में अमेरिका द्वारा किया गया था

यह विधि वहां अधिक उपयुक्त होती है जहां पर मुद्रा बाजार अविकसित होते हैं.

 केंद्रीय बैंक को नकद आरक्षित अनुपात में आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करने का अधिकार होता है

देश में साख  की मात्रा को कम करना होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक नगद आरक्षित अनुपात को बढ़ा देता है

 इस अनुपात के बढ़ने से बैंकों को अधिक नकद रिजर्व बैंक के पास रखने पड़ते हैं तथा स्वयं उनके पास नगद की मात्रा कम हो जाती है

इस प्रकार इन बैंकों की साख निर्माण की मात्रा कम हो जाती है जिससे यह ग्राहकों को महंगा एवं साख  प्रदान करते हैं

इसके विपरीत नकद  आरक्षित अनुपात में कमी होने से बैंकों को नकद कोष कम रखना पड़ता है जिसे साख निर्माण की मात्रा में वृद्धि होती है |

Source - NDTV


रविवार, 16 फ़रवरी 2020




भारतीय रिजर्व बैंक के कार्य -function of Reserve bank of india

आरबीआई- 

आरबीआई पूरे भारत में वित्तीय संस्थानों का रेगुलेशन करता है तथा भारत में इन्फ्लेशन को नियंत्रित रखने के लिए कदम उठाता है


आरबीआई के कार्य

1.  मौद्रिक प्राधिकारी के रूप में
2.  मुद्रा जारीकर्ता
3.  विकासात्मक भूमिका मे
4.  सरकार के लिए परामर्शदाता के रूप में
5.  विदेशी लेनदेन का पूरा दिखा
6.  मौद्रिक और साख नीति
7.  करेंसी और सिक्को  के प्रकाशन का एकाधिकार
8.  बैंकों को नियमित करना
9.  विकासात्मक कार्यों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

महत्वपूर्ण बिंदु

 एक रुपए के सिक्के या नोट का परिचालन आरबीआई करता है किंतु प्रकाशन वित्त मंत्रालय करता है

मौद्रिक नीति

 परिभाषा

 किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करने की नीति को मौद्रिक नीति कहते हैं

 सभी देशों की केंद्रीय बैंक मौद्रिक नीति बनाने का कार्य करती हैं किंतु भारत देश मे मौद्रिक नीति आरबीआई तैयार करता है उसका कार्यान्वयन करता है और उसकी निगरानी भी करते हैं|

 उद्देश्य

 विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना वित्तीय प्रणाली का विनियामक और पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करना

बैंकिंग परिचालन के लिए विस्तृत मानदंड निर्धारित करता है जिसके अंदर देश के बैंकिंग और वित्तीय प्रणालियां काम करती हैं

प्रणाली में लोगों का विश्वास बनाए रखना जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करना और आम जनता को किफायती बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराना

विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 का प्रबंधन करता है

विदेशी व्यापार और भुगतान को सुविधाजनक बनाना और भारत में विदेशी मुद्रा बाजार का क्रमिक विकास करना उसे बनाए रखना

 महत्वपूर्ण बिंदु

1 जुलाई से 30 - जून लेखा वर्ष
1 अप्रैल से 31 - मार्च वित्तीय वर्ष
1 जुलाई से 30-  जून कृषि वर्ष


 वित्तीय गतिविधियों को कंट्रोल करने वाली 2 संस्थाएं होती है

1. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया
2. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया


1.) गवर्नमेंट ऑफ इंडिया

 यह बजट वित्त मंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता है इसे राजकोषीय नीति या फिजिकल पॉलिसी कहते हैं

यह वर्ष में एक बार पेश किया जाता है
यह जनता की क्रय शक्ति को सीधा प्रभावित करता है

यह मंगाई तथा मंदी दोनों पर कारगर होता है
संगठित तथा असंगठित क्षेत्र दोनों को प्रभावित करता है

2.) रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

इसे मौद्रिक और साख नीति कहा जाता है
यह वर्ष में 6 बार जारी किया  जाता है  2 महीने के अंतराल पर

या परोक्ष रूप से बैंक और आम नागरिक दोनों को प्रभावित करता है

मंगाई तो नियंत्रित कर लेता है लेकिन मंदी को उतनी कारगर नीति नहीं बना पाता है

असंगठित क्षेत्र को ज्यादा प्रभावित करती हैं


 मौद्रिक नीति भी दो प्रकार का होता है

1.)  कठोर मौद्रिक नीति –

SLR  और सीआरआर को मात्रात्मक रूप से बढ़ाया जाता है तो उसे कठोर मौद्रिक नीति कहते हैं
 कठोर मौद्रिक नीति तब लाया  जाता है जब बाजार में तरलता बहुत ज्यादा  होता है और अधिक होने के कारण महंगाई बढ़ जाती है तब कठोर मौद्रिक नीति लाई जाती है

2.)  मृदुल मौद्रिक नीति-

 इसके मानो को कम करना

 आरबीआई किस तरह मौद्रिक और साख नीति जारी करके तरलता प्रबंधन करता है?

भारतीय रिजर्व बैंक के कार्य -function of Reserve bank of india

 तरलता प्रबंधन-

1. मात्रात्मक तरलता प्रबंधन
2. गुणात्मक तरलता प्रबंधन


1.) मात्रात्मक तथा प्रबंधन
-

(1)CRR-

 नकद आरक्षित अनुपात वर्तमान में चार पर्सेंट है

*  बैंकों के पास जितना भी धन जमा होता है उसे नेट डिमांड एंड टाइम लायबिलिटीज एनडीटीएल कहते हैं

* एनडीटीएल का चार पर्सेंट बैंकों को नगद रूप में आरबीआई के पास जमा करना होता है इसके बहुत से लक्ष्य है-
A) लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए
B) मार्केट में नकदी की कमी वृद्धि कर सकने के लिए
C) तरलता प्रबंधन के लिए

(2)SLR-
 सांविधिक तरलता अनुपात वर्तमान में 19 परसेंट है
 इसे बैंक को अपने पास रखना होता है नगद, स्वर्ण,  सरकारी प्रतिभूतियों,  के रूप में भी रखा जा सकता है|

(3)omo-

 ओपन मार्केट ऑपरेशंस (खुली बाजार प्रक्रियाएं)- आरबीआई बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियां बेचने का टेंडर जारी करेंगे
 सभी बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदने के लिए आमंत्रित करता है आरबीआई

 आखिर सरकारी प्रतिभूतियां क्यों खरीदें-

 एफडीआई विदेशों से प्राप्त आय- पैसा एडजस्ट होना चाहिए नहीं तो विकासनगर की कीमतें बढ़ा देती है इसलिए एफडीआई को समायोजित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों को लेकर आरबीआई आती है,

 इसके माध्यम से मार्केट को अब्जॉर्ब  करने की कोशिश किया जाता है ताकि बाजार में कीमतों की स्थिरता बनी रहे और वृद्धि बना रहे

(4)RR

 रेपो रेट- अल्पकालिक बैंकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए और सरकारी प्रतिभूतियों की एवज में बैंकों को उधार मिलता है जब ब्याज बैंक   चुकती है उसे रेपो  रेट  कहा जाता है वर्तमान में रेपो रेट 5.75% है
(5)RRR

 रिवर्स रेपो रेट- जब कोई भी कमर्शियल बैंक अतिरिक्त धन को जिसे वह मार्केट में नहीं निकाल पा रही है अगर आरबीआई के पास रख देती है अल्पावधि के लिए आरबीआई कमर्शियल बैंक को जो ब्याज देती है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं

 वर्तमान में 5.50% है

(6)MSF
 मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (सीमांत स्थाई सुविधा)-

2.) गुणात्मक तरलता प्रबंधन
(1) सीमांत आवश्यकता
(2) उपभोक्ता साख नियंत्रण
(3) बैंकों को दिशा निर्देश
(4) सीधी कार्यवाही




 मौद्रिक नीति
 मौद्रिक नीति भी दो प्रकार का होता है
3.) कठोर मौद्रिक नीति –
SLR  और सीआरआर को मात्रात्मक रूप से बढ़ाया जाता है तो उसे कठोर मौद्रिक नीति कहते हैं
कठोर मौद्रिक नीति तब लाया  जाता है जब बाजार में तरलता बहुत ज्यादा  होता है और अधिक होने के कारण महंगाई बढ़ जाती है तब कठोर मौद्रिक नीति लाई जाती है
4.) मृदुल मौद्रिक नीति-

 इसके मानो को कम करना


शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

भारत में बैंकिंग प्रणाली का  इतिहास और प्रकार

भारत में बैंकिंग प्रणाली का  इतिहास और प्रकार

 वर्तमान परिपेक्ष में बैंक की परिभाषा

 पूरे वित्तीय व्यवस्था का एक ऐसा मध्य बिंदु जो इस पूरे बाजार में मुद्रा का आवागमन का कार्य करता है मुद्रा की आपूर्ति और मुद्रा की प्राप्ति का कार्य करता है बैंक कहलाता है.

 बैंकों का इतिहास

1. ऋण  देने वाले लोगों को नापया नलेखा कहा जाता था

2. मनुस्मृति में ब्याज का वर्णन मिलता है
 आधुनिक बैंकों की स्थापना

1. 1770 बैंक ऑफ हिंदुस्तान कोलकाता
2. 1806  बैंक ऑफ बंगाल
3. 1840 बैंक ऑफ मुंबई
4. 1843 बैंक ऑफ मद्रास

5. 1921 इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया ( मर्ज - बंगाल, मुंबई,  मद्रास)

6. 1955 एसबीआई( इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण)

7. 1958 59 एसबीआई के सहयोगियों का राष्ट्रीयकरण
8.   1865 इलाहाबाद बैंक की स्थापना

9. 1881 अवध कमर्शियल बैंक( सीमित शक्ति के साथ भारतीयों को प्रबंधन दिया गया था)

10. 1895 पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना (भारतीयों के द्वारा प्रबंधित पहला बैंक)

11. 1911 सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया( स्वामित्व – भारतीय,  प्रबंधन- भारतीय,  संस्थापक- पोचखानवाला पहले चेयरमैन-  फिरोजशाह मेहता)

12. 1 जनवरी 1949 आरबीआई का राष्ट्रीयकरण
13. मार्च 1949 बैंकिंग अधिनियम ( 2013 में संशोधन)

14. 1969 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण( न्यूनतम संपत्ति 50 करोड़)

15. 1980 6 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण (न्यूनतम संपत्ति 200 करोड़)

16. 1993 न्यू बैंक ऑफ इंडिया मर्ज कर दी गई पीएनबी

17. 2018 में एसबीआई में मर्ज कर दिया गया स्टेट बैंक आफ सौराष्ट्र

18. 2010 में एसबीआई में मर्ज कर दिया गया स्टेट बैंक ऑफ इंदौर

19. 1 अप्रैल 2017 एसबीआई में मर्ज कर दिया गया एसबीआई के सहयोगी (स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, मैसूर, बीकानेर,  हैदराबाद,  भारतीय महिला बैंक)

20. 2018 बैंक ऑफ बड़ौदा में मर्ज कर दिया गया विजया बैंक और देना बैंक का


 बैंकों का वर्गीकरण

भारत में बैंकिंग प्रणाली का  इतिहास और प्रकार

1. अनुसूचित बैंक

2. गैर अनुसूचित बैंक


1. अनुसूचित बैंक

आरबीआई एक्ट के अनुसूची दो  में शामिल किया गया है
वर्तमान में जिनकी न्यूनतम संपत्ति 500 करोड़ की होगी
गतिविधि से ग्राहक पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा
जिन पर आरबीआई की मौद्रिक व साख  नीति पूरी लागू होती है

2. गैर अनुसूचित बैंक

 अनुसूची दो में शामिल नहीं किया गया है जैसे जम्मू कश्मीर


 अनुसूचित बैंकों का वर्गीकरण

1. वाणिज्यिक बैंक
2. कोपरेटिव बैंक
3. आरआरबी


 रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

1. 1934 आरबीआई एक्ट पारित किया गया
2. 1 अप्रैल 1935 आरबीआई कार्य करना प्रारंभ किया
3. 1937 तक मुख्यालय कोलकाता और मुंबई में है

4. सिफारिश गठन - यंग हिल्टन आयोग की स्थापना 1920 सिफारिश 1926

5. 1929 मंदी केंद्रीय बैंक जांच आयोग का गठन दूसरा आयोग था जिसने आरबीआई के गठन का सिफारिश की थी

6. आरबीआई के प्रथम गवर्नर सर ओसबोर्न स्मिथ 1935
7. आजाद भारत के प्रथम सी डी देशमुख

 रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

1. सरकारी निदेशक मंडल

एक गवर्नर और चार डिप्टी गवर्नर से मिलकर बना होता है इसका कार्यकाल 4 वर्ष का होता है

2. गैर सरकारी निदेशक मंडल

 10 गवर्नमेंट आफ इंडिया से नामित मुंबई दिल्ली चेन्नई और कोलकाता से दिए जाते हैंसदस्य,

दो बार सरकार के अधिकारी, चार क्षेत्रीय गवर्नर- मुंबई दिल्ली चेन्नई और कोलकाता से लिए जाते हैं

 आरबीआई किस उद्देश्य स्थापित की गई

 आगे का उद्देश्य- 

पूरे भारत में वित्तीय संस्थानों का  रेगुलेशन करना तथा भारत में इन्फ्लेशन को नियंत्रित रखने के लिए कदम उठाएं

 मौद्रिक और साख नीति
 महंगाई को नियंत्रित करने के लिए जो कदम होते हैं उसे कहते हैं मौद्रिक और साख नीति

“ RBI भारत में मौजूद मौद्रिक  एवं साख नीति का प्रकाशन करके लिक्विडिटी को नियंत्रित करती है “

 पाली मौद्रिक और साख नीति हर 3 महीने पर आती थी लेकिन अब हर 2 महीने पर साल में 6 बार आती है”

 परिभाषा

 आरबीआई क्या काम करने वाली है क्या कदम उठाने वाली क्या उसमें परिवर्तन होंगे उन सब का लेखा-जोखा एक नीति कहलाती है जिसे मौद्रिक और साख  नीति कहते हैं

रविवार, 15 दिसंबर 2019

RBI की मौद्रिक नीति 



चर्चा में क्यों? 


RBI की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC ने बीते 5 दिसंबर को चालू वित्त वर्ष 2019-20 की पांचवी द्विमासिक मौद्रिक समीक्षा का ऐलान किया।

 इस समीक्षा में आरबीआई ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है और इसे 5.15 फीसदी पर ही बनाए रखने का फैसला लिया है।

 रिजर्व बैंक की ऋणनीति की समीक्षा में रेपो रेट नहीं घटाने पर सहमति बनी है।

बढ़ती आर्थिक सुस्ती और घटती विकास दर के बीच आई इस मौद्रिक नीति के अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर के कयास लगाए जा रहे हैं।


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इस बार की मौद्रिक नीति के प्रमुख बिंदु


रेपो दर में कोई बदलाव नहीं 5.15 फ़ीसदी पर बना रहेगा।
मौजूदा वित्त वर्ष के लिए जीडीपी की वृद्धि दर का अनुमान 6.1 फीसद से घटाकर 5 फ़ीसदी कर दिया गया।

तमाम संकेतक ऐसा इंगित कर रहे हैं कि मांग अभी भी कमजोर स्थिति में बनी हुई है।

आरबीआई उदार रुख बनाए रखेगा ताकि आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके।

आरबीआई ने यह संकेत भी दिया कि आगामी मौद्रिक नीति समीक्षा में कुछ अन्य कदम भी उठाए जा सकते हैं।

मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति अनुमान बढ़ाकर 5.1-4.7 फ़ीसदी किया गया।

3 दिसंबर तक की उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार 451.7 अरब डॉलर पर रहा। पिछले वित्त वर्ष की समाप्ति से यह 38.8 अरब डॉलर ज्यादा रहा।

छठी मौद्रिक नीति समीक्षा के लिए अगली बैठक चार से छह फरवरी 2020 के बीच होगी।
(Sorce - ध्येय आईएएस )

क्या है मौद्रिक नीति?



भारतीय रिजर्व बैंक हर दूसरे महीने मौद्रिक नीति की समीक्षा करता है।
यह काम RBI की मौद्रिक नीति समिति करती है।

इस समीक्षा में अर्थव्यवस्था की हालत को देखते हुए नीतिगत ब्याज दरें घटाने या बढ़ाने का फैसला लिया जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो मौद्रिक नीति एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसकी मदद से रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता है।

वहीँ राजकोषीय नीति के ज़रिए सरकार समग्र मांग और अर्थव्यवस्था पर सरकारी खर्च और करों के असर को नियंत्रित किया जाता है।(sorce - ध्येय आईएएस )


क्या मक़सद होता है मौद्रिक नीति समीक्षा का
?


मौद्रिक नीति से कई मकसद साधे जाते हैं।

इनमें महंगाई पर अंकुश, कीमतों में स्थिरता और टिकाऊ आर्थिक विकास दर का लक्ष्य हासिल करना शामिल है।
इसके अलावा रोजगार के अवसर तैयार करना भी इसके लक्ष्यों में से एक है।

अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति के नियंत्रण के लिए बैंकों के कैश रिजर्व रेशियो या ओपन मार्केट आपरेशन का सहारा लिया जाता है।

रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट के जरिए कर्ज की लागत को बढ़ाया या घटाया जा सकता है।(sorce -ध्येय आईएएस )


आसान, सख़्त और तटस्थ मौद्रिक नीति


सरल या आसान मौद्रिक नीति:

नरम रुख रखने पर आरबीआई मौद्रिक नीति में प्रमुख ब्याज दरों को घटाता है।

 इससे अर्थव्यवस्था में पैसों की आपूर्ति बढ़ने का रास्ता खुल जाता है।
 बाजार में नकदी बढ़ने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।

इसे सरल या आसान मौद्रिक नीति कहा जाता है।

सख़्त मौद्रिक नीति: 

जब केंद्रीय बैंक अपना रुख कठोर करता है तो ब्याज दरों को बढ़ाया जाता है।

इससे अर्थव्यवस्था में नकदी घट जाती है। इसका उत्पादन और खपत दोनों पर विपरीत असर होता है।

 इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटती है। इसे सख़्त मौद्रिक नीति कहा जाता है।

तटस्थ मौद्रिक नीति: 

जब मौद्रिक नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया जाता तो इसे तटस्थ नीति कहा जाता है।(sorce -ध्येय आईएएस )

मौद्रिक नीति समिति



मौद्रिक नीति समिति एक छह सदस्यीय समिति होती है जिसका गठन केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाता है।

इस समिति का गठन उर्जित पटेल कमिटी की सिफारिश के आधार किया गया था।

समिति की अध्यक्षता आरबीआई गवर्नर करता है।

इसमें तीन सदस्य आरबीआई से होते हैं और तीन अन्य स्वतंत्र सदस्य भारत सरकार द्वारा चुने जाते हैं।

आरबीआई के तीन अधिकारीयों में एक गवर्नर, एक डिप्टी गवर्नर तथा एक अन्य अधिकारी शामिल होता है।

मौद्रिक नीति निर्धारण के लिए यह समिति साल में चार बार बैठक करती है और सर्वसम्मति से निर्णय लेती है।(sorce -ध्येय आईएएस )

मौद्रिक नीति समीक्षा में प्रयुक्त प्रमुख शब्दावलियाँ


बैंक रेट: 

केंद्रीय बैंक द्वारा वाणिज्यिक बैंकों को दिए जाने वाले लोन पर जो ब्याज दर लगाया जाता है उसे बैंक दर कहते हैं। अमूमन ये लॉन्ग टर्म लोन होता है।

रेपो रेट:

 रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है। बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को ऋण देते हैं। अमूमन ये शार्ट टर्म लोन होता है।

रिवर्स रेपो रेट:

 यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है।

कैश रिजर्व रेश्यो: 

देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो यानी सीआरआर या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।

तरलता समायोजन सुविधा: 

तरलता समायोजन सुविधा यानी लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी के माध्यम से आरबीआई रेपो दर और रिवर्स रेपो दर आदि का निर्धारण करती है।


क्रय प्रबंधक का सूचकांक (पीएमआई):

 ये विनिर्माण क्षेत्र के आर्थिक हालत का एक संकेतक है। पीएमआई पांच प्रमुख संकेतकों पर निर्भर करता है:

 नए आदेश, इन्वेंट्री स्तर, उत्पादन, आपूर्तिकर्ता वितरण और रोजगार का माहौल।(sorce -ध्येय आईएएस )


विहंगावलोकन


अधिनियम में निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मौद्रिक लिखतों के उपयोग के संबंध में केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति को दर्शाती है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को मौद्रिक नीति के संचालन की जिम्मेदारी निहित है।

 यह ज़िम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत स्पष्ट रूप से अनिवार्य है।(sorce- RBI official )

 आरबीआई एक्ट 1934 का संशोधन


मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य वृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।

 मूल्य स्थिरता संधारणीय वृद्धि की आवश्यक शर्त है।

मई 2016 में, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) अधिनियम, 1934 को संशोधित किया गया

 जिससे कि लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढांचे के कार्यान्वयन के लिए सांविधिक आधार प्रदान किया जा सके।

संशोधित आरबीआई अधिनियम में रिज़र्व बैंक के परामर्श से प्रत्येक पांच वर्ष में एक बार भारत सरकार द्वारा मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करने का प्रावधान भी किया गया
है।

तदनुसार, केंद्रीय सरकार ने सरकारी राजपत्र में 5 अगस्त 2016 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि के लिए लक्ष्य के रूप में 4 प्रतिशत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति अधिसूचित किया है

 जिसमें ऊपरी सहनशीलता सीमा 6 प्रतिशत और नीचली सहनशीलता सीमा 2 प्रतिशत होगी।

केंद्रीय सरकार ने निम्नलिखित को उन कारकों के रूप में अधिसूचित किया है जिनसे मुद्रास्फीति लक्ष्य हासिल करने में असफलता मिल सकती है

जैसे
(क) औसत मुद्रास्फीति किन्हीं तीन लगातार तिमाहियों के लिए मुद्रास्फीति लक्ष्य के ऊपरी सहनशीलता स्तर से अधिक हो, या

 (ख) औसत मुद्रास्फीति किन्हीं तीन लगातार तिमाहियों के लिए नीचले सहनशीलता स्तर से कम हो।

मई 2016 में भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम में संशोधन करने से पहले, लचीला मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढांचे को सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक के बीच 20 फरवरी 2015 को मौद्रिक नीति ढांचे पर हुए करार द्वारा नियंत्रित किया गया था।(sorce - RBI official )

मौद्रिक नीति ढांचा 

संशोधित भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम स्पष्ट रूप से रिज़र्व बैंक के लिए देश के मौद्रिक नीति ढांचे को परिचालित करने के लिए विधायी अधिदेश का प्रावधान करता है।

इस ढांचे का लक्ष्य वर्तमान और उभरती समष्टि-आर्थिक स्थिति और मुद्रा बाजार दरों को रेपो दर के आसपास

संचालित करने के लिए चलनिधि स्थिति के उतार-चढ़ाव के आकलन के आधार पर नीति (रेपो) दर निर्धारित करना है।

मुद्रा बाजार के माध्य्म से रेपो दर बदलाव पूरी वित्तीय प्रणाली में अंतरित होते हैं

जो आगे मुद्रास्फीति और वृद्धि के मुख्य निर्धारक तत्व समग्र मांग को प्रभावित करते हैं।

रेपो रेट की घोषणा के बाद, रिज़र्व बैंक द्वारा तैयार किए गए परिचालन ढांचे में उचित कार्रवाई के माध्यम से दैनिक आधार पर चलनिधि प्रबंधन की परिकल्पना की गई है

, इस कार्रवाई का लक्ष्य परिचालन लक्ष्य-भारित औसत कॉल दर (डब्ल्यूएसीआर) को रेपो दर के आसपास संचालित करना है।
परिचालन ढांचे को मौद्रिक नीति रुख की अनुरूपता को सुनिश्चित करते हुए उभरती वित्तीय बाजार और मौद्रिक स्थिति के आधार पर सही और संशोधित किया गया है।

चलनिधि प्रबंधन ढांचे को पिछली बार अप्रैल 2016 में उल्लेखनीय रूप से संशोधित किया गया था।( sorce- RBI official )

मौद्रिक नीति प्रक्रिया


केंद्र सरकार द्वारा धारा 45ZB के तहत गठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) मुद्रास्फीति लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक पॉलिसी ब्याज दर निर्धारित करता है।

रिज़र्व बैंक का मौद्रिक नीति विभाग (एमपीडी) मौद्रिक नीति निर्माण में एमपीसी की सहायता करता है।

अर्थव्यवस्था के सभी स्टेकधारकों के विचारों, और रिज़र्व बैंक के विश्लेषणात्मक कार्य से नीति रिपो दर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में योगदान करता है।

वित्तीय बाजार समिति (एफएमसी) चलनिधि की समीक्षा करने के लिए दैनिक आधार पर बैठक करता है

 ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि मौद्रिक नीति (भारित औसत ऋण दर) का परिचालन लक्ष्य नीति रिपो दर के करीब रखा जाता है। (sorce - RBI official )

निष्कर्ष


आरबीआइ गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में अभी तक जितनी भी एमपीसी की बैठक हुई है
उसमें रेपो रेट को घटाया गया है।

 दास की अध्यक्षता में ऐसा पहली बार हुआ है कि रेपो रेट को यथावत बनाए रखा गया है।

हालांकि लोग रिपोर्ट में 0.25 फ़ीसदी की कटौती की उम्मीद लगा रहे थे।

वहीं दूसरी तरफ बैंकों की तरफ से कर्ज वितरण के जो आंकड़े बाहर आये हैं उससे लगता नहीं है कि रेपो रेट की कटौती का कोई खास फायदा होगा |(sorce-ध्येय आईएएस )


Sorce - RBI official,  ध्येय आईएएस, PIB