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मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Finance commission 


चलिए जानते है फाइनेंस कमिशन के बारे में

 पैसा हम सबके लिए जरूरी है एक परिवारके लिए घर चलाने से लेकर  एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जिस तरह पैसे की जरूरत होती है

 ठीक वैसे ही सरकार को देश या राज्य चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है.

 परिवार में कमाई के बावजूद यदि पैसा कम पड़ जाए तो हम अपने दोस्तों यह मां-बाप से पैसा ले सकते हैं

 संविधान में भी देश को एक परिवार की तरह ही देखा गया है
 इस परिवार के मुखिया यानी केंद्रीय राज्य के पास कमाई की कई स्रोत है

 एक आम परिवार के पास जैसे एक सेविंग अकाउंट होता है ठीक उसी प्रकार केंद्र और राज्य की पूरी कमाई देश के संचित निधि में चला जाता है

 कमाई का हिस्सा भले ही कम या ज्यादा हो लेकिन इसका बटवारा संविधान के मुताबिक समान रूप से होना चाहिए
 और इस कमाई को सब में बराबर तरीके से बांटने का जीमा है 
फाइनेंस कमीशन यानी वित्त आयोग का

 फाइनेंस कमीशन यानी वह संवैधानिक संस्था जो केंद्र से लेकर राज्य के विकास के तमाम कामों के लिए वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करती है

 1951 से लेकर अब तक 15 वित्त आयोग गठित हो चुके हैं

. बैकग्राउंड


फाइनेंस कमीशन को हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के  आर्टिकल 280 में मेंशन किया गया है

चुकी कॉन्स्टिट्यूशन में मेंशन किया गया है इसलिए यह कॉन्स्टिट्यूशन  बॉडी है

यह 22 नवंबर 1951 को गठित हुआ

फाइनेंस कमीशन quasi-judicial बॉडी है

मींस ये  अपनी अपनी खुद की कुछ डिसीजन ले सकती है और इट कैन परफॉर्म ज्यूडिशरी सिस्टम

फाइनेंस कमीशन कांस्टीट्यूट किया जाता है प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया द्वारा

यह हर 5 साल में कांस्टीट्यूट किया जाता है

इसे कुछ कंडीशन पर 5 साल से पहले भी कॉन्स्टिट्यूशन जा सकता है

 कंपोजीशन


इसमें एक चेयरमैन और 4 मेंबर होते हैं

जिसमें दो टेंपरेरी होते हैं दो परमानेंट मेंबर होते हैं

इसे प्रेसिडेंट  अपॉइंट करते हैं

यह अपनी रिअप्वाइंटमेंट के लिए एलिजिबल होते हैं

 क्वालिफिकेशन


 क्या क्वालिफिकेशन होनी चाहिए चेयरमैन या मेंबर को अप्वॉइंट होने के लिए

क्वालीफिकेशन पार्लियामेंट स्पेसिफाइड करती है

पब्लिक अफेयर्स का नॉलेज होना चाहिए चेयरमैन अप्वॉइंट होने के लिए

और 4 मेंबर्स में से पहले मेंबर के लिए जरूरी है कि हाईकोर्ट का जज हो या फिर  हाई कोर्ट का  जज अप्वॉइंट होने के लिए एलिजिबल हो

दूसरे मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके पास स्पेशलाइज नॉलेज होना चाहिए फाइनेंस एंड अकाउंट का

तीसरी मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके वाइड एक्सपीरियंस होना चाहिए फाइनेंस एंड एडमिनिस्ट्रेशन में

चौथे मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके पास स्पेशल नॉलेज होना चाहिए इकोनॉमिक्स का 

 फंक्शंस

 फाइनेंस कमीशन का नाम सुनते ही आप सोच रहे होंगे कि क्या जरूरत है फाइनेंस कमीशन का गठन करने के लिए हमारे देश में
फाइनेंस कमीशन फॉलोइंग मैटर पर रिकमेंडेशन देता है प्रेसिडेंट को

डिसटीब्यूशन करता है टैक्स का सेंट्रल स्टेट के बीच

सहायता में अनुदान कंसोलिडेटेड फंड आफ इंडिया  से दी जाती है उस से रिलेटेड जो भी रिकमेंडेशन होता है वह भी फाइनेंस कमीशन द्वारा दिया जाता है

इसके अलावा पंचायत और म्युनिसिपालिटी के लिए फण्ड  स्टेट फाइनेंस कमिशन द्वारा दिया जाता है लेकिन स्टेट फाइनेंस कमिशन को रिकमेंड करता है सेंट्रल फाइनेंस कमिशन

इन सभी का रिपोर्ट फाइनेंस कमिशन प्रेसिडेंट के पास भेजता है

और प्रेसिडेंट पार्लियामेंट की बोथ हाउसेस लोकसभा और राज्यसभा के सामने पेश करता है

चीजें डिस्कस होती है

हमारे संविधान में यह मेनशन है कि फाइनेंस कमिशन का रिकमेंडेशन गवर्नमेंट के ऊपर  बाइंडिंग नहीं होगा



शनिवार, 11 जुलाई 2020

यूपीएससी क्या है? 


 यूपीएससी भारत की प्रमुख सेंटर रिक्रूटमेंट एजेंसी में से एक है

 यह सभी इंडियंन सर्विसेज और सेंट्रल सर्विसेज के ग्रुप ए और ग्रुप बी  के लिए नियुक्तीया करता है,  और परीक्षाओं का आयोजन भी

 जिसमें देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाएं जैसे आईएएस,  आईपीएस, आईआरएस,  आईएस एनडीए ने आईएफएससी आदि शामिल है

 यूपीएससी कर्मियों के प्रमोशन और ट्रांसफर से संबंधित मामले को भी देखता है

 पृष्ठभूमि

 तो  चली अब यूपीएससी के बैकग्राउंड के बारे में जान लेते हैं

भारत में लोक सेवाओं का जन्म  काल में हुआ

ली कमीशन के सुझाव पर 1926 में पहली बार सेंट्रल पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना की है

ली कमीशन के चेयरमैन ली  वार्कर  थे 

इंडियन गवर्नमेंट एक्ट 1935 के तहत इसका नाम बदलकर फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन यानी संघीय लोक सेवा आयोग कर दिया गया

आजादी के बाद 1950 में कुछ बदलाव कर एवं इसके  अधिकारो में  विस्तार करके इसे  यूपीएससी नाम दिया गया

 कांस्टीट्यूशनल स्टेटस

 चलिए कॉन्स्टिट्यूशन स्टेटस को देखते हैं

यूपीएससी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट 14 के आर्टिकल 315 से 323 के बीच कवर किया गया है

यूपीएससी इंडिपेंडेंस कॉन्स्टिट्यूशन बॉडी है क्योंकि इसका गठन कांस्टीट्यूशनल प्रोविजन के द्वारा किया गया है

कंपोजिशन

 तो चली अब यूपीएससी के कंपोजीशन के बारे में जान लेते हैं

इसमें एक चेयरमैन और कुछ मेंबर होते हैं

इसे प्रेसिडेंट ऑफ पॉइंट करते हैं

कॉन्स्टिट्यूशन में आयोग के सदस्यों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है..

यह राष्ट्रपति के विवेक के ऊपर छोड़ दिया गया है जो आयोग की संरचना का निर्धारण करता है

एलिजिबिलिटी

संविधान कमीशन के सदस्य की एलिजिबिलिटी के संबंध में भी मौन है

हालाकी आवश्यक है कि आयोग की आधे सदस्य को इंडियन गवर्नमेंट या स्टेट गवर्नमेंट के अधीन कम से कम 10 साल का वाकिंग एक्सपीरियंस हो

कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया प्रेसिडेंट को चेयरमैन या मेंबर की सेवा की शर्तें निर्धारित करने का राइट दिया है

 टर्म्स ऑफ़ ऑफिस

6 year or 65 years of age which  ever is earlier 

राष्ट्रपति को कभी भी त्यागपत्र दे सकते हैं

टर्म्स ऑफ़ ऑफिस पूरा होने से पहले भी प्रेसिडेंट द्वारा संविधान में वर्णित प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जा सकता है

 रिमूवल आफ यूपीएससी

प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया निम्नलिखित परिस्थितियों में यूपीएससी के चेयरमैन या मेंबर को हटा सकता है

1.) यदि उस पर्सन को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है

2.) यदि यूपीएससी के मेंबर या चेयरमैन किसी पेड़ एंप्लॉयमेंट में पाए जाते हैं

3.) और यदि प्रेसिडेंट को लगता है कि वह फिजिकली और मेंटली अनफिट है अपने ऑफिस को continue  करने के लिए

4.) प्रेसिडेंट मिसबिहेवियर के आधार पर भी चेयरमैन या मेंबर को हटा सकता है

5.) किंतु इस प्रकार के मैटर की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाती है

6.) प्रेसिडेंट ,सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मैटर में दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य है

 इंडिपेंडेंस ऑफ यूपीएससी

 Security of tenure –

चेयरमैन या मेंबर को प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया संविधान में वर्णित आधार पर ही हटा सकता है

Conditions  of services – 

हालांकि चेयरमैन या मेंबर की सेवा की शर्तें प्रेसिडेंट डिसाइड करता है लेकिन अपॉइंटमेंट के बाद इसमें अलाभ कारी  परिवर्तन नहीं किया जा सकता है

सैलेरी एंड पेंशन से सम्बंधित सभी  खर्चे कंसोलिडेटेड फंड आफ इंडिया यानी भारत की संचित निधि से दी जाती है

यूपीएससी के इंडिपेंडेंट से रिलेटेड एक और प्रोविजन है कॉन्स्टिट्यूशन में

यूपीएससी के चेयरमैन सेंट्रल गवर्नमेंट स्टेट गवर्नमेंट एंप्लॉयमेंट के लिए एलिजिबल नहीं होंगे

इसके अलावा यूपीएससी के जो मेंबर है वह सिर्फ यूपीएससी के चेयरमैन बन सकते हैं या फिर स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन बन सकते हैं

यूपीएससी के चेयरमैन या मेंबर अपने सेकंड टर्म के लिए एलिजिबल नहीं होते

 फंक्शंस ऑफ यूपीएससी

ऑल इंडिया सर्विसेज या अखिल भारतीय सेवाओं सेंट्रल सर्विसेज व यूनियन टेरिटरीज की लोक सेवाओ  में नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का आयोजन करता है

दो या दो से अधिक स्टेट्स द्वारा रिक्वेस्ट करने पर संयुक्त भर्ती की योजना व प्रवर्तन करने में सहायता करता है

किसी राज्यपाल के अनुरोध पर प्रेसिडेंट की स्वीकृति के उपरांत सभी या  किन्ही  मामलों पर राज्यों को सलाह प्रदान करता है

 यूपीएससी की भूमिका

सविधान आशा करता है यूपीएससी इंडिया में मेरिट  system का  प्रहरी होगा
इसके अलावा यह गवर्नमेंट को एडवाइज भी देता है जब consult  किया जाता है

मंगलवार, 7 जुलाई 2020



तो चलिए आज जानेंगे इलेक्शन कमिशन के बारे में इलेक्शन कमिशन की कंपोजिशन एंड फंक्शन के बारे में जानने से पहले चलिए कुछ फैक्ट्स एंड फिगर्स के बारे में जान लेते हैं

हमारा भारत देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ

इंडिया में पहला जनरल इलेक्शन 1951 से 1952 के बीच कंडक्ट कराया गया था

जिसमें 17.3 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स थे

इंडिया के पहले चीफ इलेक्शन कमिश्नर सुकुमार सेन थे

1982 के आसपास ही इंडिया में पहली बार ईवीएम यूज़ की गई थी

1998 तक हम  बैलट पेपर के थ्रू वोट कास्ट करते थे

2004 से वोटिंग के लिए सिर्फ ईवीएम मशीन यूज़ की जाती है

हमारे करंट चीफ इलेक्शन कमिश्नर है सुनील अरोड़ा


 क्या आपको पता है 17th  जनरल इलेक्शन में दुनिया के सबसे ज्यादा रजिस्टर वोटर थे 900000000 रजिस्टर वोटर
 अब आप सोच रहे होंगे कि मैं बार-बार जनरल इलेक्शन का नाम क्यों ले रही हूं
  •  इंडिया में चार प्रकार के इलेक्शन होते हैं

1. लोक सभा इलेक्शन या जनरल इलेक्शन
2. राज्य सभा इलेक्शन
3. स्टेट असेंबली इलेक्शन
4. पंचायत और म्युनिसिपालिटी इलेक्शन


 चलिए आगे बढ़ते हैं अच्छा आपको यह तो पता ही होगा कि हमारे 
गवर्नमेंट के तीन और organs  होते हैं

1. लेजिसलेटिव
2. एग्जीक्यूटिव
3. ज्यूडिशरी

अब चुके हमारे कंट्री में फेडरल सिस्टम फॉलो होता है

फेडरल सिस्टम मींस जो भी पावर है  उसे इक्वली सेंटर और स्टेज के बीच बांटा जाता है

इसलिए व्यवस्थापिका को भी दो पार्ट में डिवाइड किया गया है सेंट्रल और स्टेट

स्टेट में होता है स्टेट लेजिसलेच्योर जिसे विधानसभा भी बोला जाता है

वही सेंटर में होता है पार्लियामेंट

पार्लियामेंट दो हाउसेस से मिलकर बनता है लोकसभा और राज्यसभा

राज्यसभा में मैक्सिमम ढाई सौ मेंबर्स हो सकते हैं और इसी करंट ऑक्युपेंसी है 245 सीट की

इसका सीट एलोकेशन भी देख लेते हैं

233 मेंबर्स स्टेट असेंबली से आते हैं

वहीं 12 मेंबर्स डायरेक्टरी प्रेसिडेंट नॉमिनेट करते हैं

अब लोकसभा को देखते हैं इसकी मैक्सिमम ऑक्युपेंसी 552 मेंबर की है

और इसकी करंट ऑक्युपेंसी 545 मेंबर के हैं

इसमें 530 मेंबर्स स्टेट से आते हैं 20 यूनियन टेरिटरीज जाते हैं वही दो एंग्लो इंडियन प्रेसिडेंट अप्वॉइंट करते हैं

लोकसभा में जिसके पास 50% से ज्यादा शीर्ष आती हैं वही गवर्नमेंट फार्मूलेट करता है


 तो चलिए अब इलेक्शन कमीशन के कंपोजीशन के बारे में जान लेते हैं
हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट 15 के आर्टिकल 324 से 329 के बीच में इलेक्शन कवर किया गया है

आर्टिकल 324 यह कहता है कि हमारे कंट्री में एक इंडिपेंडेंट इलेक्शन कमिशन होगा जो फ्री एंड फेयर इलेक्शन कंडक्ट करवा सकें

आर्टिकल 324 ये भी कहता है कि पार्लियामेंट,  स्टेट असेंबली, प्रेसिडेंट,  वाइस प्रेसिडेंट इन चारों का इलेक्शन इलेक्शन कमिशन ही कंडक्ट करवाएगा

पंचायत और म्युनिसिपालिटीज का इलेक्शन स्टेट इलेक्शन कमिशन कंडक्ट कराता है

याद रखिए स्टेट इलेक्शन कमिशन और इलेक्शन कमिशन 2 डिफरेंट और इंडिपेंडेंट अथॉरिटी से

 
 हमारा इलेक्शन कमीशन एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो अन्य इलेक्शन कमिश्नर से मिलकर बना है

चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो इलेक्शन कमिश्नर इन तीनों को प्रेसिडेंट appoint  करते हैं

इन तीनों के पावर इक्वल होते हैं

अगर कोई डिस्प्यूट होता है तो वोटिंग के थ्रू मेजॉरिटी से सॉल्व कर लिया जाता है

और इन तीनों की सैलरी इक्वल होता है और सिमिलर होता है सुप्रीम कोर्ट के जज से

इनका टर्म्स ऑफ़ ऑफिस होता है 6 ईयर या फिर 65 ईयर of age which ever is earlier

1950 से 1989 तक हमारा इलेक्शन कमिशन एक सिंगर मेंबर बॉडी था

 अब चलते हैं आर्टिकल 326 पर जो हमें right to vote प्रदान करता है

1988 तक आर्टिकल 326 कहता था कि वोटिंग का मैक्सिमम एज 21 ईयर होगा

लेकिन 1988 में 61st amendment act के थ्रू मिनिमम वोटिंग एज 21 ईयर्स कम करके 18 ईयर कर दिया गया

हम यह रिड्यूस की थी तो वोटर्स बढ़ गए थे और उनके साथ साथ काम भी

इसलिए 1989 में सिंगल मेंबर बॉडी बन गया मल्टी मेंबर बॉडी

लेकिन 1990 को इस पोजीशन को फिर से रिवर्स कर दिया गया और इसे बना दिया गया सिंगर नंबर बॉडी

पर 1993 को इस पोजीशन को फिर से रिवर्स किया गया

और 1993 से आज तक हमारा इलेक्शन कमिशन मल्टी मेंबर बॉडी है

 कुछ और ऑफिसर का नाम जान लेते हैं

District  में जो भी इलेक्शन होता है उन इलेक्शन को सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं district इलेक्शन ऑफीसर

स्टेट या यूनियन टेरिटरी में जो भी इलेक्शन होते हैं उसे सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं चीफ इलेक्शन ऑफिसर

पार्लियामेंट में जो भी इलेक्शन होते हैं उसको सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं रिटर्निंग ऑफिसर

 दोस्तों उम्मीद करती हूं कि आपको मेरे इस ब्लॉग से कुछ नया सीखने को मिला होगा यदि हां तो प्लीज  शेयर करना न भूले |

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020


चीन की राजनीतिक व्यवस्था,  राष्ट्रीय जन -कांग्रेस के  कार्य व अधिकार के बारे में समझाइए

चीन – 

चीनी जनवादी -गणराज्य एशिया महाद्वीप के पूर्व में स्थित 1.3 अरब जनसंख्या वाला देश है, यह क्षेत्रफल के दृस्टि से रूस, कनाडा, अमेरिका के बाद विश्व में चौथा स्थान  रखता  है |

इतना अधिक क्षेत्रफल होने के कारण यह बहुत से देशो के साथ सीमा साझा करता है (लगभग रूस के बराबर ) ही.

उत्तर से दक्षिण की ओर – रूस, मंगोलिया, ताईवान, भारत, तिबत, नेपाल, भूटान, भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान इत्यादि |

रूस में साम्यवाद का पतन होने के बावजूद भी चीन साम्यवाद को अपनाया हुआ है

चीनी सविधान – 

चीन में सविधान पहली बार 1954 में बना था जिसमे 106 अनुच्छेद थे,  दूसरी बार 1975 में बना था जिसमे 38 अनुच्छेद था,

  तीसरी बार 1982 में बना था जो सबसे लम्बा सविधान है इसमें 138 अनुच्छेद है और यही सविधान आज तक चीन में लागु है |

 चीन के सविधान की विशेषताए –

1. लिखित एवं विस्तृत सविधान 


2. समाजवादी गणराज्य की स्थापना – 

पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के पतन के बावजूद भी चीन ने साम्यवाद का मार्ग नही त्यागा है |

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपनाये जाने के बावजूद भी सैद्धांतिक रूप से चीन अपने आप को ‘समाजवादी ‘ कहता है |

3.जनता की सम्प्रभुत्ता –

चीन के सविधान में सम्प्रभुता वहाँ कीं जनता में निहित है |
सविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार,

“चीनी जनवादी गणराज्य में सम्पूर्ण सत्ता का वास जनता में होगा |”

 साथ ही यह भी कहा गया है की इस सत्ता का प्रयोग राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस तथा स्थानीय जनवादी कांग्रेस के माध्यम से किया जायेगा

4.लोकतांत्रिक केन्द्रवाद – 

 पुराने साम्यवादी देशों में अपनाइ गयी व्यवस्था को बनाए रखते हुए इनकी शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक केंद्र वाद के सिद्धांत को बनाया गया है

इस सिद्धांत के अनुसार शासन के सभी प्रतिनिधि अंग नीचे से ऊपर की ओर निर्वाचित होते हैं

 नीचे की इकाइयां ऊपर की इकाई का निर्वाचन करती है यह तो हुआ  लोकतंत्र|

 दूसरी ओर शासन की सभी ऊपर की इकाइयों के आदेश को नीचे की इकाइयों को मानना पड़ता है यह हुआ केंद्रवाद |

5. एकात्मक शासन-

 चीन में एकात्मक शासन की व्यवस्था की गई है संविधान कोई शक्ति विभाजन नहीं करता परंतु चीन के एक विशाल देश होने के कारण ऐसा स्वभाविक है |

कि प्रशासनिक सुविधा के लिए चीन कई प्रांतों में बांटा जाए चीन में 21 प्रांत 5 स्वायत्तशासी क्षेत्र तथा तीन महानगर हैं तिब्बत और सिंकियांग स्वायत्तसासि  क्षेत्र है

एवं स्पीकिंग शंघाई और तिनसिन महानगर है चीन के प्रांत स्वायत्त शासित क्षेत्र तथा महानगरों की नगरपालिका है सभी अपनी शक्तियां केंद्र से ही प्राप्त करते हैं|

6. बहुराष्ट्रीय समाज –

 एकात्मक शासन होती हुई भी चीन में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि उसका समाज एक बहुल  समाज है |

 वहां कई राष्ट्रीयताये हैं| देश में लगभग 60 जातियां हैं जिनके रीति-रिवाज और संस्कृति को सुरक्षित रखने का आश्वासन दिया गया  है,

चीन में विभिन्न जाति के लोगों को राष्ट्रीय अल्प तम कहा गया जबकि रूस में इन्हें अल्पतम राष्ट्रीयता कहा जाता है |

7. मौलिक अधिकार – 

 चीन के संविधान की एक जोरदार बात यह भी है कि संविधान अपने नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार भी प्रदान करता है|

 अधिकारों में सर्वाधिक उल्लेखनीय है संपत्ति का अधिकार| मेहनत से और वैध उपायों से अर्जित की गई संपत्ति रखने का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है
संविधान के अनुच्छेद 38 से 45 तक नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों का वर्णन है |

 संपत्ति के अधिकार की व्यवस्था है परंतु साथ ही संविधान में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक हित के लिए राज्य संपत्ति अधिग्रहित कर सकता है|

संपत्ति के अधिकार के अतिरिक्त चीन में नागरिकों को और भी कई अधिकार दिए गए हैं जैसे - मत देने का अधिकार,  विचार और अभिव्यक्ति का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार,

  काम पाने  का अधिकार,  सामाजिक सुरक्षा का अधिकार,  कानून के समक्ष समानता का अधिकार,  अधिकार केवल दिखावटी हैं

 चीन के संविधान में अधिकारों का उल्लेख किया गया है सविधान में अधिकारों के क्रियान्वयन का कोई उपबंध  नहीं किया गया है|

8. मौलिक कर्तव्य- 

 चीन के संविधान में अधिकारों के साथ कर्तव्य का भी उल्लेख किया गया है किन का संविधान कर्तव्य को और अधिक करता है

कर्तव्य किस सूची में जिन कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है उनमें मुख्य  कर्तव्य है- क़ानून का पालन,  सार्वजानिक सम्पति की रक्षा, करो का भुकतान तथा मातृभूमि की रक्षा  करना |

 प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है कि वह इन कर्तव्यों का सम्मान करें और इनका पालन करें|

9. एक सदनात्मक व्यवस्था- 

चीन में विधि निर्माण सम्बन्धी समस्त शक्तियो  का वार संसद में है| संसद है - राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस इसमें जनता तथा विभिन्न

स्थानीय निकायों व व्यवसायिक संगठनों से प्रतिनिधि चुने जाते हैं 1987 में इस कांग्रेस की सदस्य संख्या 2978 थी|
10. शासन का स्वरूप मंत्रीमंडलात्मक- 

 चीन में शासन का स्वरूप काफी हद तक मंत्रीमण्डलात्मक ही   है यद्यपि चीन  में राष्ट्रपति भी है
और उपराष्ट्रपति भी परंतु कार्यपालिका की वास्तविक शक्तियों का वास प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल में मंत्रिमंडल राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के प्रति उत्तरदाई है

राष्ट्रपति के पति नहीं मंत्रिमंडल के सदस्य संख्या निश्चित नहीं है इसे परिवर्तन होता रहता है|


 राष्ट्रीय जन कांग्रेस के कार्य –

1. कानून निर्माण करने का कार्य करता है
2. प्रधानमंत्री के नाम का प्रस्ताव तो राष्ट्रपति करता है किंतु राष्ट्रपति के नाम निर्देशन के पश्चात राष्ट्रीय जन कांग्रेश उस पर विचार करती  हैं
3. राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के सदस्यों को मंत्रिपरिषद से प्रश्न पूछने का अधिकार है
4. राष्ट्रीय जन कांग्रेस परिषद के सदस्य को आवश्यकतानुसार परिचित भी कर सकती हैं
5. राष्ट्रीय जन कांग्रेस की स्थाई समिति को परिषद के कार्य की देखभाल करने तथा उसके निर्णय एवं आज्ञपतियों को  संविधान विरूद्ध  होने की स्थिति में रद्द घोषित करने का अधिकार है

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

भारतीय विधि आयोग

विधि आयोग - Law commission of india
विधि आयोग 

परिचय

भारतीय विधि आयोग न तो एक संवैधानिक निकाय है और न ही वैधानिक निकाय। यह भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है। इसका प्रमुख कार्य है, कानूनी सुधारों हेतु कार्य करना।

आयोग का गठन एक निर्धारित अवधि के लिये होता है और यह विधि और न्याय मंत्रालय के लिये परामर्शदाता निकाय के रूप में कार्य करता है।

इसके सदस्य मुख्यतः कानून विशेषज्ञ होते हैं।
भारत में विधि आयोग का इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से समय-समय पर सरकार द्वारा विधि आयोग गठित किये गए और कानून की उन शाखाओं में जहाँ सरकार को आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ स्पष्टीकरण, समेकन और संहिताकरण हेतु विधायी सुधारों की सिफारिश करने के लिये उन्हें सशक्त किया गया।

ऐसा प्रथम आयोग वर्ष 1834 में 1833 के चार्टर एक्ट के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में गठित किया गया था जिसने दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को संहिताबद्ध करने की सिफ़ारिश की।

इसके बाद द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ विधि आयोग, जो क्रमशः वर्ष 1853, 1861 और 1879 में गठित किये गए थे, ने 50 वर्ष की अवधि में उस समय प्रचलित अंग्रेजी क़ानूनों के पैटर्न पर, जिन्हें कि भारतीय दशाओं के अनुकूल किया गया था, की व्यापक किस्मों से भारतीय विधि जगत को समृद्ध किया।

भारतीय नागरिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय संविदा अधिनियम, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम आदि प्रथम चार विधि आयोगों का परिणाम हैं।

विधि आयोग के कार्य

विधि आयोग केंद्र सरकार द्वारा इसे संदर्भित या स्वतः किसी मुद्दे पर कानून में शोध या भारत में विद्यमान कानूनों की समीक्षा तथा उनमें संशोधन करने और नया कानून बनाने हेतु सिफारिश करता है।

उन नए क़ानूनों के निर्माण का सुझाव देता है जो नीति-निर्देशक तत्त्वों को लागू करने और संविधान की प्रस्तावना में तय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये आवश्यक हैं।

न्यायिक प्रशासन: कानून और न्यायिक प्रशासन से सम्बद्ध किसी विषय, जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत विशेष रूप से विधि आयोग को संदर्भित किया हो, पर विचार करना और सरकार को इस पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

शोध: किसी बाहरी देश को शोध उपलब्ध कराने हेतु निवेदन पर विचार करना जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत इसे संदर्भित किया हो।

लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से मौजूदा कानूनों की जाँच करना और उनमें संशोधन सुझाना।

अपनी सिफ़ारिशों को ठोस रूप देने से पहले आयोग नोडल मंत्रालय/विभाग और ऐसे अन्य हितधारकों से परामर्श करता है जिसे कि आयोग इस उद्देश्य के लिये आवश्यक समझे।

विधि आयोग के प्रतिवेदन

भारत के विधि आयोग ने अभी तक विभिन्न मुद्दों पर 277 प्रतिवेदन (Reports) प्रस्तुत किये हैं, उनमें से कुछ अद्यतन प्रतिवेदन हैं: प्रतिवेदन संख्या 277 अनुचित तरीके से मुक़दमा चलाना (अदालत की गलती): कानूनी उपाय

प्रतिवेदन संख्या 272 – भारत में ट्रिब्यूनलों की वैधानिक संरचनाओं का आकलन

प्रतिवेदन संख्या 271 – ह्यूमन DNA प्रोफाइलिंग

प्रतिवेदन संख्या 270 – विवाहों का अनिवार्य
पंजीकरण या अस्वीकार किया जा सकता है। इन सिफ़ारिशों पर कार्यवाही उन मंत्रालयों/विभागों पर निर्भर है जो सिफारिशों की विषय वस्तु से संबंधित हैं।


विधि आयोग में सुधारों की दरकार

20वें विधि आयोग के अध्यक्ष ए.पी. शाह ने विधिआयोग के सुधारो का समर्थन किया था,  जो निम्नलिखित है -

विधिक हैसियत: इस निकाय को स्वायत्त एवं सक्षम बनाने के लिये यह आवश्यक है कि इसे विधिक आयोग का दर्जा दिया जाए।

21वें विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गया था, किंतु 22वें विधि आयोग का गठन अभी तक नहीं किया जा सका है।

नियुक्ति: विधि आयोग के सदस्यों की नियुक्ति केवल अध्यक्ष से परामर्श के पश्चात् ही की जानी चाहिये। वर्तमान व्यवस्था में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कई बार भेदभाव और पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।

स्वायत्तता: वर्तमान व्यवस्था में विधि सचिव तथा विधायी विभाग के सचिव विधि आयोग के पदेन सदस्य होते हैं।

अब तक तीन-वर्षीय कार्यकाल वाले कुल 21 विधि आयोग गठित किये जा चुके हैं, जिनमें से 21वें विधि आयोग की कार्यावधि 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गई,

22 वा विधि आयोग 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के 22वें विधि आयोग के गठन को तीन साल की अवधि के लिए मंजूरी दे दी है।

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बीएस चौहान की निगरानी भारत के 21 वें विधि आयोग की स्थापना 2015 में की गई थी और इसका कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 तक था। पैनल में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, चार पूर्णकालिक सदस्य (एक सदस्य सचिव सहित), कानून और विधायी विभागों के सचिव और पदेन सदस्य होंगे और साथ ही पांच से अधिक अंशकालिक सदस्य नहीं होंगे।




गुरुवार, 30 जनवरी 2020

बजट क्या है | इसके प्रकार | इसका  महत्त्व  और  प्रक्रिया
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Budget 

जब कभी हम “बजट” शब्‍द सुनते हैं तो हमें तुरन्‍त सरकार द्वारा प्रतिवर्ष पेश किए जाने वाले बजट की याद आती है|

 इस बजट के माध्यम से हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि सरकार ने अगले वित्‍त वर्ष के लिए किन चीजों पर कर (Tax) बढ़ाकर उनके मूल्‍य में वृद्धि कर दी है

और किन चीजों पर सब्सिडी (Subsidy) के माध्‍यम से अथवा किसी अन्‍य तरीके से मूल्‍य में कुछ कमी करते हुए आम लोगों को राहत दी है.

लेकिन क्या आपको पता है कि बजट का अर्थ क्या होता है और यह कितने तरह का होता है?

 इस लेख में हम बजट की परिभाषा और उसके वर्गीकरण का विवरण दे रहे हैं, जिससे बजट के संबंध में आपकी समझ और भी विकसित होगी|

बजट शब्द अंग्रेजी के शब्द "bowgette" से ली गई है जिसकी उत्पत्ति फ्रेंच शब्द “bougette” से हुई है| “bougette” शब्द भी “Bouge” से बना है जिसका अर्थ चमड़े का बैग होता है|

बजट क्‍या है?

सरकार की आय एवं व्यय का एक विवरण जिस प्रपत्र में एकत्रित किया जाता है, उसे बजट कहते है|

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बजट में  विगत वर्ष के आय और व्यय के अनुमानों का वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत किया जाता है|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 में बजट निर्माण के विषय में बताया गया है |

लोकसभा में केंद्र सरकार के वित्तमंत्री के द्वारा बजट पेश किया जाता है, इस बजट को केंद्रीय बजट के नाम से जाना जाता है|

राज्य सरकार में बजट राज्य वित्त मंत्री के द्वारा पेश किया जाता है, यह केवल उसी राज्य के लिए निर्धारित किया जाता है ।

जो कि पूरी तरह से आर्थिक मामलों से जुड़ा होता है।

 साल भर कौन सी योजनाएं काम करेंगी किसके लिए कितना बजट है,

शिक्षा, कृषि, परिवहन, स्‍वास्‍थ्‍य, रक्षा और आम आदमी से जुड़े अन्‍य कई जरुरतों पर बजट पेश किया जाता है जिसके लिए एक राशि भी तय की जाती है।

 जिसके हिसाब से सरकार काम करती है और उसके बाद राज्‍य सरकारों की अपनी भी कुछ बजट योजनाएं होते है |


सरकार द्वारा हर साल बजट क्यों बनाया जाता है?  (What is the purpose of a budget)


सरकार हर साल बजट बनाकर दो काम करती है-

1. अगले वित्तवर्ष में देश के विभिन्‍न क्षेत्रों (जैसे- उद्योग, विनिर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि) में किए जाने वाले विभिन्‍न प्रकार के विकास कार्यों में होने वाले खर्चों का अनुमान लगाती है।

2. अगले वित्तवर्ष के लिए अनुमानित खर्चों को पूरा करने के लिए धन (Funds) की व्‍यवस्‍था करने के लिए सम्‍यक उपाय

(जैसे- कुछ चीजों पर कुछ खास तरह के नए Tax लगाने या बढ़ाने अथवा किसी वस्तु या सेवा पर पहले से दी जा रही सब्सिडी (Subsidy) को कम या खत्‍म करना आदि) करती है।

यानी सरल शब्‍दों में कहें तो सरकार ये निश्चित करती है कि उसे अगले वर्ष देश के विकास से संबंधित किन चीजों पर प्राथमिकता के साथ खर्च करना है

और उन खर्चों के लिए धन की व्‍यवस्‍था कैसे करनी है।

आय (Income) व व्‍यय (Expenditure) के इसी ब्‍यौरे का नाम बजट (Budget) है और प्रत्‍येक बजट एक निश्चित अवधि के लिए बनाया जाता है।
source-jagaranjosh.com

बजट के प्रकार (Types Of Budget)

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भारत में बजट पांच प्रकार के प्रयोग किये जाते है –
आम बजट
निष्पादन बजट
जिरोबेस बजट
आउटकम बजट
जेंडर बजट


1) आम बजट 


वर्तमान समय के “आम बजट” का प्रारंभिक स्वरूप “पारम्परिक बजट (Traditional Budget) कहलाता है|

आम बजट का मुख्य उद्देश्य “विधयिका” और “कार्यपालिका” पर वित्तीय नियंत्रण स्थापित करना है|

इस बजट में सरकार की आय और व्यय का लेखा-जोखा होता है|

 इस बजट में सरकार अगले वित्त वर्ष में किस क्षेत्र में कितना धन खर्च करेगी,

उसका उल्लेख तो करती है लेकिन इस खर्च से क्या-क्या परिणाम होंगे उनका ब्यौरा नहीं दिया जाता है|
अतः इस प्रकार के बजट का उद्देश्य सरकारी खर्चों पर नियंत्रण करना तथा विकास कार्यों को लागू करना था न कि तीव्र गति से विकास करना था|

 अतः पारम्परिक बजट की अवधारणा स्वतंत्र भारत की समस्याओं को सुलझाने तथा विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रही|

परिणामस्वरूप भारत में “निष्पादन बजट (Performance Budget)” की आवश्यकता और महत्व को स्वीकार किया गया और इसे पारम्परिक बजट के “पूरक” के रूप में पेश किया जाता है| 

2 ) निष्पादन बजट


बजट का वह स्वरूप जिसका निर्माण परिणामों को ध्यान में रखकर किया जाता है, वह निष्पादन बजट कहा जाता है।

निष्पादन बजट (Performance Budget) में सरकार उपलब्धियों पर ध्यान रखते हुए प्रस्तावित कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं उनपर खर्च किए जाने वाले सभी मदों का मूल्यांकन आदि किया जाता है।

इसे उपलब्धि बजट भी कहा जाता है। निष्पादन बजट का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका में किया गया।

भारतीय संसद में पहली बार 25 अगस्त, 2005 को निष्पादन बजट तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा प्रस्तुत किया गया।


3) जिरोबेस बजट (Zero Base Budget)


आय कम होने और व्यय अधिक होने की परिस्थति में इस बजट को जारी किया जाता है,

 जिससे व्ययों पर कटौती करके घाटों पर अंकुश लगाया जा सके|

4) आउटकम बजट


आउटकम बजट एक नए प्रकार का बजट है। इसके अन्तर्गत साधनों के साथ-साथ उन लक्ष्यों को भी निर्धारित कर दिया जाता है,

 जिन्हें प्राप्त करना आवश्यक माना जाता है। इस बजट के अन्तर्गत एक वित्त वर्ष के लिए किसी मंत्रालय अथवा विभाग को
आबंटित किए गए बजट में मूल्यांकन किए जा सकने वाले भौतिक लक्ष्यों का निर्धारण इस उद्देश्य से किया जाता है,

जिससे बजट के क्रियान्वयन को परखा जा सके।

आउटकम बजट सामान्य बजट की तुलना में एक जटिल प्रक्रिया है,

जिसमें वित्तीय प्रावधानों को परिणामों के सन्दर्भ में देखा जाना होता है। भारत में इसकी शुरुआत पी. चिदम्बरम ने वर्ष 2005 में की थी


जेंडर बजट (Gender Budget)


भारत सरकार द्वारा निर्मित ऐसा बजट जो कार्यों और योजनाओं का आवंटन लिंग के आधार पर करता है

 इस बजट के द्वारा महिला अधिकारिता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया गया है |


भारतीय बजट के प्रमुख दस्तावेज़ (Major Documents of Indian Budget)

भारतीय बजट के प्रमुख दस्तावेज़ इस प्रकार है |
  1. वित्तमंत्री का भाषण
  2. वार्षिक वित्तीय कथन
  3. बजट का सार
  4. वित्त विधेयक
  5. बजट प्राप्तियाँ
  6. बजट व्यय
  7. अनुदान की माँग

बजट का महत्व और प्रक्रिया(Importance And Process Of  Budget)

बजट द्वारा सरकार के सभी कार्य निर्धारित किये जाते है|

सरकार द्वारा संचालित सभी योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था बजट के माध्यम से ही किया जाता है |

 सरकार बिना बजट के एक रूपये का व्यय नहीं कर सकती है |
बजट में प्रत्येक वर्ष नयी योजनाओं की घोषणा होती है और टैक्स में संसोधन किया जाता है,

जिसका सीधा प्रभाव जनता पर पड़ता है, बजट में किये गए सभी प्रावधान तब तक लागू नहीं किये जा सकते है,

जबतक संसद के द्वारा पास नहीं किया जाता है |
बजट को वित्त विधेयक द्वारा पेश किया जाता है| वित्त विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है|

 बजट लोकसभा में पास होने के बाद राज्य सभा के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है,

यदि राज्य सभा  इस पर 14 दिन के अंदर स्वीकृति प्रदान नहीं करती है, तो बजट को पास मान लिया जाता है,

और वित्तीय वर्ष की पहली तिथि को बजट में किये गए प्रावधान पूरे देश में लागू कर दिया जाता है |
राज्य सरकार द्वारा निर्मित बजट केवल राज्य की सीमाओं तक के लिए मान्य रहता है |

बजट में यदि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बजट में विरोधाभास होता है, तो केंद्र सरकार के बजट को मान्यता प्रदान की जाती है |

निष्कर्ष 

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यहाँ पर हमनें आपको बजट के विषय में जानकारी उपलब्ध करायी है, यदि इस जानकारी से सम्बन्धित आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्न आ रहा है, अथवा इससे सम्बंधित अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो कमेंट बाक्स के माध्यम से पूँछ सकते है,  हम आपके द्वारा की गयी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार कर रहे है |



सोमवार, 20 जनवरी 2020

Why 'make in india ' has failed? मेक इन इंडिया क्यों फेल हुआ? 



यह बहुत महत्वाकांक्षी है, और बहुत सारे क्षेत्रों को अपनी तह में ले आया है

25 सितंबर 2014 को, भारत सरकार ने भारत में विनिर्माण को प्रोत्साहित करने और विनिर्माण

और सेवाओं में समर्पित निवेशों के साथ अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए  मेक इन इंडिया ’पहल की घोषणा की।

लॉन्च के तुरंत बाद, करोड़ों की निवेश प्रतिबद्धताओं की घोषणा की गई थी।

 2015 में, अमेरिका और चीन को पछाड़कर भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए शीर्ष स्थान के रूप में उभरा।

राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुरूप, राज्यों ने भी अपनी पहल शुरू की।

 पांच साल बाद, जैसा कि हम एक और केंद्रीय बजट के लिए प्रस्ताव देते हैं,
यह सामान्य रूप से अर्थव्यवस्था के रूप में बहुप्रचारित पहल का जायजा लेने के लिए उपयुक्त होगा,
और विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र एक फिसलन ढला


मेक इन इंडिया ’का विचार नया नहीं है। कारखाने का उत्पादन देश में एक लंबा इतिहास रहा है।

हालाँकि, इस पहल ने भारत को एक वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया।

 इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, लक्ष्यों की पहचान की गई और नीतियों की रूपरेखा तैयार की गई।

 तीन प्रमुख उद्देश्य थे:

 (ए) अर्थव्यवस्था में क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर को 12-14% प्रति वर्ष तक बढ़ाना;

 (b) 2022 तक अर्थव्यवस्था में 100 मिलियन अतिरिक्त विनिर्माण रोजगार सृजित करना; और

 (ग) यह सुनिश्चित करने के लिए कि विनिर्माण क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 2022 तक बढ़ाकर 2022 (संशोधित 2025) वर्तमान 16% हो जाएगा।

नीति का दृष्टिकोण निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाना, आधुनिक और कुशल बुनियादी ढाँचे का विकास करना और विदेशी पूंजी के लिए नए क्षेत्रों को खोलना था।

विफल करने के लिए डिज़ाइन किया गया?


यह देखते हुए कि 'मेक इन इंडिया ’जैसी भव्य पहलों के लिए बड़ी टिकट परियोजनाओं में लंबी अवधि के अंतराल और प्रभाव होते हैं,

ऐसी पहल का आकलन समय से पहले हो सकता है। इसके अलावा, सरकारें अक्सर व्यापक आर्थिक समस्याओं से त्रस्त अर्थव्यवस्था के उत्तराधिकार के बहाने का उपयोग करती हैं,

और चीजों को सही तरीके से स्थापित करने के लिए अधिक समय की मांग करती हैं।

यह एक तर्क है कि वर्तमान सरकार अक्सर आक्रमण करती है। हालांकि, परिणामों की दिशा और परिमाण का आकलन करने के लिए पांच साल एक उचित समय अवधि है।

 चूंकि नीतिगत बदलावों का उद्देश्य विनिर्माण क्षेत्र के तीन प्रमुख चर -

 निवेश, उत्पादन और रोजगार में वृद्धि की शुरूआत करना था - इनकी एक परीक्षा से हमें नीति की सफलता का पता लगाने में मदद मिलेगी।

पिछले पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था में निवेश की धीमी वृद्धि देखी गई।
यह तब और अधिक है जब हम विनिर्माण क्षेत्र में पूंजी निवेश पर विचार करते हैं।

निजी क्षेत्र की सकल निश्चित पूंजी निर्माण, कुल निवेश का एक उत्पाद , 2017-18 में सकल घरेलू उत्पाद का 28.6% घटकर 2013-14 में 31.3% था (आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19)।

दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की हिस्सेदारी कमोबेश समान रही,

लेकिन निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 24.2% से घटकर 21.5% रह गई।

 इस समस्या के कुछ हिस्से को अर्थव्यवस्था में बचत दर में गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

 घरेलू बचत में गिरावट आई है, जबकि निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र की बचत में वृद्धि हुई है।

इस प्रकार हम एक ऐसा परिदृश्य पाते हैं जहां निजी क्षेत्र की बचत बढ़ी है, लेकिन निवेश के अच्छे माहौल प्रदान करने के लिए नीतिगत उपायों के बावजूद निवेश में कमी आई है।

उत्पादन वृद्धि के संबंध में, हम पाते हैं कि विनिर्माण से संबंधित औद्योगिक उत्पादन के मासिक सूचकांक में अप्रैल 2012 से नवंबर 2019 की अवधि के दौरान केवल दो बार ही दोहरे अंकों में वृद्धि दर दर्ज की गई है।

 वास्तव में, डेटा यह दर्शाता है कि अधिकांश महीनों के लिए , यह 3% या उससे कम था और कुछ महीनों के लिए नकारात्मक भी।

कहने की जरूरत नहीं है कि नकारात्मक विकास से तात्पर्य क्षेत्र के संकुचन से है। इस प्रकार, हम स्पष्ट रूप से विकास के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

रोजगार वृद्धि के संबंध में, हमने मौजूदा डेटा संग्रहण तंत्र को संशोधित करने के प्रयासों के साथ-साथ डेटा जारी करने में सरकार की देरी पर भी सवाल उठाए हैं।

 बहस का मुद्दा यह है कि रोजगार, विशेष रूप से औद्योगिक रोजगार, श्रम बाजार में नई प्रविष्टियों की दर के साथ तालमेल रखने के लिए नहीं बढ़ा है।

इस प्रकार तीनों गणनाओं में, 'मेक इन इंडिया' विफल रहा है।

नीति आकस्मिकता

पिछली सरकारों पर नीतिगत पक्षाघात का आरोप लगाते हुए, एनडीए सरकार ने आकर्षक नारों के साथ नीतियों की एक निंदा की घोषणा की।

 इस योजना के कभी न खत्म होने वाली घोषणाओं का युग रहा है। ‘मेक इन इंडिया स्कीम ’की घोषणाओं की एक सतत धारा का एक अच्छा उदाहरण है।

 घोषणाओं के दो प्रमुख लक्ष्य थे। सबसे पहले, इन योजनाओं के थोक उत्पादन के लिए निवेश और वैश्विक बाजारों के लिए विदेशी पूंजी पर बहुत अधिक निर्भर करता था।

इससे एक इनबिल्ट अनिश्चितता पैदा हो गई, क्योंकि घरेलू उत्पादन की योजना कहीं और मांग और आपूर्ति की स्थिति के अनुसार बनाई जानी थी।

 दूसरे, नीति निर्माताओं ने अर्थव्यवस्था में तीसरे घाटे की उपेक्षा की, जो कि कार्यान्वयन है।

जबकि अर्थशास्त्री ज्यादातर बजट और राजकोषीय घाटे के बारे में चिंता करते हैं, नीति कार्यान्वयनकर्ताओं को अपने निर्णयों में कार्यान्वयन घाटे के निहितार्थों को ध्यान में रखना चाहिए।

इस तरह की नीति निरीक्षण का परिणाम भारत में बड़ी संख्या में रुकी हुई परियोजनाओं में स्पष्ट है।

उन्हें लागू करने के लिए तैयारियों के बिना नीति घोषणाओं का स्थान नीति आकस्मिकता ’है।

 ‘मेक इन इंडिया’ को बड़ी संख्या में कम-तैयार पहलों से ग्रस्त किया गया है।

एक सवाल जो जवाब देता है, वह यह है कि India मेक इन इंडिया ’विफल क्यों हुआ? इसके तीन कारण हैं।

 सबसे पहले, इसने विनिर्माण क्षेत्र को प्राप्त करने के लिए बहुत महत्वाकांक्षी विकास दर निर्धारित की।

12-14% की वार्षिक वृद्धि दर औद्योगिक क्षेत्र की क्षमता से परे है। ऐतिहासिक रूप से भारत ने इसे हासिल नहीं किया है

और इस तरह की क्वांटम कूद के लिए क्षमताओं का निर्माण करने की उम्मीद करना शायद सरकार की कार्यान्वयन क्षमता का एक बहुत बड़ा आधार है।

दूसरा, इस पहल ने कई क्षेत्रों को अपनी चपेट में ले लिया। इससे नीतिगत फ़ोकस का नुकसान हुआ।

इसके अलावा, इसे घरेलू अर्थव्यवस्था के तुलनात्मक लाभों की किसी भी समझ से रहित नीति के रूप में देखा गया।

तीसरा, वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता और बढ़ती व्यापार संरक्षणवाद को देखते हुए, पहल शानदार रूप से बीमार थी।

‘मेक इन इंडिया’ एक नीतिगत पहल है जिसमें इनबिल्ट विसंगतियां हैं। विरोधाभासों का बंडल तब सामने आता है

जब हम विदेशी पूंजी के साथ स्वदेशी ’उत्पादों की असंगति की जांच करते हैं।

इसने एक ऐसे परिदृश्य को जन्म दिया है जहा व्यापार करने में आसानी ’की रैंकिंग में एक मात्रा में उछाल है,

लेकिन निवेश अभी भी आने बाकी हैं। विनिर्माण गतिविधि को बढ़ाने के लिए अर्थव्यवस्था को पॉलिसी विंडो ड्रेसिंग की तुलना में बहुत अधिक आवश्यकता है।

सरकार को यह महसूस करना चाहिए कि संसद में बिलों की एक श्रृंखला और निवेशकों की बैठक की मेजबानी से औद्योगीकरण को शुरू नहीं किया जा सकता है।

Source - The Hindu


शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

The Personal Data Protection Bill, 2019: How it differs from the draft Bill
पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019: यह ड्राफ्ट बिल से कैसे अलग है



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पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019 को हाल ही में संसद में पेश किया गया था।

विधेयक को विस्तृत जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है,

 और समिति को बजट सत्र, 2020 के अंतिम सप्ताह तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने की उम्मीद है।

विधेयक व्यक्तियों के व्यक्तिगत डेटा (डेटा के रूप में जाना जाता है) के संरक्षण के लिए प्रदान करना चाहता है।

, और अन्य संस्थाओं द्वारा इस तरह के व्यक्तिगत डेटा को संसाधित करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करता है (जिसे डेटा फ़िड्यूशियरीज के रूप में जाना जाता है)।

 यह डेटा प्रिंसिपल को उनके डेटा के संबंध में कुछ अधिकारों के साथ प्रदान करता है,

जैसे कि सुधार की मांग करना, पूरा करना या अपने डेटा को अन्य फ़िदुकियों को हस्तांतरित करना।

इसी प्रकार, यह कुछ दायित्वों को निर्धारित करता है, और अन्य पारदर्शिता और जवाबदेही के उपायों को डेटा फ़िडयूरी द्वारा किया जाता है,

जैसे कि व्यक्तियों की शिकायतों को दूर करने के लिए शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना।

 व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को कुछ मामलों में विधेयक के प्रावधानों से छूट दी गई है

, जैसे कि राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, या किसी अपराध की रोकथाम, जांच, या अभियोजन के लिए।

 विधेयक विधेयक के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने और आगे के नियमों को प्रदान करने के लिए एक डेटा सुरक्षा प्राधिकरण भी स्थापित करता है।



2019 विधेयक की वस्तुओं और कारणों के विवरण के अनुसार, विधेयक के प्रावधान विशेषज्ञ समिति (अध्यक्ष: न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण) की रिपोर्ट की सिफारिशों पर आधारित हैं, 

जिन्होंने व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से संबंधित मुद्दों की जांच की और एक मसौदा प्रस्तावित किया पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2018।

 । इस ब्लॉग में, हम देखते हैं कि 2019 विधेयक 2018 ड्राफ्ट बिल से कैसे भिन्न है।


2019 विधेयक के साथ 2018 ड्राफ्ट बिल के प्रावधानों की तुलना

ड्राफ्ट पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2018


परिभाषा - व्यक्तिगत डेटा विशेषताओं, लक्षणों या पहचान की विशेषताओं से संबंधित है, जिसका उपयोग किसी व्यक्ति की पहचान करने के लिए किया जा सकता है।


संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा-

संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा में स्वास्थ्य, यौन जीवन, यौन अभिविन्यास, वित्तीय डेटा, पासवर्ड, आदि से संबंधित व्यक्तिगत डेटा शामिल हैं।

डेटा संरक्षण प्राधिकरण किसी अन्य व्यक्तिगत डेटा को संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा के रूप में वर्गीकृत कर सकता है।

व्यक्तिगत अधिकार (डेटा प्रिंसिपल)-

डेटा प्रिंसिपल के पास अपने डेटा के संबंध में कुछ अधिकार होते हैं जैसे कि इस बात की पुष्टि करना कि क्या उनके डेटा को संसाधित किया गया है, उनके डेटा के निरंतर प्रकटीकरण पर सुधार, स्थानांतरण या प्रतिबंध की मांग की गई है।


सोशल मीडिया बिचौलिए (Social media intermediaries) –


मसौदा विधेयक में यह शब्द नहीं था

व्यक्तिगत डेटा की गैर-सहमति प्रसंस्करण (Non-consensual processing of personal data) – 


व्यक्तिगत डेटा को कुछ आधारों पर व्यक्ति की सहमति प्राप्त किए बिना संसाधित किया जा सकता है।

 इनमें शामिल हैं: (i) संसद या राज्य विधानमंडल का कोई कार्य,

 (ii) यदि राज्य द्वारा व्यक्ति को लाभ प्रदान करने के लिए आवश्यक हो, और
 (iii)
 प्राधिकरण द्वारा निर्दिष्ट उचित उद्देश्यों के लिए, जैसे धोखाधड़ी का पता लगाना, ऋण वसूली, और ध्यानाकर्षण।


व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सरकार के लिए छूट-

राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में व्यक्तिगत डेटा को संसाधित करते समय राज्य को विधेयक के प्रावधानों से छूट दी गई है।

हालांकि, इस तरह के प्रसंस्करण को एक कानून द्वारा अनुमति दी जानी चाहिए और प्राप्त होने वाले हितों के अनुपात में होना चाहिए।

इसके अलावा, इस तरह के प्रसंस्करण उचित और उचित तरीके से किया जाना चाहिए।


छोटी संस्थाओं द्वारा मैन्युअल प्रसंस्करण के लिए छूट –


पारदर्शिता और जवाबदेही के उपाय और कुछ अन्य दायित्व छोटी संस्थाओं पर लागू नहीं होंगे।

 ये वे विधियाँ हैं जो:

(i) का वार्षिक टर्नओवर 20 लाख रुपये से कम है (या इस तरह की निर्धारित राशि), और

 (ii) अंतिम वर्ष में किसी भी एक दिन में 100 से अधिक व्यक्तियों के डेटा को संसाधित नहीं करता है।

देश के बाहर व्यक्तिगत डेटा का स्थानांतरण-


सभी व्यक्तिगत डेटा की एक सेवारत प्रति भारत में संग्रहीत की जानी चाहिए।

डाटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी ऑफ इंडिया की संरचना -


एक चयन समिति की सिफारिशों पर केंद्र सरकार द्वारा प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की जाएगी। चयन समिति में शामिल होंगे:

 (i) भारत के मुख्य न्यायाधीश या अध्यक्ष के रूप में सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश

, (ii) कैबिनेट सचिव, और

(iii) डेटा सुरक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी और संबंधित विषयों के क्षेत्र में विशेषज्ञ।

डाटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी ऑफ इंडिया की संरचना -


विधेयक के तहत, जैसे अपराध:

 (i) अधिनियम के उल्लंघन में व्यक्तिगत डेटा प्राप्त करना, प्रकट करना, स्थानांतरित करना या बेचना, और

(ii) डी-आइडेंटिड पर्सनल डेटा की पहचान (डेटा जिसमें से पहचानकर्ता हटा दिए गए हैं) ) सहमति के बिना, कारावास के साथ दंडनीय हैं।


गैर-व्यक्तिगत और अनाम निजी डेटा -


डिजिटल अर्थव्यवस्था, विकास या सुरक्षा के लिए नीतियों के निर्माण के लिए सरकार द्वारा उपयोग किए गए गैर-व्यक्तिगत डेटा पर विधेयक का कोई प्रावधान लागू नहीं होगा।

 पर्सनल डाटा प्रोटक्शन बिल 2019-


 परिभाषा –विधेयक परिभाषा को बरकरार रखता है और कहता है कि इस तरह की विशेषताओं या लक्षणों में प्रोफाइलिंग के उद्देश्य से इस तरह के डेटा से खींची गई कोई भी प्रविष्टि शामिल होगी।


संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा-

विधेयक संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा की श्रेणी से पासवर्ड निकालता है।

संवेदनशील निजी डेटा के रूप में व्यक्तिगत डेटा को और अधिक वर्गीकृत करने की शक्ति केंद्र सरकार (डेटा संरक्षण प्राधिकरण और परामर्शदाता संबंधित क्षेत्र के परामर्श से) के साथ निहित होगी


व्यक्तिगत अधिकार (डेटा प्रिंसिपल)-


विधेयक व्यक्तिगत डेटा के उन्मूलन का अधिकार प्रदान करता है जो अब उस उद्देश्य के लिए आवश्यक नहीं है

 जिसके लिए इसे संसाधित किया गया था, डेटा प्रिंसिपल के लिए एक अतिरिक्त अधिकार के रूप में।

सोशल मीडिया बिचौलिए (Social media intermediaries) –


विधेयक एक सोशल मीडिया मध्यस्थ को एक मध्यस्थ के रूप में परिभाषित करता है

 जो उपयोगकर्ताओं के बीच ऑनलाइन संपर्क को सक्षम करता है और जानकारी साझा करने की अनुमति देता है।

सभी सोशल मीडिया बिचौलियों को एक महत्वपूर्ण सीमा के ऊपर महत्वपूर्ण डेटा फ़िड्यूशियरीज़ (उपयोगकर्ताओं के साथ फ़िड्यूसीरीज़ के रूप में वर्गीकृत किया गया है

, जिनके कार्य चुनावी लोकतंत्र या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं) को भारत में सभी उपयोगकर्ताओं के लिए एक स्वैच्छिक उपयोगकर्ता सत्यापन तंत्र प्रदान करना होगा।

व्यक्तिगत डेटा की गैर-सहमति प्रसंस्करण (Non-consensual processing of personal data) –


विधेयक संसद या राज्य विधायिका के किसी भी कार्य पर प्रावधान को व्यक्तिगत डेटा के गैर-सहमति प्रसंस्करण के लिए एक आधार के रूप में हटाता है।

विधेयक में खोज इंजन के संचालन को एक उचित उद्देश्य के रूप में जोड़ा गया है,

जिसके लिए प्राधिकरण द्वारा व्यक्तिगत डेटा के गैर-सहमति प्रसंस्करण की अनुमति दी जा सकती है।

व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सरकार के लिए छूट-


कुछ मामलों में व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए अपनी किसी भी एजेंसी को अधिनियम के किसी भी या सभी प्रावधानों से छूट दे सकती है।

 इनमें शामिल हैं:

(i) राज्य की सुरक्षा के हित में, सार्वजनिक आदेश, भारत की संप्रभुता और अखंडता और विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, और

(ii) उपरोक्त मामलों से संबंधित किसी भी संज्ञेय अपराध के कमीशन को रोकने के लिए।

छोटी संस्थाओं द्वारा मैन्युअल प्रसंस्करण के लिए छूट –


विधेयक छोटी संस्थाओं के लिए छूट बरकरार रखता है। हालाँकि, यह निर्धारित सीमा के साथ दूर होता है

 और प्राधिकरण को फिदायीनरी के वार्षिक कारोबार और इस तरह के फिदायी द्वारा संसाधित किए गए डेटा की मात्रा के आधार पर छोटी संस्थाओं के रूप में वर्गीकृत करने की अनुमति देता है।


देश के बाहर व्यक्तिगत डेटा का स्थानांतरण- 


विधेयक देश में सभी व्यक्तिगत डेटा के अनिवार्य भंडारण के प्रावधान को हटा देता है।

यह प्रदान करता है कि संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा को भारत में संग्रहीत किया जाना चाहिए।

इस तरह के डेटा को भारत से बाहर स्थानांतरित किया जा सकता है

यदि व्यक्ति द्वारा स्पष्ट रूप से सहमति दी जाती है, और कुछ अतिरिक्त शर्तों के अधीन है।

डाटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी ऑफ इंडिया की संरचना –


विधेयक में यह प्रावधान है कि चयन समिति में शामिल होंगे:

(i) कैबिनेट सचिव, अध्यक्ष के रूप में,

(ii) सचिव, कानूनी मामलों के विभाग और

(iii) सचिव, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय


गैर-व्यक्तिगत और अनाम निजी डेटा –


विधेयक प्रावधान को बनाए रखता है और आगे प्रदान करता है कि सरकार डेटा फ़िडयूशियरीज़ को इसे प्रदान करने के लिए निर्देशित कर सकती है:

(i) गैर-व्यक्तिगत डेटा और

 (ii) अनाम निजी डेटा (जहाँ डेटा प्रिंसिपल की पहचान करना संभव नहीं है) सेवाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण के लिए और साक्ष्य-आधारित नीति का निर्माण


Source - prsindia.org


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बुधवार, 15 जनवरी 2020

Detention in Democracies




वर्ष 2019 में दुनिया के लगभग 20 देशों में कई महत्वपूर्ण सामूहिक विरोध प्रदर्शन हुए।

लोकतंत्र में कमी, व्यवस्था में कठोरता और भ्रष्टाचार के कारण विरोध प्रदर्शन भड़क उठे और लोगों को सड़कों पर आने को मजबूर होना पड़ा।

 प्रदर्शनकारियों को पिटाई, चोट और मौत जैसी शारीरिक शक्ति का सामना करना पड़ा है।

सवाल उठता है कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं और अगर ये विरोध लोकतंत्र का हिस्सा और पार्सल है।

लोकतंत्र शब्द का अर्थ


 लोकतंत्र शब्द का अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चीजों से होता है

जो प्रतिपादक के दार्शनिक, वैचारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

 ह्यूमन राइट्स पर वियना घोषणा में कहा गया है-

 कि लोकतंत्र लोगों की अपनी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रणालियों का निर्धारण करने के लिए स्वतंत्र रूप से व्यक्त की गई इच्छा पर आधारित है

और उनके जीवन के सभी पहलुओं में उनकी पूर्ण भागीदारी है।

 संयुक्त राष्ट्र महासभा की रिपोर्ट, 1995 कहती है कि-

लोकतंत्र कुछ राज्यों से कॉपी किया जाने वाला मॉडल नहीं है, बल्कि सभी लोगों द्वारा प्राप्त किया जाने वाला एक लक्ष्य है और सभी संस्कृतियों द्वारा अपनाया जाता है।

यह समाजों की विशेषताओं और परिस्थितियों के आधार पर कई रूप ले सकता है।

एक लोकतंत्र में मूल अधिकार जीवन, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता, न्यायिक पहुंच और समीक्षा और गैर-भेदभाव हैं।

 ये अधिकार मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित हैं। लोकतंत्र और उसके बहुलवादी चरित्रों में मतदाताओं के प्रति जवाबदेही, सार्वजनिक अधिकारियों के दायित्व का पालन करना कानून और न्याय को निष्पक्ष रूप से प्रशासित करना है।

 लोकतंत्र में, किसी को भी मनमानी हिरासत, यातना या अन्य क्रूर अमानवीय या अपमानजनक उपचार या सजा के अधीन नहीं किया जाएगा।

 नजरबंदी का इस्तेमाल


19 वीं सदी में, यूरोपीय देशों ने एक बार फिर राजनीतिक विरोधियों और आपराधिक संदिग्धों के खिलाफ नजरबंदी का इस्तेमाल जारी रखा।

हालांकि, 20 वीं शताब्दी में, निरोध का व्यापक रूप से न केवल यूरोप में, बल्कि पूरे विश्व में उपयोग किया गया था।

यूरोप में साम्यवाद, नाज़ीवाद और फासीवाद के उदय के साथ नज़रबंदी का चलन बहुत बढ़ गया। 

इटली के फासीवादी शासन और जर्मनी के नाज़ी शासन ने नजरबंदी और अन्य क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक उपचार या राजनीतिक विरोधियों,

युद्ध के कैदियों और कब्जे वाले क्षेत्रों और यहूदियों की आबादी के खिलाफ सजा का इस्तेमाल किया।

 एशिया, अफ्रीका और पश्चिम एशिया में कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्ट राज्यों ने राजनीतिक विरोधियों और विद्रोहियों के खिलाफ व्यापक रूप से नजरबंदी का इस्तेमाल किया,

जिन्होंने इस दौरान सत्ता हासिल की। इसके साथ, राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट के उदय के साथ, लोगों को हिरासत में लेने की प्रथा 20 वीं सदी में काफी हद तक बढ़ गई है
स्वतंत्रता आंदोलन।

 निरोध दुनिया भर में कानूनी सिद्धांत क्या है


वर्तमान समय में, निरोध का व्यापक रूप से लोकतांत्रिक देशों द्वारा अपने ही नागरिकों के खिलाफ अभ्यास किया जाता है यदि वे सरकार के खिलाफ आ रहे हैं।

लोकतांत्रिक देश देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसे सही ठहराते हैं।

 निरोध दुनिया भर में कानूनी सिद्धांत बन गया है।

 इसके उपयोग का उद्देश्य राज्य को उन व्यक्तियों से बचाना है जो इसके खिलाफ गलत कर रहे हैं।

 देश, चाहे लोकतांत्रिक हो या अलोकतांत्रिक, असंतोष और राजनीतिक खतरों को नियंत्रित करने के लिए नजरबंदी के अलग-अलग तरीके हैं।

दुनिया भर के उदाहरण हैं, जहां लोग कई कारणों से अपनी सरकार के खिलाफ सामने आए।.

जिन देशों में इस तरह के विरोध प्रदर्शन हुए, लोगों को या तो पुलिस की क्रूरता का सामना करना पड़ा, हिरासत में लिया गया या उन्हें मार दिया गया।

भ्रष्टाचार और तानाशाही से लड़ने के लिए वेनेजुएला ने इतिहास रचा। 


दूसरे शब्दों में, यह एक सत्तावादी वामपंथी और कुलीन वर्ग के बीच संघर्ष था,

जिसने दोनों पक्षों को बड़ी भीड़ जुटाते हुए देखा और दोनों लोकतांत्रिक रूप से वैध सरकार का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे थे।

निकोलस मादुरो के नेतृत्व में कई वर्षों से वेनेजुएला आर्थिक संकट में है,
जिन्होंने 2013 में पदभार संभाला था।

 विरोध करने वाले लोग मादुरो के बजाय जुआन गुआदो को सत्ता में लाना चाहते थे।

विपक्ष ने दावा किया कि मादुरो ने अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, और चुनाव नाजायज था।

 यह तर्क दिया गया है कि मादुरो ने राजनीतिक विरोधियों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया और कुछ को देश से भागने के लिए मजबूर किया।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश क्रिश्चियन ज़र्पा भी विरोध में यह कहते हुए देश से भाग गए कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं थे।
 इस मामले की जांच करते हुए, संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) मिशन ने चुनाव को लोकतंत्र का अपमान भी कहा

 विभिन्न देशों में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ


हैती में, सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ।

प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के इस्तीफे, भ्रष्टाचार के उन्मूलन और देश की स्थानिक गरीबी से निपटने के लिए सामाजिक कार्यक्रमों के प्रावधान की मांग की।

सर्बिया में, लोकतंत्र के लिए एक व्यापक अभियान का आह्वान किया गया था

और सरकारी विरोधियों के कथित उत्पीड़न की निंदा की गई थी।
 इक्वाडोर में, तब विरोध प्रदर्शन हुए जब सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के सुधार पैकेज को अपनाया जिसमें ईंधन की सब्सिडी को हटाना और रहने की लागत में अन्य वृद्धि शामिल थी।

हालाँकि, ये विरोध प्रदर्शन जल्द ही समाप्त हो गया क्योंकि सरकार ने समर्थन वापस ले लिया और सुधारों को वापस ले लिया।

चिली में, जब सरकार ने ट्रेन किराया बढ़ाया और पेंशन प्रणाली के निजीकरण के बारे में प्रदर्शन किया गया।

अजरबैजान में, बढ़ती बेरोजगारी और असमानता के खिलाफ और राजनीतिक कैदियों की रिहाई और स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए विरोध करने के लिए विरोध प्रदर्शन हुए।

इसी तरह, 15 नवंबर 2019 को ईरान में विरोध प्रदर्शन हुए, सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमतों में 200% की बढ़ोतरी के घंटों बाद।

 देश, जो पहले से ही अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बोझ के नीचे था,

ने वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के खिलाफ सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।


 भारत में विरोध प्रदर्शन



 भारत, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है, नागरिक (संशोधन) अधिनियम (CAA) और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) के विरोध में भी खड़ा है।

 ये दोनों कानून संविधान के खिलाफ हैं क्योंकि कानून ज्यादातर समाज के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं।...

हालांकि, भारत के लोग इन कानूनों के खिलाफ धर्म, क्षेत्र और जाति से बेपरवाह थे।

राज्य ने इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का प्रयोग किया। कानपुर में 15 प्रथम सूचना रिपोर्टों के तहत 21,000 से अधिक लोगों को बुक किया गया है।

 निष्कर्ष


 अगर असंतोष को लोकतंत्र का हिस्सा और पार्सल माना जाता है,

तो दुनिया में क्रूरता और नजरबंदी की गुंजाइश क्यों है?
.
दुनिया भर की सरकारें विरोध प्रदर्शनों को खतरा क्यों मानती हैं?
अगर इन देशों में असंतोष के लिए कोई जगह नहीं है, तो ऐसे देशों को लोकतांत्रिक कहना गलत है।
.

Source - epw



मंगलवार, 14 जनवरी 2020

Private property is a human right: Supreme Court 



क्या पढाई करनी है?

प्रीलिम्स के लिए: संपत्ति का अधिकार

मेन्स के लिए: न्यायालय द्वारा किए गए अवलोकन और उनका महत्व।

संदर्भ:  

"सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में माना है कि किसी नागरिक का निजी संपत्ति पर अधिकार एक मानव अधिकार है

और राज्य कानून और प्रक्रिया के अधिकार का पालन किए बिना उस पर कब्जा नहीं कर सकता है।"

मुद्दा क्या है?


हिमाचल प्रदेश सरकार ने 1967 में एक सड़क बनाने के लिए जबरन चार एकड़ जमीन हथियापुर जिले के एक व्यक्ति को दे दी।

52 साल बाद भी, राज्य मुआवजे का भुगतान करने में विफल रहा है।

अपीलार्थी अपने अधिकारों से पूरी तरह अनभिज्ञ था और कानून में अधिकार प्राप्त नहीं था,

और राज्य द्वारा अनिवार्य रूप से ली गई भूमि के मुआवजे के लिए कोई कार्यवाही दायर नहीं की थी।

जब उसकी याचिका उच्च न्यायालय द्वारा ठुकरा दी गई, तो अपीलकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

संपत्ति का अधिकार:


‘संविधान के अनुच्छेद ३१ के तहत निजी संपत्ति का अधिकार पहले एक मौलिक अधिकार था।

1978 में 44 वें संविधान संशोधन के साथ संपत्ति एक मौलिक अधिकार है।

फिर भी, अनुच्छेद 300A में राज्य को अपने निजी संपत्ति से किसी व्यक्ति को वंचित करने के लिए उचित प्रक्रिया और कानून के अधिकार का पालन करने की आवश्यकता थी।

संपत्ति का अधिकार अब न केवल संवैधानिक या वैधानिक अधिकार माना जाता है, बल्कि एक मानव अधिकार है


"निजी भूमि को हथियाना और उसे अपना दावा करना राज्य को अतिक्रमणकारी बनाता है '

एक नागरिक का निजी संपत्ति पर अधिकार एक मानवीय अधिकार है।

 राज्य नियत प्रक्रिया और अधिकार कानून का पालन किए बिना उस पर अपना कब्जा नहीं कर सकता, सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय लिया है।"


अदालत ने कहा कि राज्य किसी नागरिक की निजी संपत्ति को नष्ट नहीं कर सकता है और फिर poss प्रतिकूल कब्जे ’के नाम पर भूमि के स्वामित्व का दावा कर सकता है।

निजी भूमि को हथियाना और फिर इसे अपना दावा करना राज्य को अतिक्रमणकारी बनाता है।

एक कल्याणकारी राज्य में, संपत्ति का अधिकार एक मानवीय अधिकार है, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और अजय रस्तोगी की खंडपीठ ने अपने 8 जनवरी के फैसले में घोषित किया।

प्रतिकूल कब्जे

*
“कल्याणकारी राज्य को प्रतिकूल कब्जे की दलील देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है,

* जो एक ट्रैपेसर यानी किसी व्यक्ति को यातना, या यहां तक कि एक अपराध के लिए अनुमति देता है,

*12 साल से अधिक के लिए ऐसी संपत्ति पर कानूनी अधिकार हासिल करने के लिए।

 * न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने फैसला सुनाते हुए अपने स्वयं के नागरिकों की संपत्ति हड़पने के लिए राज्य को अपने कब्जे के सिद्धांत पर कब्जा करने का अधिकार नहीं दिया।

फिर भी, यह ठीक वैसा ही है, जैसा विधवा देवी के साथ 52 साल पहले हुआ था। हिमाचल प्रदेश सरकार ने 1967 में सड़क बनाने के लिए जबरन अपनी चार एकड़ जमीन हथियापुर जिले में ले ली।

न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने बताया कि कैसे राज्य ने सुश्री देवी की अशिक्षा का लाभ उठाया और 52 वर्षों के लिए उन्हें मुआवजा देने में विफल रही।


अपीलकर्ता [सुश्री देवी] एक अनपढ़ विधवा होने के नाते, एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली, अपने अधिकारों से पूरी तरह अनजान थी और कानून में अधिकार नहीं रखती थी,

और राज्य द्वारा अनिवार्य रूप से ली गई भूमि के मुआवजे के लिए कोई कार्यवाही दायर नहीं की थी

, “न्यायमूर्ति मल्होत्रा ने सुश्री देवी के साथ सहानुभूति व्यक्त की , जो अभी 80 साल का है।


एचसी को स्थानांतरित करता है


सुश्री देवी ने पहली बार अपने पड़ोसियों से 2010 में मुआवजे के अधिकार के बारे में जाना, जिन्होंने अपनी संपत्ति भी खो दी थी।

फिर, 70 के दशक में, उसने अपनी बेटी के साथ हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में सीधे राज्य के खिलाफ उनकी लड़ाई में शामिल होने के लिए सीधे मार्च करने का समय नहीं गंवाया।

लेकिन उच्च न्यायालय ने उसे निचली अदालत में दीवानी मुकदमा दायर करने के लिए कहा।

निराश होकर सुश्री देवी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

राज्य को मुआवजे के रूप में crore 1 करोड़ का भुगतान करने का आदेश देते हुए,

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 1967 में, जब सरकार ने जबरन सुश्री देवी की भूमि पर कब्जा कर लिया,

तो संविधान के अनुच्छेद 31 के तहत  निजी संपत्ति का अधिकार अभी भी एक मौलिक अधिकार था ’।

"1978 में 44 वें संविधान संशोधन के साथ संपत्ति एक मौलिक अधिकार बन गई। फिर भी, अनुच्छेद 300A में राज्य को अपने निजी संपत्ति से वंचित करने के लिए कानून और प्रक्रिया के अधिकार का पालन करने की आवश्यकता थी, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को याद दिलाया।"


Sorce -the hindu


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शनिवार, 28 दिसंबर 2019

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के तहत तलाक का प्रावधान


प्रीलिम्स के लिये -

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

मेन्स के लिये -

महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय


चर्चा में क्यों है?
 


हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद-142 का प्रयोग करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज (Irretrievable Breakdown of Marriage) को तलाक का आधार माना।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955


हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् १९५५ में पारित एक कानून है।

इसी कालावधि में तीन अन्य महत्वपूर्ण कानून पारित हुए:

हिन्दू उत्तराधिका अधिनियम, हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम और हिन्दू एडॉप्शन और भरणपोषण अधिनियम

. ये सभी नियम हिन्दुओं के वैधिक परम्पराओं को आधुनिक बनाने के ध्येय से लागू किए गये थे।

मुख्य बिंदु:


वर्तमान में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार नहीं माना जाता हैं।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये अनुच्छेद-142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया है।

हिंदू विवाह अधिनियम,1955 में तलाक का आधार:


हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की प्रक्रिया दी गई है जो कि हिंदू, बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म को मानने वालों पर लागू होती है।

इस अधिनियम की धारा-13 के तहत तलाक के निम्नलिखित आधार हो सकते हैं:

o व्यभिचार (Adultry)- यदि पति या पत्नी में से कोई भी किसी अन्य व्यक्ति से विवाहेतर संबंध स्थापित करता है तो इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।

o क्रूरता (Cruelty)- पति या पत्नी को उसके साथी द्वारा शारीरिक, यौनिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो क्रूरता के तहत इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।

o परित्याग (Desertion)- यदि पति या पत्नी में से किसी ने अपने साथी को छोड़ दिया हो तथा तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले वे लगातार दो वर्षों से अलग रह रहे हों।
o धर्मांतरण (Proselytisze)- यदि पति पत्नी में से किसी एक ने कोई अन्य धर्म स्वीकार कर लिया हो।

o मानसिक विकार (Unsound Mind)- पति या पत्नी में से कोई भी असाध्य मानसिक स्थिति तथा पागलपन से ग्रस्त हो और उनका एक-दूसरे के साथ रहना असंभव हो।

इसके अलावा अधिनियम की धारा-13B के तहत आपसी सहमति को तलाक का आधार माना गया है।

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) की धारा-27 में इसके तहत विधिपूर्वक संपन्न विवाह के लिये तलाक के प्रावधान दिये गए हैं।

हालाँकि इन दोनों अधिनियमों में से किसी में भी इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार नहीं माना गया है।


इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज

(Irretrievable Breakdown of Marriage):

हाल ही में के आर. श्रीनिवास कुमार बनाम आर. शमेथा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों की जाँच करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को आधार मानते हुए तलाक का निर्णय दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस निर्णय में कहा कि जिन मामलों में वैवाहिक संबंध पूर्ण रूप से अव्यवहार्य,

भावनात्मक रूप से मृतप्राय यानी जिसमें सुधार की कोई संभावना न हो तथा अपूर्ण रूप से टूट चुके हों उन्हें तलाक का आधार माना जा सकता है।

ऐसे वैवाहिक संबंध निष्फल होते हैं तथा इनका जारी रहना दोनों पक्षों को मानसिक प्रताड़ना देता है।

इन मामलों में किसी वैधानिक प्रावधान की अनुपस्थिति के कारण न्यायालय द्वारा अनुच्छेद-142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करना आवश्यक है।

अनुच्छेद-142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति है कि जिन मामलों में कानून या विधि द्वारा निर्णय नहीं किया जा सकता है

ऐसी स्थिति में वह उस मामले को स्वयं के अधिकार क्षेत्र में लाकर अंतिम निर्णय दे सकता है।

न्यायालय ने पहले भी कई मामलों में, जहाँ वैवाहिक संबंध मृतप्राय हो जाते हैं,

अनुच्छेद-142 का प्रयोग करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार माना है।

भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) ने पहले भी दो बार हिंदू धर्म में अपरिवर्तनीय संबंध विच्छेद को तलाक का आधार बनाने के लिये

हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) तथा विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) में इसे शामिल करने की अनुशंसा की है।

विधि आयोग ने इस संबंध में पहली बार वर्ष 1978 में अपनी 71वीं रिपोर्ट में तथा दूसरी बार वर्ष 2009 में 217वीं रिपोर्ट में अधिनियम में संशोधन की अनुशंसा की थी।

संविधान का अनुच्छेद-142:


संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय अपने न्यायाधिकार का प्रयोग करते समय ऐसे निर्णय या आदेश दे सकता है

जो इसके समक्ष लंबित पड़े किसी भी मामले में पूर्ण न्याय प्रदान करने के लिये आवश्यक हो।

इसके तहत दिये गये निर्णय या आदेश पूरे भारत संघ में संसद या उसके अधीन बने नियमों की भाँति ही तब तक लागू होंगे,

जब तक इससे संबंधित कोई अन्य प्रावधान राष्ट्रपति या उसके आदेश द्वारा लागू नहीं कर दिया जाता।

अनुच्छेद 142(2) के तहत सर्वोच्च न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हाज़िर कराने,

 किन्हीं दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण या अपनी किसी अवमानना का अन्वेषण करने या दंड देने के संबंध में आदेश देने की शक्ति होगी।

यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करता है

तथा इसका प्रयोग प्रायः मानवाधिकार तथा पर्यावरण संरक्षण के मामलों में ही किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या भूमि विवाद मामले में भी संविधान के अनुच्छेद-142 का प्रयोग किया गया था।


स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस,  दृस्टि आईएएस 

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