शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

विधि आयोग - Law commission of india

भारतीय विधि आयोग

विधि आयोग - Law commission of india
विधि आयोग 

परिचय

भारतीय विधि आयोग न तो एक संवैधानिक निकाय है और न ही वैधानिक निकाय। यह भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है। इसका प्रमुख कार्य है, कानूनी सुधारों हेतु कार्य करना।

आयोग का गठन एक निर्धारित अवधि के लिये होता है और यह विधि और न्याय मंत्रालय के लिये परामर्शदाता निकाय के रूप में कार्य करता है।

इसके सदस्य मुख्यतः कानून विशेषज्ञ होते हैं।
भारत में विधि आयोग का इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से समय-समय पर सरकार द्वारा विधि आयोग गठित किये गए और कानून की उन शाखाओं में जहाँ सरकार को आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ स्पष्टीकरण, समेकन और संहिताकरण हेतु विधायी सुधारों की सिफारिश करने के लिये उन्हें सशक्त किया गया।

ऐसा प्रथम आयोग वर्ष 1834 में 1833 के चार्टर एक्ट के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में गठित किया गया था जिसने दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को संहिताबद्ध करने की सिफ़ारिश की।

इसके बाद द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ विधि आयोग, जो क्रमशः वर्ष 1853, 1861 और 1879 में गठित किये गए थे, ने 50 वर्ष की अवधि में उस समय प्रचलित अंग्रेजी क़ानूनों के पैटर्न पर, जिन्हें कि भारतीय दशाओं के अनुकूल किया गया था, की व्यापक किस्मों से भारतीय विधि जगत को समृद्ध किया।

भारतीय नागरिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय संविदा अधिनियम, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम आदि प्रथम चार विधि आयोगों का परिणाम हैं।

विधि आयोग के कार्य

विधि आयोग केंद्र सरकार द्वारा इसे संदर्भित या स्वतः किसी मुद्दे पर कानून में शोध या भारत में विद्यमान कानूनों की समीक्षा तथा उनमें संशोधन करने और नया कानून बनाने हेतु सिफारिश करता है।

उन नए क़ानूनों के निर्माण का सुझाव देता है जो नीति-निर्देशक तत्त्वों को लागू करने और संविधान की प्रस्तावना में तय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये आवश्यक हैं।

न्यायिक प्रशासन: कानून और न्यायिक प्रशासन से सम्बद्ध किसी विषय, जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत विशेष रूप से विधि आयोग को संदर्भित किया हो, पर विचार करना और सरकार को इस पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

शोध: किसी बाहरी देश को शोध उपलब्ध कराने हेतु निवेदन पर विचार करना जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत इसे संदर्भित किया हो।

लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से मौजूदा कानूनों की जाँच करना और उनमें संशोधन सुझाना।

अपनी सिफ़ारिशों को ठोस रूप देने से पहले आयोग नोडल मंत्रालय/विभाग और ऐसे अन्य हितधारकों से परामर्श करता है जिसे कि आयोग इस उद्देश्य के लिये आवश्यक समझे।

विधि आयोग के प्रतिवेदन

भारत के विधि आयोग ने अभी तक विभिन्न मुद्दों पर 277 प्रतिवेदन (Reports) प्रस्तुत किये हैं, उनमें से कुछ अद्यतन प्रतिवेदन हैं: प्रतिवेदन संख्या 277 अनुचित तरीके से मुक़दमा चलाना (अदालत की गलती): कानूनी उपाय

प्रतिवेदन संख्या 272 – भारत में ट्रिब्यूनलों की वैधानिक संरचनाओं का आकलन

प्रतिवेदन संख्या 271 – ह्यूमन DNA प्रोफाइलिंग

प्रतिवेदन संख्या 270 – विवाहों का अनिवार्य
पंजीकरण या अस्वीकार किया जा सकता है। इन सिफ़ारिशों पर कार्यवाही उन मंत्रालयों/विभागों पर निर्भर है जो सिफारिशों की विषय वस्तु से संबंधित हैं।


विधि आयोग में सुधारों की दरकार

20वें विधि आयोग के अध्यक्ष ए.पी. शाह ने विधिआयोग के सुधारो का समर्थन किया था,  जो निम्नलिखित है -

विधिक हैसियत: इस निकाय को स्वायत्त एवं सक्षम बनाने के लिये यह आवश्यक है कि इसे विधिक आयोग का दर्जा दिया जाए।

21वें विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गया था, किंतु 22वें विधि आयोग का गठन अभी तक नहीं किया जा सका है।

नियुक्ति: विधि आयोग के सदस्यों की नियुक्ति केवल अध्यक्ष से परामर्श के पश्चात् ही की जानी चाहिये। वर्तमान व्यवस्था में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कई बार भेदभाव और पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।

स्वायत्तता: वर्तमान व्यवस्था में विधि सचिव तथा विधायी विभाग के सचिव विधि आयोग के पदेन सदस्य होते हैं।

अब तक तीन-वर्षीय कार्यकाल वाले कुल 21 विधि आयोग गठित किये जा चुके हैं, जिनमें से 21वें विधि आयोग की कार्यावधि 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गई,

22 वा विधि आयोग 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के 22वें विधि आयोग के गठन को तीन साल की अवधि के लिए मंजूरी दे दी है।

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बीएस चौहान की निगरानी भारत के 21 वें विधि आयोग की स्थापना 2015 में की गई थी और इसका कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 तक था। पैनल में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, चार पूर्णकालिक सदस्य (एक सदस्य सचिव सहित), कानून और विधायी विभागों के सचिव और पदेन सदस्य होंगे और साथ ही पांच से अधिक अंशकालिक सदस्य नहीं होंगे।




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