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गुरुवार, 26 दिसंबर 2019


NPR and NRC explained in details :History, Difference & More



राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR):

अर्थ और उद्देश्य


राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) जन्म तिथि, वैवाहिक स्थिति, जन्म स्थान और राष्ट्रीयता (घोषित) आदि

 से संबंधित भारतीय नागरिकों का एक डेटाबेस है,

इसलिए एनपीआर देश के सभी नागरिकों के जनसांख्यिकीय विवरणों का डेटा है।

सभी नागरिकों के लिए एनपीआर में पंजीकरण कराना अनिवार्य है।


एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) और एनपीआर (नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर) दोनों ही शब्द एक जैसे प्रतीत होते हैं, 

दोनों के बीच बुनियादी अंतर है।

मीडिया में चमकती विभिन्न शर्तों के अव्यवस्था के बीच, हमने एनपीआर और एनआरसी के बीच के अंतर को आपके लिए सबसे अधिक समझने योग्य तरीके से समझाने की कोशिश की है।

यह जानना महत्वपूर्ण है कि उनके अंतर और समानता पर कूदने से पहले इन शब्दों का क्या अर्थ है।

प्रत्येक चरण को चरण दर चरण जानें।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) क्या है?


 एनपीआर देश के सामान्य निवासियों का एक रजिस्टर है।

एनपीआर के प्रयोजनों के लिए एक सामान्य निवासी को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है,

जो पिछले 6 महीने या उससे अधिक समय से स्थानीय क्षेत्र में रहता है या एक व्यक्ति जो अगले 6 महीने या उससे अधिक समय तक उस क्षेत्र में निवास करने का इरादा रखता है।


नागरिकता अधिनियम, 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना)

 के प्रावधानों के तहत एक स्थानीय क्षेत्र (गाँव / उप नगर), उप-जिला, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर द्वारा परिभाषित किया जा सकता है।

इतिहास 


राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर 2010 में बनाया गया था।

 मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, आधार के माध्यम से एकत्र किए गए बॉयोमीट्रिक्स को 2015 में एनपीआर से जोड़ा गया था।

एनपीआर के तहत डेटाबेस भारत के रजिस्ट्रार जनरल और भारत के जनगणना आयुक्त, मंत्रालय द्वारा बनाए रखा जाता है।
 गृह मामलों की  मंत्री, अमित शाह द्वारा हाल ही में घोषित किए गए अनुसार, रजिस्ट्रार जनरल, और जनगणना आयुक्त कार्यालय की वेबसाइट के अनुसार,

असम को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अप्रैल से सितंबर 2020 तक एनपीआर अभ्यास किया जाएगा।

जनगणना के साथ-साथ एनपीआर की सूची भी बनाई जाएगी।

नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) क्या है?


 एनआरसी एक सत्यापित डिजिटल रजिस्टर है जिसमें सभी भारतीय नागरिकों के बारे में डिजिटल प्रारूप में नाम और बुनियादी जनसांख्यिकीय जानकारी है।

भारत में पैदा हुआ व्यक्ति या भारतीय माता-पिता होने या कम से कम 11 वर्षों तक भारत में रहने वाले व्यक्ति, भारतीय नागरिकता के लिए पात्र हैं।


 एनपीआर और एनआरसी समझाया के बीच अंतर


मीडिया में चल रहे विरोध और ब्रेकिंग न्यूज के बीच, आम जनता दोनों शर्तों और इसके निहितार्थों के बारे में उलझन में है।

10 दिसंबर, 2003 को अधिसूचित नागरिकता नियमों के अनुसार, एनपीआर Cit रजिस्टर होता है

जिसमें आमतौर पर एक गांव या ग्रामीण क्षेत्र या कस्बे या वार्ड या सीमांकित क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों का विवरण होता है

जो एक शहर या शहरी क्षेत्र में वार्ड के भीतर होता है।

 NRC एक रजिस्टर है जिसमें भारत और भारत के बाहर रहने वाले भारतीय नागरिकों का विवरण है।

नियम आगे कहते हैं कि 'भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर' में प्रत्येक नागरिक का विवरण होगा अर्थात

नाम;

पिता का नाम;

माता का नाम;

लिंग;

जन्म की तारीख;

जन्म स्थान;

आवासीय पता (वर्तमान और स्थायी);

वैवाहिक स्थिति ñ यदि कभी विवाहित, पति या पत्नी का नाम;

दर्शनीय पहचान चिह्न;

नागरिक पंजीकरण की तिथि;

पंजीकरण की क्रमिक संख्या; तथा

राष्ट्रिय पहचान संख्या।

 एनपीआर के मामले में, जनसांख्यिकीय और बायोमेट्रिक दोनों डेटा एकत्र किए जाते हैं।

 2010 में एकत्रित अंतिम एनपीआर से, कुछ नई श्रेणियों को सूची में जोड़ा गया है। ये इस प्रकार हैं:

 आधार संख्या (स्वैच्छिक);

मोबाइल नंबर;

माता-पिता के जन्म की तारीख और स्थान;

अंतिम निवास स्थान;

पासपोर्ट नंबर (यदि भारतीय पास; ऑर्ट धारक);

वोटर आईडी कार्ड नंबर;

स्थायी खाता संख्या;

ड्राइविंग लाइसेंस नंबर;



गहराई में : NPR और NRC में क्या अंतर है ?


एनपीआर देश के सामान्य निवासियों का एक रजिस्टर है। इसमें नागरिकता अधिनियम, 1955 और नागरिकता (नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना)

नियम, 2003 के प्रावधानों के तहत स्थानीय (गाँव / उप नगर), उपखंड, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एकत्रित जानकारी शामिल है।

NRC उन लोगों का एक आधिकारिक रिकॉर्ड है जो कानूनी भारतीय नागरिक हैं।

 इसमें उन सभी व्यक्तियों के बारे में जनसांख्यिकीय जानकारी शामिल है जो नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार भारत के नागरिकों के रूप में अर्हता प्राप्त करते हैं। यह रजिस्टर भारत की 1951 की जनगणना के बाद पहली बार तैयार किया गया था और तब से लेकर आज तक इसे अपडेट नहीं किया गया है। NRC ने सबसे पहले पूर्वोत्तर राज्य असम में इसके कार्यान्वयन के साथ राष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त की, लेकिन नागरिकों की रजिस्ट्री राष्ट्र में भय और आतंक को बढ़ा रही है।


गृह मंत्रालय ने कहा कि एनपीआर के संचालन का उद्देश्य 

"विभिन्न केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत लाभार्थियों के लक्ष्य में सुरक्षा और सुधार को मजबूत करने के अलावा

 देश में रहने वाले हर परिवार और व्यक्ति का एक विश्वसनीय रजिस्टर तैयार करना है"


एनपीआर एक नागरिकता एन्यूमरेशन ड्राइव नहीं है;

 इसमें छह महीने से अधिक समय तक एक विदेशी रहना भी शामिल होगा।

NRC में भारत में रहने वाले विदेशियों को छोड़कर केवल भारत के नागरिकों का विवरण होगा।

 गृह मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा,

"एनपीआर डेटा के आधार पर एक राष्ट्रव्यापी एनआरसी का संचालन करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।"


Sorce - josh jagaran 



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मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

Is youth with civil society a serious challenge to government?

क्या नागरिक समाज के साथ युवा सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती है?



23 दिसंबर 2019


केंद्र और राज्य सरकार के निर्धारित प्रयासों और राजनीतिक और छात्र नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी और

 विरोध प्रदर्शन रैलियों को विफल करने के लिए इंटरनेट सेवाओं को रोकने के बावजूद युवाओं और नागरिक समाज का बड़ा बदलाव एक ऐसा विकास है जिसे अनदेखा करना  मुश्किल है।


नागरिक समाज के समर्थन से देश भर में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के पारित होने के पहले

और बाद में होने वाले लगातार छात्र विरोध देश की राजनीति में एक जलविभाजन के रूप में बदल सकते हैं।

छह साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में भाजपा के उदय के बाद यह पहली बार हुआ।


प्रदर्शनों को समाप्त करने से पहले, प्रदर्शनकारी युवाओं और राज्य पुलिस के बीच झड़पों में एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो गई है,

जो केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों दोनों के प्रदर्शनों से निपटने के लिए कड़े आदेश हैं।

अशांति भाजपा के साथ-साथ एनडीए सरकार के रूप में जारी है, जो अपने गुरु से पूरी तरह से समर्थन कर रही है -

आरएसएस राजनीतिक रूप से स्थिति से निपटने के लिए दृढ़ संकल्पित है और वह बात करने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि इसे कमजोरी का संकेत माना जा सकता है।


हालांकि जेडी (यू) जैसे दलों और बीजेडी जैसे दलों के बीच एक पुनर्विचार है,

जिन्होंने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लिए अपने संबंधित विपक्ष की घोषणा की है,

 लेकिन भाजपा ने फैलाने के लिए एक बड़े पैमाने पर और व्यापक आउटरीच कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया है।

सच्चाई 'सीएए और एनआरसी के बारे में।


केंद्र और राज्य सरकार के निर्धारित प्रयासों और राजनीतिक और छात्र नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी

और विरोध प्रदर्शन रैलियों को विफल करने के लिए इंटरनेट सेवाओं को रोकने के बावजूद युवाओं

और नागरिक समाज का बड़ा बदलाव एक ऐसा विकास है
जिसे अनदेखा करना  मुश्किल है।

 इससे पहले, संसद में भी नागरिकता संशोधन बिल (CAB) की शुरुआत में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे

 और अंत में दोनों सदनों द्वारा पूरे पूर्वोत्तर विशेष रूप से असम में एक अधिनियम में बदलकर बिल पारित किया गया था।

19 दिसंबर को भारी प्रतिक्रिया, एक दिन जब 1927 में स्वतंत्रता सेनानी अशफाकुल्ला खान को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था

 और हिंदू-मुस्लिम एकता और एकता के दिन के रूप में मनाया जाता है, संभवतः  कई कारकों का परिणाम है।

यहां तक कि दिल्ली, लखनऊ, पटना, अहमदाबाद, मुंबई, भोपाल में एकत्रित हुए प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर

एक सरसरी नज़र यह साबित करती है कि विरोध करने वाले नागरिक सभी धर्मों, धर्मों, जातियों और विश्वासों से थे।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि ज्वालामुखी पर एक टोपी को बड़े गुस्से के साथ मानव क्रोध द्वारा हटा दिया गया था.

और भारत को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने के निरंतर प्रयास किए गए थे।

निस्संदेह, आर्थिक मंदी और कम होते रोजगार के अवसरों ने भी युवाओं में मोदी सरकार के खिलाफ बढ़ते गुस्से में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

इसके अलावा, उन वादों को पूरा न करना, जो मोदी के अलावा किसी और ने नहीं किए थे,

 ने सामान्य रूप से युवाओं और नागरिक समाज के बीच बढ़ते मोहभंग में योगदान दिया है।

विश्वसनीय विपक्ष का अभाव, जिसने मोदी सरकार के लिए क्षेत्र को खुला छोड़ दिया,

विशेष रूप से 2019 के आम चुनावों में एक बेहतर जनादेश के साथ जीतने के बाद,

 जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा समाप्त करने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने जैसे विधानों में भीड़ पैदा हो गई।

इसके अलावा, वहां विपक्षी नेताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई और फिर नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया, 

जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू, ईसाई, बौद्ध, पारसी, जैन और मुस्लिमों को राजनीतिक रूप से प्रताड़ित करने का एक भेद बनाता है।

लगता है लंका एक सभ्य समाज और युवा अशांति के परिणामस्वरूप हुई है।

मोदी शासन के साथ मोहभंग और निराशा की स्थिति ने आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ताओं की बढ़ती आक्रामकता के साथ और गति पकड़नी शुरू कर दी।

असम में NRC रजिस्टर का अनुभव जो अंततः 1.9 मिलियन से अधिक नागरिकों को अपनी राष्ट्रीयता साबित करने में असफल रहा, 

हाल ही में आशंकाओं और आशंकाओं के परिणामस्वरूप हुआ, जो निराधार हो सकता है

लेकिन लोगों के मानस को प्रभावित कर सकता है।

अगर ये देशव्यापी विरोध केंद्र और राज्यों में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती बनने जा रहे हैं या नहीं तो कई कारकों पर निर्भर होने जा रहे हैं।

ऐतिहासिक रूप से युवा हमेशा बदलाव की शुरुआत करने या अलोकतांत्रिक और निरंकुश शासन के उखाड़ फेंकने में सबसे आगे रहे हैं।

 यूरोप में छात्र विरोध और पिछली सदी के 60 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिकी युद्ध के खिलाफ युवा प्रदर्शनों के परिणामस्वरूप नीतियों में व्यापक परिवर्तन और सरकारों का परिवर्तन हुआ।

घर वापस, 70 के दशक के मध्य में गुजरात में कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व छात्रों ने किया था, 

जिसके परिणामस्वरूप 1977 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी सरकार की हार के बाद आपातकाल लागू कर दिया गया था।


चीन भी हांगकांग में निरंतर और निरंतर युवा और छात्र विरोध का सामना कर रहा है 

और बीजिंग में शक्तिशाली अलोकतांत्रिक शासन को इसे नियंत्रित करने के तरीके खोजने के लिए नुकसान में है।

राज्य दमन और बल का उपयोग अक्सर स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहा है।

इतिहास युवा शक्ति का एक गवाह है जो अक्सर क्रांतिकारी परिवर्तनों में परिणत हुआ है

 और कोई भी शासन हालांकि ताकतवर को इस स्पष्ट तथ्य को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और संभवतः अपने जोखिम पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

विभाजित नेतृत्व और मोदी के नेतृत्व वाले भाजपा के लिए एक विश्वसनीय विकल्प की कमी केवल दो कारक हैं

जो अभी तक वर्तमान शासन के लिए कुछ प्रतिशोध की पेशकश करते हैं,

लेकिन ये कारक कितनी देर तक काम करना जारी रखते हैं, यह भविष्यवाणी करना मुश्किल है।

 यह अक्सर ऐसा होता है कि युवाओं में क्रोध क्रोध एक परिवर्तन के लिए एक भावुक इच्छा के लिए एक आउटलेट पाता है

और अप्रत्याशित तरीके से अनिच्छुक दलों को मजबूर करता है
जो एक दूसरे के लिए वैचारिक रूप से विरोध करते थे

और राजनीतिक बलों के अलावा एक आम राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी या एक दुश्मन के खिलाफ हाथ मिलाने के लिए डंडे मारते थे। सबसे खराब स्थिति।

Sorce- ORF

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रविवार, 22 दिसंबर 2019

प्रदर्शन हिंसा और कानून ( धारा 144 और कर्फ्यू में अंतर)



 इतनी बड़ी आबादी वाला देश एक ऐसा देश है जहां कहते हैं,
हर मिल पर बोली बदल जाती है,  वेशभूषा  बदल जाती है,

यहां तक कि पूरा का पूरा रहन-सहन भी बदल जाता है.

 ऐसा देश जहां हर एक धर्म समुदाय के लोगों को बराबरी का हक मिला हुआ है

 यहां का लोकतंत्र का सबसे बड़ा ग्रंथ संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है.

और भारत की संसद में लगातार नये कानून बनाए जा रहे हैं और संशोधन भी किए जा रहे हैं.

 इसके पीछे बहुत वाद-विवाद चर्चा और मंथन की जाती हैं
 इतने विभिन्नता वाले कल्चर में मतभेद और असहमति होना बहुत स्वाभाविक है.

 हमें सविधान में इसके लिए भी बकायदा प्रावधान है.

 मौलिक अधिकार के साथ हमको अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध प्रदर्शन का भी अधिकार है.

 लेकिन प्रदर्शन करने का भी नियम कायदे हैं

 तो चलिए आज जानेंगे धरना प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार को और जानेंगे  धारा 144 और कर्फ्यू में क्या अंतर है? 

 साथ ही साथ समझने की कोशिश करेंगे कि सर्वजनिक संपत्ति के नुकसान पर भारतीय दंड प्रक्रिया क्या कहती हैं? 

 हाल फिलहाल में नागरिकता संशोधन कानून के  विरोध और समर्थन में देशभर में अलग-अलग हिस्सों से  धरना प्रदर्शन की खबरें आई

 कुछ प्रदर्शन हिंसात्मक हुए तो कई जगहों पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान भी पहुंचा

 विरोध जाहिर करने के लिए धरना प्रदर्शन का सहारा लेते हैं.

किसी भी मुद्दे पर हमारा आपका विरोध हो सकता है.

लेकिन विरोध किसी भी तरह से हिंसात्मक नहीं होना चाहिए

यह सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. संविधान हमें धरना प्रदर्शन का अधिकार देता है यह अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार है


 अभिव्यक्ति की आजादी


 अनुच्छेद 19


आर्टिकल 19 (1) में कुछ अधिकार की व्यवस्था

इसमें बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी
शांतिपूर्ण और बिना हथियार की एक जगह इकट्ठा होने की आजादी

संगम या संग बनाने की आजादी
देश में कहीं भी स्वतंत्र रूप से घूमने की आजादी

किसी भाग में निवास करने और बस जाने की आजादी के साथ साथ ही
जीविका व्यापार या कारोबार करने का अधिकार शामिल है

 हालांकि यह सारे अधिकार और सीमित या सार्वभौमिक नहीं है. अनुच्छेद 19 (2), (3), (4), (5), (6) के तहत तर्कसंगत सीमाएं भी लगाने की व्यवस्था की गई है 

देश की प्रभुता और अखंडता बरकरार रखना

लोक  व्यवस्था व सदाचार बनाए रखना

आर्टिकल 19 के तहत मिली मौलिक अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं

 धरना प्रदर्शन

 अनुमति जरूरी

स्थानी नियम कायदों की जानका

स्थानीय प्रशासन और पुलिस से अनुमति

पुलिस से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है
कानून व्यवस्था बिगड़ने नहीं चाहिए

प्रदर्शन के लिए अनुमति से जुड़े प्रस्ताव पर सभी जानकारियाो का  जिक्र करना जरूरी

इन्हें विरोध प्रदर्शन का कारण,  तारीख,  अवधि और भाग लेने वाले अपेक्षित लोगों की संख्या

और विरोध प्रदर्शन की मार्ग की जानकारी शामिल होनी चाहिए

प्रदर्शन आयोजित करने वाली संस्था के नाम,  पता और फोन नंबर की जानकारी होनी चाहिए

अक्सर हमें विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा देखने को मिलती है
लेकिन ऐसा करके हम खुद का ही भविष्य बर्बाद कर रहे होते हैं

“ उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू का भी कहना है – कि हिंसा से जनता के संपत्ति को नुकसान पहुंचता है ऐसा करने वाले अपना ही भविष्य बर्बाद कर रहे होते हैं”


 सवाल उठता है कि धरना प्रदर्शन पर तर्कसंगत प्रतिबंध क्या है? 

राज्य की सुरक्षा,  पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंध, कानून व्यवस्था,  अदालत की अवमानना और देश की संप्रभुता और अखंडता कुछ ऐसी शर्ते हैं

जो तर्कसंगत प्रतिबंध की बुनियाद आधार है

सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार कहां है कि विरोध जाहिर करने के नागरिकों के

मौलिक अधिकार और कानून व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन बेहद जरूरी है
इन सब बातों का ध्यान रखते हुए हमें अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए अपने कर्तव्यों का भी एहसास होनी चाहिए


 सीआरपीसी की धारा 144


जब भी देश मैं विरोध प्रदर्शन के चलते हिंसा भड़क उठती है

और उससे जान माल की हानि होने की आशंका होती है तो वहां सीआरपीसी की धारा 144 लागू कर दी जाती है

ताकि शांति बनी रहे और लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन रहे


 आइए जानते हैं सीआरपीसी की धारा 144 क्या है? और उसकी पालन न करने पर क्या सजा हो सकती हैं? 

जब लोगों का एक समूह सार्वजनिक शांति भंग करने की इरादों से इकट्ठा होता है तो ऐसे समूह को गैरकानूनी समूह के रूप में माना जाता है

ऐसी प्रक्रियाओं को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा 144 लागू कर दी जाती है


CRPC की धारा 144 क्या है? 


 कोई भी व्यक्ति जो किसी घातक आयुध हथियार या किसी

ऐसी चीज से जिसे आक्रामक विस्फोट के रूप में उपयोग किए जाने पर जानमाल की हानि और मौत की संभावना हो,

  उससे लैस होकर किसी विधि विरुद्ध जन समूह का सदस्य होगा,

तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिससे 2 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है

 या आर्थिक दंड या दोनों से दंडित किया जाएगा |

 सजा का प्रावधान


किसी गैर कानूनी असेंबली में घातक हथियार से लैस होना
गैरकानूनी असेंबली यानी 5 या 5 से अधिक लोगों का जमा होना
सार्वजनिक स्थल पर 5 या 5 से ज्यादा लोग जमा नहीं हो सकते
साथी कोई भी व्यक्ति लाठी, बंदूक,  चाकू, तलवार या घातक हथियार के साथ सार्वजनिक स्थल पर नहीं जा सकता है
सिर्फ पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को छूट दी गई है
144 के तहत दोषी पाए जाने पर धारा 107 धारा 151 के तहत गिरफ्ता

जिसमें 1 साल से लेकर 3 साल तक सजा का प्रावधान

पुलिस या सुरक्षा बलों को उनके काम से रोकने पर भी
 सजा का प्रावधान


 लागू करने का प्रावधान


धारा 144 का आदेश न्यायिक नहीं होता है

यह कार्यपालिका या प्रशासनिक आदेश होता है

जिसे लोग व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए लागू किया जाता है

आदेश जारी करने की शक्ति केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेट को दी गई है

न्यायिक मजिस्ट्रेट को नहीं

इसे लागू करने के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट एक नोटिफिकेशन जारी करता है

और इसके बाद उस इलाके में धारा 144 लागू हो जाता है
धारा 144 एक बार में  अधिकतम 2 माह के लिए लागू किया जा सकता है
विशेष परिस्थिति में राज्य सरकार 6 महीने के लिए बढ़ा सकती हैं

 कर्फ्यू



धारा 144 और कर्फ्यू में काफी फर्क है

जब हालात ज्यादा खराब हो जाता है तो कर्फ्यू लगाया जाता है

धारा 144 में जहां घर से निकलने और अपने काम काज करने की इजाजत होती हैं वही

कर्फ्यू में कोई भी व्यक्ति अपने घर से बाहर नहीं निकल सकता है

स्कूल कॉलेज सब बंद होता है एक निश्चित समय की छूट दी जाती है जिसमें लोग अपनी जरूरत वाली काम  कर सकते हैं

 निष्कर्ष
लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने के लिए हिंसा का सहारा लेना सही नहीं ठहराया जाता है
आईपीसी में इसके लिए कई प्रावधान है


  सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान

 सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस


सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान होने पर जिम्मेदारी आरोपी की होगी

आरोपी को खुद को निर्दोष साबित करना होगा

निर्दोष साबित होने तक आरोपी ही जिम्मेदार माना जाएगा

दंगा करने वालों से सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की वसूली की जाए


 सार्वजनिक संपत्ति नुकसान कानून 1984

 प्रावधान

सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर 5 साल जेल की सजा

जेल के साथ या जुर्माना यह दोनों की सजा

वही न्यूनतम सजा 6 महीने से कम नहीं होगी

आईपीसी की धारा 425 के तहत आगजनी या विस्फोटक पदार्थ से नुकसान पर 1 साल कैद की सजा

कैद की सजा 1 साल से कम नहीं होगी

कैद को 10 साल तक भी बढ़ाया जा सकता है

जुर्माना भी वसूला जा सकता है और जमानत के लिए विशेष प्रावधान है


 भारतीय दंड संहिता 1860

 अध्याय 8

सार्वजनिक शांति के खिलाफ धारा 141 से 160 तक प्रावधान

धारा 141 में गैरकानूनी काम, दंगे भड़काना प्रमुख अपराध है
किसी कानून के या किसी कानूनी प्रतिक्रिया के निष्पादन का प्रतिरोध करना

अपराधिक बल से किसी व्यक्ति की संपत्ति पर कब्जा करना

धारा 142 में विधि विरुद्ध जन समूह का सदस्य होना

धारा 143 में गैरकानूनी जन समूह का सदस्य होने पर कारावास की सजा

करावास को 6 महीने बढ़ाने आर्थिक दंड या दोनों से दंडित करने का प्रावधान है

धारा 107 के अनुसार उपेंद्र करने पर एक अवधि के लिए करावास की सजा

सजा को 1 महीने तक बढ़ाया जा सकता है

एक सो रुपए तक का आर्थिक दंड या दोनों से दंडित करने का प्रावधान भी है




































शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

न्यायाधीशों की नियुक्ति


चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिये कोलेजियम द्वारा अनुशंसित 213 पद केंद्र सरकार की स्वीकृति न मिलने के कारण लंबित हैं।


कॉलेजियम सिस्टम क्या होता है? 


कॉलेजियम सिस्टम का भारत के संविधान में कोई जिक्र नही है.
यह सिस्टम 28 अक्टूबर 1998 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के जरिए प्रभाव में आया था.

कॉलेजियम सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक फोरम जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है.

 कॉलेजियम की सिफारिश दूसरी बार भेजने पर सरकार के लिए मानना जरूरी होता है.

 कॉलेजियम की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे सीनियर जजों से मिलकर की जाती है

सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है.

 इसके अलावा उच्च न्यायालय के कौन से जज पदोन्‍नत होकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है.

UPA सरकार ने 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम सिस्टम की जगह NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग) का गठन किया था

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार दे दिया था.
इस प्रकार वर्तमान में भी जजों की नियुक्ति और तबादलों का निर्णय सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम सिस्टम ही करता है.( sorce -jagaran josh)

External link

-  न्यायधिशो की नियुक्ति कैसे होती है? 

 - उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को  हटाने की प्रक्रिया क्या है? 

को  हटाने की प्रक्रिया क्या है?

न्यायिक नियुक्ति आयोग 

Justice

इस व्यवस्था को बदलकर इसके स्थान पर अधिक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान (संशोधन) विधेयक,

2014 लोक सभा में 11 अगस्त 2014 को प्रस्तुत किया गया था।
 संसद के दोनों सदनों से पास होने और इस पर आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति मिलने के बाद इस विधेयक को 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो गई

 और यह ‘संविधान (99वाँ) संशोधन अधिनियम, 2014’ के रूप में भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

 इस संशोधन के तहत संविधान में एक नया अनुच्छेद 124-क जोड़ा गया जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग  के संगठन के बारे में उपबंध था।

इसके अनुसार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना निम्नानुसार तय की गई-

1. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष),
 2. उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश,
3. केंद्रीय क़ानून मंत्री,

4. दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिन्हें मुख्य न्यायमूर्ति, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता से मिलकर बनने वाली समिति द्वारा नाम-निर्देशित किया जाना था।

इन दो व्यक्तियों में से एक को अजा, जजा, ओबीसी, अल्पसंख्यक या महिला होना चाहिए था।

अक्तूबर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असांविधानिक घोषित करते हुए देश के लगभग समूचे राजनीतिक वर्ग को कठघरे में खड़ा कर दिया था।

वह अच्छा मौका था, जब व्यवस्था में सुधार के रास्ते खोले जाते। यदि संसदीय प्रस्ताव में दोष थे,

तो उन्हें दुरुस्त करने के रास्ते बताए जाते।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग न्यायपालिका के कामकाज में दखल देता है।

 पुराने तरीके यानी कॉलेजियम सिस्टम से ही जजों की नियुक्ति होगी।

उसके बाद से व्यवस्था में दोतरफा ठहराव आ गया है।

 उसी वक्त से यह सवाल भी उभरकर सामने आ रहा है कि इस टकराव या तकरार को कैसे खत्म किया जाए?

एनजेएसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

एक तो यह कि नियुक्ति का अधिकार जजों तक सीमित रहना न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जरूरी है।

 यानी कि कार्यपालिका या सिविल सोसायटी की किसी भी किस्म की भागीदारी ठीक नहीं।

दूसरे, न्यायाधीश की योग्यता और उपयुक्तता का आकलन करने की समझदारी न्यायपालिका से बाहर के किसी व्यक्ति में नहीं हो सकती।
 और यह कि राजनेता भ्रष्ट और अयोग्य हैं।
 (sorce – swarajyamag )

भारत का मुख्य न्यायधीश


(Chief Justice of India / CJI) भारतीय न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय का अध्यक्ष होता है।
भारत के भारत का मुख्य न्यायाधीश

Emblem of the Supreme Court of India
पदस्थ

जस्टिस शरद अरविंद बोबडे
(18 नवंबर 2019 से)

भारतीय न्यायपालिका

संक्षेपाक्षर - CJI
अधिस्थान-नई दिल्ली

नामांकनकर्ता Collegium of the Supreme Court
नियुक्तिकर्ता भारत के राष्ट्रपति

अवधि काल
till the age of 65 yrs[1]

गठनीय साधन भारतीय संविधान (under article 124)

गठन 1950

प्रथम धारक -

जस्टिस एस जे कानिया(26/01/1950 - 06/11/195
( sorce -विकिपीडिया )

मुख्य बिंदु:


1 दिसंबर, 2019 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिये स्वीकृत कुल पदों के 38% पद रिक्त हैं।

आंध्र प्रदेश और राजस्थान सहित कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में वास्तविक क्षमता के आधे से भी कम न्यायाधीश हैं।


नियुक्ति संबंधी प्रावधान:


सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये छह महीने की समयावधि तय की है

जिनके नाम पर सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम, उच्च न्यायालय और सरकार ने सहमति व्यक्त की है।

उच्च न्यायपालिका के लिये न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के अंतिम अनुमोदन हेतु निर्दिष्ट समय-सीमा तय की गई है।

मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (Memorandum of Procedure) के अनुसार -

 एक पद रिक्त होने के कम-से-कम छह महीने पहले नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिये

 तथा उसके बाद छह सप्ताह का समय राज्य द्वारा केंद्रीय कानून मंत्री को सिफारिश भेजने के लिये निर्दिष्ट किया गया है।

तत्पश्चात् चार सप्ताह के अंदर प्रक्रिया संबंधी संक्षिप्त विवरण सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम के पास भेजा जाता है।

एक बार जब कॉलेजियम द्वारा नामों की मंजूरी दे दी जाती है तो कानून मंत्रालय को इसे तीन सप्ताह में प्रधानमंत्री को सिफारिश के लिये भेजना होगा।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा तबादले के लिये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम बनाया था,

जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया था

कि ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ अपने वर्तमान स्वरूप में न्यायपालिका के कामकाज में एक हस्तक्षेप मात्र है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को भेजे गए नामांकनों पर कार्रवाई नहीं करने के लिये केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कोलेजियम द्वारा इन नामों को पुनः नामांकित किया जाता है
तो सरकार के पास न्यायाधीशों को नियुक्त करने के अला3वा कोई विकल्प नहीं है।

निष्कर्ष 


कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेदों का सार्वजनिक होना लोकतंत्र के लिये नुकसानदायक है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका के अपने-अपने अधिकार क्षेत्र हैं। संविधान के तहत दोनों की सुपरिभाषित भूमिकाएँ हैं और अदालतों की भूमिका अंततः विधि का शासन सुनिश्चित कराने की है। न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों अपना-अपना काम करती हैं। विधायिका कानून बनाती है और इसे लागू करना कार्यपालिका का तथाविधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने की जाँच करना न्यायपालिका का काम है।


स्रोत-द हिंदू, दृष्टि आईएएस , jagaran जोश, swarajyamag


गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

Arms Amendment Bill 2019 संसद से मंजूरी, अवैध हथियार बनाने और रखने पर अब होगी उम्रकैद
  


संसद ने 10 दिसंबर 2019 को आयुध संशोधन विधेयक 2019 (Arms Amendment Bill 2019) को मंजूरी दे दी है.
 राज्यसभा ने विधेयक को चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया.
लोकसभा ने इस विधेयक को 09 दिसंबर 2019 को ही पारित कर दिया था.
संसद ने अवैध हथियारों के निर्माण पर आजीवन सजा के प्रावधान को मंजूरी दे दी है.

गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि 1959 के अधिनियम में कई विसंगतियां थीं

तथा इस विधेयक के माध्यम से उनको दूर किया जा रहा है(sorce -jagaran josh)

External link -

Arms Amendment Bill 2019: Everything you need to know!


आयुध संशोधन विधेयक 2019 के मुख्य तथ्य


• आयुध (संशोधन) विधेयक, 2019 में लाइसेंसी हथियार रखने की संख्या सीमित की गई है.

इस संशोधन में अवैध तरीके से शस्त्र, गोला-बारूद एवं विस्फोटक रखने, बनाने तथा बेचने वालों के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है.

• संशोधन से पहले इसमें उम्रकैद की सजा तो होती थी, लेकिन उसमें अमूमन 14 साल कैद की सजा का ही प्रावधान था.

• इस संशोधन में अब एक लाइसेंस पर केवल दो हथियार तक रखने का प्रावधान किया गया है.
 अभी तक एक लाइसेंस पर तीन हथियार रख सकते हैं.

• इस विधेयक में गैर कानूनी हथियारों को बेचने तथा तस्करी करने वालों को आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है.

• संशोधित विधेयक के अनुसार, पुलिस से शस्त्र छीनने वाले और चुराने वालों के लिए भी सख्त सजा का प्रावधान किया गया है.

• इस विधेयक में प्रतिबंधित गोला-बारूद रखने वालों को सात साल से चौदह साल की सजा का प्रावधान किया गया है.

• विधेयक में लाइसेंस हथियार के नवीनीकरण की अवधि को 03 साल से बढ़ाकर 05 साल किए जाने का प्रावधान किया गया है.(sorce – jagaran josh).

विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ


बंदूक खरीदने के लिये लाइसेंस:



आयुध अधिनियम (Arms Act) 1959 के तहत बंदूक खरीदने, उसे रखने या कैरी करने के लिये लाइसेंस लेना आवश्यक होता है।

अधिनियम के अनुसार, कोई व्यक्ति केवल तीन बंदूकों का ही लाइसेंस ले सकता है (इसमें कुछ अपवाद हैं, जैसे बंदूकों के लाइसेंसशुदा डीलर्स के लिये)।

 लेकिन हाल ही में पारित विधेयक बंदूकों की संख्या को तीन से घटाकर एक करता है।
इसमें उत्तराधिकार या विरासत के आधार पर मिलने वाला लाइसेंस भी शामिल है।

विधेयक एक साल की समय-सीमा प्रदान करता है जिस दौरान अतिरिक्त बंदूकों को निकटवर्ती पुलिस स्टेशन के ऑफिसर-इन-चार्ज या निर्दिष्ट लाइसेंसशुदा बंदूक डीलर के पास जमा करना होगा।

 अगर बंदूक का मालिक सशस्त्र सेना का सदस्य है तो वह यूनिट के शस्त्रागार में बंदूकें जमा करा सकता है।

 एक वर्ष की अवधि के समाप्त होने के 90 दिनों के भीतर इन बंदूकों का लाइसेंस समाप्त हो जाएगा।

विधेयक बंदूकों के लाइसेंस की वैधता की अवधि को तीन वर्ष से बढ़ाकर पाँच वर्ष करता है।

प्रतिबंध:


अधिनियम लाइसेंस के बिना बंदूकों के विनिर्माण, बिक्री, इस्तेमाल, ट्रांसफर, परिवर्तन, जाँच या परीक्षण पर प्रतिबंध लगाता है।

 यह लाइसेंस के बिना बंदूकों की नली यानी बैरल को छोटा करने या नकली बंदूकों को असली बंदूकों में बदलने पर भी प्रतिबंध लगाता है।

इसके अतिरिक्त विधेयक गैर-लाइसेंसशुदा बंदूकों को हासिल करने या खरीदने तथा लाइसेंस के बिना एक श्रेणी की बंदूकों को दूसरी श्रेणी में बदलने पर प्रतिबंध लगाता है।

विधेयक राइफल क्लब्स या संगठनों को इस बात की अनुमति देता है कि वे टारगेट प्रैक्टिस के लिये किसी भी बंदूक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

 अब तक उन्हें सिर्फ प्वाइंस 22 बोर की राइफल्स या एयर राइफल्स का इस्तेमाल करने की अनुमति थी।


सज़ा में बढ़ोतरी
:


विधेयक अनेक अपराधों से संबंधित सज़ा में संशोधन करता है। अधिनियम में निम्नलिखित के संबंध में सज़ा निर्दिष्ट है:
1. गैर लाइसेंसशुदा हथियार की विनिर्माण, खरीद, बिक्री, ट्रांसफर, परिवर्तन सहित अन्य क्रियाकलाप।

2. लाइसेंस के बिना बंदूकों की नली को छोटा करना या उनमें परिवर्तन।

3. प्रतिबंधित बंदूकों का आयात या निर्यात। इन अपराधों के लिये तीन से सात वर्ष की सज़ा है,

साथ ही जुर्माना भी भरना पड़ता है।

विधेयक इसके लिये सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान करता है जिसके साथ जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

अधिनियम के अंतर्गत लाइसेंस के बिना प्रतिबंधित अस्त्र-शस्त्र (Ammunition) खरीदने, अपने पास रखने या कैरी करने पर पाँच से दस साल की कैद हो सकती है
 और जुर्माना भरना पड़ सकता है।

विधेयक इस सज़ा को जुर्माने सहित सात वर्ष से बढ़ाकर 14 वर्ष करता है।
 न्यायालय कारण बताकर इस सज़ा को सात साल से कम कर सकता है।
अधिनियम के अंतर्गत लाइसेंस के बिना प्रतिबंधित बंदूकों से डील करने (जिसमें उनकी विनिर्माण, बिक्री और मरम्मत शामिल है) पर सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा है

 जिसके साथ जुर्माना भी भरना पड़ता है। विधेयक न्यूनतम सज़ा को सात से 10 वर्ष करता है।

जिन मामलों में प्रतिबंधित हथियारों (आयुध और अस्त्र-शस्त्र) के इस्तेमाल से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है,

 उस स्थिति में अपराधी के लिये अधिनियम में मृत्यु दंड का प्रावधान था।
विधेयक में इस सज़ा को मृत्यु दंड या आजीवन कारावास किया गया है, जिसके साथ जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

नए अपराध:


विधेयक नए अपराधों को जोड़ता है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
1. पुलिस या सशस्त्र बलों से ज़बरन हथियार लेने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा, साथ ही जुर्माना

2. समारोह या उत्सव में गोलीबारी करने, जिससे मानव जीवन या दूसरों की व्यक्तिगत सुरक्षा खतरे में पड़ती है,

 पर दो साल तक की सज़ा होगी, या एक लाख रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ेगा, या दोनों सज़ाएँ भुगतनी पड़ेंगी।

समारोह में गोलीबारी का अर्थ है, सार्वजनिक सभाओं, धार्मिक स्थलों, शादियों या दूसरे कार्यक्रमों में गोलीबारी करने के लिये बंदूकों का इस्तेमाल करना।

विधेयक संगठित आपराधिक सिंडिकेट्स के अपराधों और गैर-कानूनी तस्करी को भी स्पष्ट करता है।

‘संगठित अपराध’ का अर्थ है, सिंडिकेट के सदस्य के रूप में या उसकी ओर से किसी व्यक्ति द्वारा आर्थिक या दूसरे लाभ लेने के लिये गैर कानूनी तरीकों को अपनाना, जैसे हिंसा का प्रयोग करके या ज़बरदस्ती, गैर-कानूनी कार्य करना।

 संगठित आपराधिक सिंडिकेट का अर्थ है, संगठित अपराध करने वाले दो या उससे अधिक लोग।

अधिनियम का उल्लंघन करते हुए सिंडिकेट के सदस्यों द्वारा बंदूक या गोला बारूद रखने पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।

यह सज़ा उन लोगों पर भी लागू होगी, जो कि सिंडिकेट की ओर से गैर-लाइसेंसशुदा बंदूक संबंधी डील करते हैं (इसमें विनिर्माण या बिक्री भी शामिल है),

 लाइसेंस के बिना बंदूकों में बदलाव करते हैं, या लाइसेंस के बिना बंदूकों का आयात या निर्यात करते हैं।

विधेयक के अनुसार, अवैध तस्करी में भारत या उससे बाहर उन बंदूकों या गोला-बारूद का व्यापार, उन्हें हासिल करना तथा उनकी बिक्री करना शामिल है जो अधिनियम में चिह्नित नहीं हैं या अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।

अवैध तस्करी के लिये 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान है जिसके साथ जुर्माना भी भरना पड़ेगा।

बंदूकों की ट्रैकिंग


केंद्र सरकार आयुध के अवैध विनिर्माण और तस्करी का पता लगाने, उसकी जाँच तथा आकलन करने के लिये विनिर्माणकर्त्ता से लेकर खरीदार तक बंदूकों एवं अन्य अस्त्र-शस्त्रों को ट्रैक करने के नियम बना सकती है।


स्रोत: पी.आई.बी एवं पी.आर.एस,, दृस्टि आईएएस 

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मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

एंटी रेप लॉ


 असल में महिलाओं की सुरक्षा के लिए देश में कई कानून है,  बावजूद इसके देश की आधी आबादी के साथ बहुत ही दर्दनाक और खौफनाक होता जा रहा है |
 बात सिर्फ महिला उत्पीड़न की नहीं बल्कि उससे आगे निकल चुकी है यौन हिंसा,  धमकाना और जान लेना बहुत आम हो गया है. ऐसा लगता है कि महिलाएं समाज में रहकर भी सुरक्षित नहीं है.  महिलाएं घरों के अंदर,  बस,  रेल, सड़क , शौचाल में  भी सुरक्षित नजर नहीं आती. तब प्रश्न ये आता  है कि महिलाएं कब और कहां सुरक्षित होंगी.
 रसूल के आगे सुरक्षा और इज्जत के कोई मायने नहीं है कानून का डर खत्म हो गया है दुष्कर्म विरोधी कानून होने के बावजूद भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की वजह से सारे सवाल अनुत्तरित हैं,
 तो सवाल यही है कि क्यों नहीं रुक पा रही है महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं?
 तथाकथित जागरूक समाज और समाज के ठेकेदार इसे कब तक हलके में लेते रहेंगे
कानूनी मदद और व्यवस्था के तमाम दावे खोखले रहेंगे या कभी इनका असर भी होगा. इस तमाम सवालों के बीच हमारी आज यही जानने की कोशिश है
कि क्या कहता है दुष्कर्म विरोधी कानून?
 निर्भया कांड के बाद उप चीफ जस्टिस जे. यस वर्मा कमेटी की सिफारिशें क्या है?

 संसद में यह मुद्दा

 संसद के दोनों सदनों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध का मुद्दा उठाया गया राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने गंभीर चिंता जताते हुए इस समस्या से निपटने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक स्कील के साथ मानसिकता में बदलाव पर जोर दिया.
 सभी दलों के सांसदों ने एक सुर में ऐसी मामलों में जल्द और सख्त सजा दिए जाने की जरूरत बताया,
 वहीं लोकसभा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार सदस्यों के सुझाव के मुताबिक किसी भी तरह का कानून बनाने को तैयार है.

 सजा

आईपीसी के सेक्शन 375 में बलात्कारी यानी रेपिस्ट के बारे में और सेक्शन 376 में बलात्कार के मामले में सजा का प्रावधान किया गया है
 आईपीसी का सेक्शन 375

 परिभाषा

 जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ, उसके सहमति के बिना,  उसे डरा धमका कर, उसे दिमागी रूप से पागल महिला को धोखा देकर या उस महिला के शराब या नशीले पदार्थ के कारण होश में ना होने पर सभोग करता है, तो उसे बलात्कार कहते हैं|
इसमें चाहे किसी भी कारण से संभोग क्रिया पूरी हुई हो या नहीं कानूनन  वह  बलात्कार के शरीर में ही रखा जाएगा
यदि महिला 18 साल से कम की है तो उसकी मर्जी और मर्जी के खिलाफ सम्भोग करने से बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता है.

 सेक्शन 375 प्रावधान 


आईपीसी के सेक्शन 375 के अनुसार एक व्यक्ति को उस स्थिति में बलात्कार का दोषी माना जाएगा जब वह
अपने लिंग लोगों को किसी भी हद तक एक महिला के मुंह. प्राइवेटपार्ट,  सहित अन्य भागों से प्रवेश करता है या उस महिला को उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए कहता है
इसके अलावा किसी भी हद तक किसी भी वस्तु या लिंग के अलावा शरीर का एक हिस्सा एक महिला के प्राइवेट पार्ट में प्रवेश कराता है उस महिला को उसके साथ यहां किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए कहता है
या एक महिला के किसी भी हिस्से को तोड़ मरोड़ कर उस महिला के प्राइवेट पार्ट या शरीर के किसी भी भाग में प्रवेश कराता है या उस महिला को उसके साथ यह किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करने के लिए कहता है
या अपने मुंह को एक महिला के प्राइवेट पार्ट पर लगाता है या उस महिला को उसके साथ या  किसी अन्य व्यक्ति साथ ऐसा करने के लिए करता है

 प्रावधान सात परिस्थितियां


महिला की मर्जी के खिलाफ
महिला के सहमति के बिना संभोग करना
इसके अलावा महिला की सहमति से लेकिन यह जानते हुए कि वह उसका पति नहीं है और महिला की सहमति दी जाती है क्योंकि वह मानती है कि वह वहीं पुरुष है जिसके साथ उसने कानूनी शादी की है
इसके अलावा महिला की सहमति के साथ जब शराब या किसी नशीले पदार्थ की वजह से होश में नहीं होने पर उसके साथ संभोग किया गया हो
अगर महिला की उम्र 18 साल से कम है तो उसकी सहमति या बिना सहमति से होने वाला शंभू भी बलात्कार की श्रेणी में आता है
जब महिला सहमति व्यक्त करने में असमर्थ हो

 अपवाद


जैसे कोई चिकित्सा प्रक्रिया या चिकित्सा के वक्त हस्तक्षेप बलात्कार नहीं माना जाएगा
किसी व्यक्ति का अपनी पत्नी के साथ संभोग बलात्कार नहीं माना जाएगा यदि पत्नी 15 साल से कम आयु की ना हो

 सजा


आईपीसी की सेक्शन 375 में अपराध के बारे में बताया गया है, वही सेक्शन 376 में सजा का प्रावधान किया गया है
सेक्शन 376 के तहत अगर किसी भी महिला के साथ बलात्कार करने के आरोपी पर मुकदमा चलाया जाता है और वह दोषी साबित होता है तो उसे 7 साल से लेकर उम्र कैद और कुछ मामलों में फांसी की सजा भी हो सकती हैं

 सेक्शन 375 में हुए बदलाव


16 दिसंबर 2012 देश की राजधानी दिल्ली में मानवता को शर्मसार करने वाली  दर्दनाक घटना हुई.
बस में सवार निर्भया के साथ सारी हदें पार कर दी गई
इस घटना ने समाज के हर वर्ग को झकझोर दिया
और रेप लॉ में बदलाव की मांग तेज उठने लगी
सेक्शन 375 में बदलाव के लिए संसद से लेकर सड़क तक बहस शुरू हो गई

 जस्टिस जेएस वर्मा कमिशन

 सिफारिशें

3 सदस्यी  कमेटी ने 29 दिनों में रिपोर्ट तैयार किया
29 जनवरी 2013 को 931 पेज की रिपोर्ट सरकार को सौंपी
इस रिपोर्ट के आधार पर एंटी रेप लॉ के लिए सरकार ने ऑर्डिनेंस जारी किया
सरकार ने आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2013 को लागू किया
 और यह संशोधन अधिनियम 3 फरवरी 2019 से प्रभाव में है

 कानून में बदलाव


रेप को विस्तार से परिभाषित किया गया
रेप हुआ यह माना जाएगा अगर महिला के साथ पुरुष ने जबरन शारीरिक संबंध बनाता है
महिला के प्राइवेट पार्ट में पुरुष द्वारा कोई भी वस्तु डालना
18 साल से कम उम्र में सहमति से संभोग
आईपीसी के सेक्शन 376 के तहत

न्यूनतम 7 साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा काप्रावधान
 सेक्शन 376 ए के तहत प्रावधान

जीव के कारण महिला वेजिटेटिव स्टेज में चली जाए
दोषी को अधिकतम फांसी की सजा


 376 बी के तहत प्रावधान

अलगांव में रह रही पत्नी के साथ रेप करने पर 7 साल से 10 साल तक की सजा

 376c के प्रावधान


सरकारी संरक्षण में रह रही महिला के साथ रेप करने पर 5 साल से 10 साल तक की सजा
गैंगरेप के लिए 376d के तहत सजा का प्रावधान
कम से कम 20 साल और अधिकतम उम्र कैद
376 के तहत दोबारा रेप या गैंग रेप का दोषी पाए  जाने पर
उसे उम्र कैद से  लेकर फांसी तक की सजा होगी

 सेक्शन 354


 कानून में बदलाव



महिला के साथ छेड़छाड़ का दोषी पाए जाने पर
पहले 2 साल की सजा का प्रावधान था
बदलकर 1 साल से अधिकतम 5 साल कैद की सजा
गैर जमानती अपराध की श्रेणी में डाला गया
354 के तहत कई सब सेक्शन जोड़े गए
महिला से अशोभनीय और सेक्सुअल नेचर का व्यवहार करने पर
आईपीसी के सेक्शन 354 ए पार्ट फर्स्ट के तहत महिला से सेक्सुअल डिमांड या फिर आग्रह करने पर
आईपीसी की सेक्शन 354 ए पार्ट 2 के तहत महिला के मर्जी के खिलाफ पोर्नोग्राफी दिखाने पर
आईपीसी की सेक्शन 354 ए पार्ट 3 के तहत महिला को जबरन कपड़े उतारने पर मजबूर करने उतारने पर
केस दर्ज किए जाने का प्रावधान है
दोषी साबित होने पर 3 से 7 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है

 यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण विधेयक

 यौन अपराधों से बचने के लिए सरकार ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण विधेयक 2019 पारित

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

  ट्रांसजेंडर विधेयक 2019

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा


 ट्रांसजेंडर यानी उभय लिंगी व्यक्ति वह व्यक्ति है जिसका लिंग जन्म के समय नियत लिंग से मेल नहीं खाता है इसके तहत ट्रांस मेन यानी उभय  पुरुष या ट्रांस  स्त्री (चाहे ऐसे व्यक्ति में लिंग पुनः  निर्धारण शैल्य क्रिया या हार्मोन चिकित्सा या लेजर चिकित्सा या ऐसी अन्यचिकित्सा करवाई हो या नहीं) इंटर सेक्स और जेंडर क़्वीन  आते हैं, इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्ति जैसे किन्नर, हिजड़ा,  अरावानी और जोगता शामिल है |

 विधेयक 


 ट्रांसजेंडर बिल राज्यसभा मे  पास हो गया है यह लोकसभा से पहले ही पास हो चुका है,
 इसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का समाज के मुख्यधारा में जुड़कर सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें के लिए है,
 24 नवंबर को ट्रांसजेंडर बिल राज्यसभा से पारित हो गया ध्वनिमत से,
 अगस्त में पिछले सत्र के दौरान लोकसभा में यह  विधेयक पारित हो गया था,
 इसके पश्चात राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून का रूप ले लेगा
 ट्रांसजेंडर बिल सरकार ने 19 जुलाई को लोकसभा में पेश किया था,
 जबकि केंद्रीय कैबिनेट ने 10 जुलाई को विधेयक को मंजूरी दे दी थी|


 पहचान से जुड़ा सर्टिफिकेट


ट्रांसजेंडर व्यक्ति डीएम को आवेदन कर सकता है,
ट्रांसजेंडर के रूप में उसकी आईडेंटिटी से जुड़ा सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा,
पुरुष या महिला के तौर पर लिंग परिवर्तन सर्जरी कराने पर यह सर्टिफिकेट भी संशोधित किया जाएगा,

 भेदभाव पर प्रतिबंध




शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा
सार्वजनिक स्तर पर उपलब्ध उत्पादों
सुविधाओं और अवसरों तक पहुंच और उसका उपभोग
कहीं आने जाने का अधिकार
किसी प्रॉपर्टी में निवास,  किराए पर लेने,  स्वामित्व या कब्जे में लेने का अधिकार,
सार्वजनिक व निजी पद को ग्रहण करने का अवसर
किसी सरकारी या किसी निजी प्रतिष्ठान तक पहुंच
जिसकी देखभाल यह निगरानी किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति द्वारा की जाती है
यह सभी शामिल है

 सरकार द्वारा कल्याणकारी उपाय


समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्ति के पूर्व समावेश और भागीदारी को सुनिश्चित करना
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बचाव एवं पुनर्वास की व्यवस्था करना
व्यवसायिक प्रशिक्षण एवं स्वरोजगार के लिए कदम उठाना
ट्रांसजेंडर संवेदी योजनाओं का सृजन करना
सांस्कृतिक क्रियाकलापों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की भागीदारी को बढ़ावा देना

 अपराध और दंड का प्रावधान


भीख मंगवाना, बलपूर्वक या बधुआ मजदूरी करवाना
इसमें सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनिवार्य सरकारी सेवा शामिल नहीं है
ट्रांसजेंडर रोको सार्वजनिक स्थान का प्रयोग करने से रोकना
परिवार गांव आदि में निवास करने से रोकना
शारीरिक यौन, मौखिक भावनात्मक और आर्थिक उत्पीड़ित करना
6 महीने से 2 साल के बीच की सजा और जुर्माना भी हो सकता है इसके लिए

 राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद


 ट्रांसजेनिक व्यक्तियों और विधान संबंधी सरकार को परामर्श देने के लिए एक राष्ट्रीय ट्रांसजेनिक परिषद बनाई जाएगी

परिषद के अध्यक्ष केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री होंगे
सामाजिक न्याय राज्यमंत्री इसके अध्यक्ष होंगे
इसके सदस्यों में सामाजिक न्याय मंत्रालय की सचिव
स्वास्थ्य,  गृह मंत्रालयो,  आवास
मानव संसाधन विकास से संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे
राज्य सरकारों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाएगा
परिषद में ट्रांसजेंडर समुदाय के 5 सदस्य और  गैर सरकारी सदस्य के पांच विशेषज्ञ भी शामिल होंगे
यह परिषद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संबंध में नीतियां, विधान और योजनाएं बनाने और उनका निरीक्षण करने के लिए केंद्र सरकार को सलाह देगी|
यह ट्रांसजेंडर लोगों की शिकायतों का निवारण भी करेगी

 देश में ट्रांसजेंडर की स्थिती 

देश में लगभग 500000 से ज्यादा उभयलिंगी व्यक्ति हैं जनगणना के अनुसार
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे लिंग के रूप में कानूनी मान्यता दी थी ट्रांसजेंडर को
2015 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकारी योजनाओं का लाभ देने की पहल की गई थी
1994 में वोटिंग अधिकार तो दिया गया किंतु बात  अटकी  पहचान पत्र पर उसकी जेंडर  लिखने पर
जनगणना के अनुसार पूरे भारत में सबसे ज्यादा संख्या मैं ट्रांसजेंडर उत्तर प्रदेश में रहते हैं
पूरे भारत में इन की साक्षरता दर 56 परसेंट ही थी

 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार

 प्रयास

सुप्रीम कोर्ट समेत तमाम अदालतों ने दिया दखल
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे लिंग के रूप में ट्रांसजेंडर को कानूनी मान्यता दी
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम केंद्र सरकार मामले में
आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़े को मिलने वाले सभी अधिकार देने का फैसला किया गया
2015 में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद
केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को पत्र लिखकर विपरीत लिंगी समुदाय को सरकारी योजनाओं का लाभ देने का कहा
सरकार ने इसके लिए कार्य योजना बनाने के उद्देश्य से एक समिति का गठन भी किया
एक अंतरलिंगी , अंतर मंत्रालय समिति भी बनाई गई
सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर के लिए राष्ट्रीय नीति बनाने की योजना
ट्रांसजेंडर के लिए कई राज्य ने अपनी नीति अपनाई है
जिसमें तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल आगे हैं
ट्रांसजेंडर्स के लिए असमंजस होता है कि वह महिला टॉयलेट्स का इस्तेमाल करें या पुरुष
शैक्षणिक संस्थानों में उनके लिए अलग टॉयलेट्स बनाने की पहल कई राज्य में कर दी गई है
केंद्र सरकार का ट्रांसजेंडर नागरिकों पर विचार
ST/SC  या अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा मिले
बिल में ऐसे कई प्रावधान किए गए हैं जिससे ट्रांसजेंडर में पूरे देश में बड़ी तब्दीली देखने को मिलेगी
तमिलनाडु समेत कई राज्यों ने ट्रांसजेंडर अधिकारों को कानूनी मान्यता दे दी
इस वर्ग से जुड़े लोगों को सामाजिक तिरस्कार और बिना किसी कानूनी सुरक्षा के बिना जीने के लिए मजबूर होना पड़ा
अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी जिससे उसे जीत मिली है
ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण बिल 2019 पास होने के बाद वेलेंगी व्यक्ति सम्मान के साथ जीवन व्यतीत कर सकेंगे|




भारतीय संविधान  (कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ़ इंडिया)



“ संविधान हमारे देश की लोकतांत्रिक संरचना का सर्वोच्च कानून है   “ -   “राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद
“ अधिकारों के साथ मूल कर्तव्यों का पालन जरूरी”  -  उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू
“भारतीय लोकतांत्रिक अनुभव वास्तव में काफी सकारात्मक रहा “  - उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू
“ अधिकार सुरक्षित रहे इसके लिए कर्तव्यों का पालन भी जरूरी है “  - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
“ संविधान हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्गम भी है और आदर्श भी “ - राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद
“ संविधान हमारे देश की लोकतांत्रिक संरचना का सर्वोच्च कानून है”  - रामनाथ कोविंद 



 भारत का संविधान


 विशेषता

 मूल संविधान मैं प्रस्तावना के साथ 22 भाग 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां हैं
मूल संविधान से संशोधन के बाद से करीब 20 अनुच्छेद और भाग 7 को हटा दिया गया है
और करीब 90 अनुच्छेद  4a, 9a, 9b, 14a यानी चार भागों को जोड़ा गया है
4 अनुसूचियां यानी 9, 10, 11 और 12 को जोड़ा गया
भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है
यह न तो लचीला है ना ही शब्द
संघात्मक के साथ-साथ एकात्मकता की ओर भी झुका हुआ है
आपातकाल के दौरान केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए भी प्रावधान किया गया है भारतीय संविधान में
केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों के कार्य संचालन के लिए व्यवस्थाएं बनाई गई है
सिर्फ एक नागरिकता का प्रावधान किया गया है एकल नागरिकता
भारत सरकार का संसदीय रूप दुनिया में अनोखा है
देश में संसदीय संप्रभुता है तो न्यायिक सर्वोच्चता भी
संविधान एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका प्रणाली उपलब्ध कराता है
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत भी दुनिया में अनोखा है
मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों का भी जिक्र किया गया है भारतीय संविधान में

 भारतीय संविधान का निर्माण प्रक्रिया


 संविधान सभा का उल्लेख पहली बार 1922 में महात्मा गांधी ने किया
 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई
 इस समिति ने जो रिपोर्ट दीया वह नेहरू रिपोर्ट के नाम से मशहूर है
 1934 में कांग्रेस कार्यकारिणी ने संविधान तैयार करने की मांग की थी
 पहली बार संविधान सभा के लिए औपचारिक रूप से एक निश्चित मांग की गई थी
 1936 मैं कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण करने की मांग की गई
 इसके पश्चात 1938 में नेहरू ने घोषणा की कि स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा के द्वारा बिना बाहरी हस्तक्षेप से किया जाएगा
 इसके पश्चात 1940 में ब्रिटिश सरकार ने अगस्त प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया
 1942 में सर स्टेफोर्ड क्रिप्स संविधान के प्रारूप के प्रस्ताव के साथ भारत आए
 लेकिन क्रिप्स प्रस्ताव को मुस्लिम लीग ने अस्वीकार कर दिया
 मुस्लिम लिंग की यह मांग थी कि भारत को दो स्वायत्त हिस्से में बांटा जाए
 इसके बाद पुनः 1946 में ब्रिटिश हुकूमत ने 30 सदस्यीय कैबिनेट मिशन भारत भेजा
 जिसमें लॉर्ड पैथिक लोरेंस, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स और ए वी एलेग्जेंडर शामिल थे
 कैबिनेट मिशन मुस्लिम लिंग की दो संविधान सभा की मांग को खारिज किया
 आखिरकार 389 सीटों में से ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित 296 सीटों के लिए चुनाव किया गया

 जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 208 सीटें तथा मुस्लिम लिंग को 73 सीटें मिली अन्य छोटे समूहों और स्वतंत्र समूह को 15 सीटें मिली

 देसी रियासतों के लिए अलग से 93 सीटें आवंटित की गई थी, लेकिन उन्होंने खुद को इस सभा से बाहर रखने का फैसला किया था
 इसलिए वह सिटें  भर नहीं पाई थी,
 संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुआ था
 मुस्लिम लीग ने अलग पाकिस्तान की मांग को लेकर बैठक का बहिष्कार किया
 पहली बैठक में कुल 211 सदस्यों ने हिस्सा लिया , क्योंकि मुस्लिम लिंग इसका बहिष्कार कर रहा था इसलिए इसमें भाग नहीं लिया था,
 डॉ सच्चिदानंद सिन्हा को सभा का अस्थाई अध्यक्ष चुना गया
 बाद में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सभा के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किए गए
 एचसी मुखर्जी और वीटी कृष्णमाचारी सभा के उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए,


 उद्देश्य प्रस्ताव 

 13 दिसंबर 1946 मैं पंडित नेहरू ने सभा के सामने पहली बार उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया
 इसमें सभा की ढांचा और कामकाज की झलक थी
 इससे भारत को एक स्वतंत्र,  संप्रभु राज्य घोषित किया गया,
 ब्रिटिश भारत के सभी हिस्सों और क्षेत्र को संघ के दायरे में लाया गया
 संप्रभु भारत की सभी अधिकार और शक्तियों का स्रोत जनता को बनाया गया
 न्याय सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता सुरक्षा और समान अवसर, विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहीं भी आने-जाने और संगठन बनाने की स्वतंत्रता जैसे कई बातें घोषित की गई|

 इस प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया|

 प्रारूप समिति



 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति का गठन किया गया
 इसके अध्यक्ष के रूप में डॉ बी आर अंबेडकर को चुना गया.
 इसके अलावा इसमें थे और सदस्य थे|

संविधान सभा के महत्वपूर्ण फैसले

 मई 1949 में राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता की सत्यापन किया गया,
 22 जुलाई 1947 को भारत के राष्ट्रीय ध्वज को अपना गया,
 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सदस्यों ने अंतिम रूप से हस्ताक्षर किए
 24 जनवरी 1950 को ही राष्ट्रीय गीत को भी अपनाया गया,
 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद को पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया

 संविधान का अपनाया जाना 

 इस प्रकार कुल 2 वर्ष 11 माह 18 दिनों में संविधान सभा की 11 प्रमुख बैठके और कई उप समितियों की बैठक हुई,
 डॉक्टर बी आर अंबेडकर की अगुवाई में संविधान निर्माताओं ने 60 देशों के संविधान पर चर्चा की और फिर भारतीय संविधान को बनाया,
 डॉ बी आर अंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया
 इसी दिन संविधान पहली बार पढ़ी गई,
 इस पर 5 दिन तक आम चर्चा हुई तीन बैठके  हुई और आखिरकार 26 नवंबर 1949 को संविधान को सर्वसम्मति से अपना लिया गया,

 संविधान दिवस

 भारत में हर वर्ष 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है,  इसकी शुरुआत डॉक्टर अंबेडकर के 125 वे  जन्म दिवस के शुभ मौके पर 26 नवंबर 2015 में की गई थी
, जिसके बाद से पूरे भारतवर्ष में हर साल संविधान दिवस मनाया जाता है|