बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

जानें क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर

जानें क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर

जानें क्या होता है रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर, एसएलआर


रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया मॉनिटरी पॉलिसी का रिव्यू करते समय सीआरआर, रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट से संबंधित ऐलान भी करता है।

कई बार यह इसे यथावत रखता है और कई बार इसमें आमूलचूल परिवर्तन करता है।

 आइए जानें कि आखिर रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, सीआरआर (कैश रिजर्व रेशियो) होता क्या है और एसएलआर यानी  स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो के क्या मायने हैं :

रेपो रेट

 सभी कॉमर्सिअल बैंक जनता को ऋण देती है कभी कभी एक ही दिन में बहुत ज्यादा मात्रा  में ऋण की मांग आ जाति है.

 और उस स्थिति में बैंक के पास जनता को ऋण देने के लिए पर्याप्त मात्रा में धन् नही होता है.

 तब बैंक केंद्रीय बैंक (भारत में रिजर्व बैंक) से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेने का विकल्प अपनाते हैं।

इस कर्ज पर रिजर्व बैंक को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो रेट कहते हैं।

रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज लेना सस्ता हो जाता है और तब ही बैंक ब्याज दरों में भी कमी करते हैं

 ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके।

 अब अगर रेपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से रात भर के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा।

ऐसे में जाहिर है कि बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा।

 महंगाई पर प्रभाव-

 यदि रेपो रेट बढ़ा दिया जाए तो बैंकों को महँगा  ऋण  मिलेगा तो ब्याज दरें बढ़ जाएंगे जिससे जनता के मनोबल कम होगा

 वस्तु एवं सेवा की मांग कम हुई कीमत कम होगी महंगाई नियन्त्रित होगा

रिवर्स रेपो रेट –

 जब कोई भी वाणिज्य बैंक अतिरिक्त धन को जिसे वह मार्केट में नहीं निकल पा रही हूं

 उसे अगर आरबीआई के पास रख देती है अल्पावधि के लिए आरबीआई कमर्शियल बैंक को जो ब्याज देती है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं

 महंगाई पर प्रभाव

 यदि रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा दिया जाए तो आरबीआई के पास धन जमा करने के लिए बैंके  आकर्षित होंगीं .

तो  बाजार में धन कम हो जाएगा,  बाजार में धन कम हो जाएगी तो तरलता कम हो जाएगी तरलता कम हो जाने पर बैंक अधिक ब्याज दर पर धन  देने लगेन्गे

 जिसे जनता के मनोबल कम हो जाएगी मनोबल कम होने से मांग कम हो जाएगा जिससे महंगाई कम हो  जाएग


स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (एसएलआर)


एसएलआर यानी कि स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो। वाणिज्यिक बैंकों के लिए

 अपने प्रतिदिन के कारोबार के आखिर में नकद, सोना और सरकारी सिक्यॉरिटीज में निवेश के रूप में एक निश्चित रकम रिजर्व बैंक के पास रखनी जरूरी होता है।

 इस रकम का इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

 अब वह रेट जिस पर बैंक यह पैसा सरकार के पास रखते हैं, उसे ही एसएलआर कहते हैं।

 इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना आरबीआई के पास रखना होता है।


 नकद आरक्षित अनुपात( कैश रिजर्व रेसिओ ) सीआरआर-

 सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को अपनी समग्र जमाव का एक निश्चित प्रतिशत भारतीय रिजर्व बैंक के पास अनिवार्य रखना पड़ता है जिसे ‘ नगद आरक्षित अनुपात’ कहा जाता है.

 यह विधि साख नियंत्रण के अति महत्वपूर्ण एवं नवीनतम विधि है इसका प्रयोग सर्वप्रथम 1935 में अमेरिका द्वारा किया गया था

यह विधि वहां अधिक उपयुक्त होती है जहां पर मुद्रा बाजार अविकसित होते हैं.

 केंद्रीय बैंक को नकद आरक्षित अनुपात में आवश्यकता अनुसार परिवर्तन करने का अधिकार होता है

देश में साख  की मात्रा को कम करना होता है तो भारतीय रिजर्व बैंक नगद आरक्षित अनुपात को बढ़ा देता है

 इस अनुपात के बढ़ने से बैंकों को अधिक नकद रिजर्व बैंक के पास रखने पड़ते हैं तथा स्वयं उनके पास नगद की मात्रा कम हो जाती है

इस प्रकार इन बैंकों की साख निर्माण की मात्रा कम हो जाती है जिससे यह ग्राहकों को महंगा एवं साख  प्रदान करते हैं

इसके विपरीत नकद  आरक्षित अनुपात में कमी होने से बैंकों को नकद कोष कम रखना पड़ता है जिसे साख निर्माण की मात्रा में वृद्धि होती है |

Source - NDTV


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