गुरुवार, 16 जनवरी 2020

54 Students From Jamia Millia's Coaching Academy Clear Civil Services Main (जामिया यूनिवर्सिटी की रेजिडेंशियल एकेडमी में कोचिंग कर रहे 54 छात्रों ने क्लियर किया UPSC Mains)

54 Students From Jamia Millia's Coaching Academy Clear Civil Services Main






 पिछले साल यानी 2019 में जामिया के 44 छात्र ने यूपी से पास किया था,

 जिसमें ऑल इंडिया में थर्ड रैंक लाने वाले जुनैद अहमद भी शामिल थे,.
 इस बार का रिजल्ट यानी 2020 का रिजल्ट 20 -29 सितंबर 2019 तक आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा का जारी किया गया है

खास बाते 


इस बार के upsc mains में जामिया के 54 छात्र ने कामयाबी हासिल की

पिछले साल यानी 2019 में 44 छात्र जामिया से सिलेक्शन हुए थे

जामिया इस्लामिया की रेजिडेंशियल कोचिंग एकेडमी के छात्रों ने सफलता हासिल की है

 जामिया मिलिया इस्लामिया की रेजिडेंशियल कोचिंग अकेंडमी में  कोचिंग कर रहे छात्रों में से 54 छात्रों ने इस बार की सिविल सेवा मुख्य परीक्षा यानी यूपीएससी मैंस पास कर लिया है

. इन सभी छात्रों को यूपीएससी 2019 में सफलता मिली है.

अब यह सभी सफल छात्र फरवरी में आयोजित होने वाली यूपीएससी इंटरव्यू में हिस्सा लेंगे.

 बता दें कि पिछले साल यानी 2018 में जामिया मिलिया इस्लामिया की रेजिडेंशियल कोचिंग अकैडमी में कोचिंग करने वाले छात्रों में से 44 छात्रों ने यूपीएससी मैंस के लिए किया था.

जिसमें ऑल इंडिया में थर्ड रैंक लाने वाले जुनैद अहमद भी शामिल थे.

 बता दे कि जनवरी में जो यह रिजल्ट जारी किया गया है इसका एग्जाम 20 से 29 सितंबर 2019 में कराया गया था.



• union public service commission ( UPSC)  भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), 

भारतीय विदेश सेवा (IFS), 

भारतीय पुलिस सेवा (IPS) 

और अन्य केंद्रीय सेवाओं के समूह 'A' और समूह 'B' के चयन के लिए सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करता है. 


54 छात्रों के पास होने पर यूनिवर्सिट ने एक बयान  जारी करके कहा -
 


'इन छात्रों को सिविल सेवा के जरिए राष्ट्र निर्माण के लिए तैयार करने में विश्वविद्यालय प्रतिबद्ध है.

इन छात्रों को विश्वविद्यालय मुफ्त आवास, लाइब्रेरी सुविधा, क्लासरूम टीचिंग,  प्रैक्टिस टेस्ट आदि प्रदान किए जाते हैं. सीटों की उपलब्धता के आधार पर जामिया आरसीए

 अब कुछ और ऐसे योग्य उम्मीदवारों को ट्रेनिंग देगा जो इंटरव्यू के लिए तैयारी करें

.उम्मीदवार जामिया की आध‍िकारिक वेबसाइट www.jmi.ac.in पर जाकर इस बारे में ओर जानकारी ले सकते सकते हैं.'


 जामिया इस्लामिया रेजिडेंसी कोचिंग एकेडमी की स्थापना


2010 में जामिया इस्लामिया रेजीडेंसी कोचिंग एकेडमी की स्थापना हुई थी

 2010 में स्थापित जे एमआई ने अभी तक यानी 2019 तक में 190 सिविल सर्वेंट तैयार किए हैं

 इसमें यूपीएससी की परीक्षाओं के माध्यम से आईएएस, आईएफएस, आईपीएस, आईआरटीएस आदि शामिल हैं.

इसके अलावा, स्टेट लेवल की सिविल सेवाओं में एसडीएम और डीएसपी के रूप में अफसर दिए हैं

. वहीं असिस्टेंट कमांडेंट (सीएपीएफ), आईबी, असिस्टेंट कमिश्नर (प्रोविडेंट फंड) और बैंक पी.ओ. भी बड़ी संख्या में इस कोचिंग से निकले.


 जामिया इस्लामिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना

परिचय

जामिया मिल्लिया इस्लामिया संयुक्त प्रांत,  भारत के अलीगढ़ में मूल रूप से 1920 में एक संस्था के रूप में स्थापित किया गया।

1988 में भारतीय संसद के  अधिनियम द्वारा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय बना ।

उर्दू भाषा, में जामिया का अर्थ है विश्वविद्यालय, और मिल्लिया का अर्थ है ‘राष्ट्रीय‘।

आजादी के पूर्व नई दिल्ली में स्थित एक छोटी सी संस्था से केन्द्रीय विश्वविद्यालय तक इसके विकास की कहानी

- नर्सरी से एकीकृत शिक्षा में विशेष क्षेत्रों में अनुसंधान के लिए प्रस्तुत - लोगों के समर्पण,  दृढ़ विश्वास की गाथा है, जो सभी बाधाओं को पार करते हुए कदम बढ़ाते रहे।

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू‘ के अनुसार उन्होनेतिनका-तिनका जोड़कर और तमाम कुर्बानियाँ देकर जामिया का निर्माण किया।”


अवधारणा 

औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन के अधीन दो प्रमुख प्रवृत्तियों ने हाथ मिलाकर जामिया के निर्माण में योगदान दिया।

 एक उपनिवेश विरोधी इस्लामी सक्रियतावादी थी

और दूसरी पश्चिमी शिक्षित भारतीय मुस्लिम बुद्धिजीवियों के राजनैतिक रूप से कट्टरपंथी धारा की समर्थक एवं स्वतंत्रता आकांक्षी थी।

 1920 के राजनीतिक माहौल में, एक उत्प्रेरक के रूप में महात्मा गांधी के साथ-साथ दो प्रवृतियों,  उपनिवेश विरोधी सक्रियतावादी खिलाफत आन्दोलन और


 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के असहयोग-आंदोलन ने रचनात्मक शक्तियों को संगठित करने के साथ साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के निर्माण में भी मदद की।

 रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे भारत के सबसे प्रगतिशील शैक्षिक संस्थानों में से एक कहा है।

गाँधीजी के आह्वान पर औपनिवेशिक शासन द्वारा समर्थित या चलाए जा रहे सभी शैक्षणिक संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए,

राष्ट्रवादी शिक्षकों और छात्रों के एक समूह ने ब्रिटिश समर्थक इच्छा के खिलाफ विरोध कर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छोड़ दिया।

इस आंदोलन के सदस्यों में मौलाना महमूद हसन, मौलाना मौहम्मद अली, हकीम अजमल खान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख़्वाजा प्रमुख थे।

संकटकाल

उस समय जन्मे राजनैतिक संकट में थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा कि भारत की स्वतंत्रता के गहन राजनैतिक संघर्ष की गर्मी में जामिया बच नहीं पाएगा।

इसने बारडोली संकल्प में भाग लिया और देश के स्वतंत्रता संघर्ष के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए देश भर में स्वयंसेवकों को भेजा।

औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने जल्द ही कई शिक्षकों और छात्रों को कैद कर लिया।

1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग-आंदोलन वापस ले लिया गया।

शिक्षकों और छात्रों को छोड दिया गया। मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने 1924 में खिलाफ़त के अंत की घोषणा की।

अचानक जामिया ने स्वयं को एक गंभीर संकट में देखा।

 कुछ का विश्वास था कि जामिया अपने मिशन को हासिल करेगा

, दूसरों का विश्वास था कि संस्था ने अपने अस्तित्व को असहयोग और खिलाफत आंदोलन के अंत के साथ खो दिया है।

यहां तक कि खिलाफत से प्राप्त छोटी वित्तीय सहायता भी अब मिलनी बंद हो गई।

जब प्रमुख लोगों ने इसे छोड़ना शुरू कर दिया तब जामिया के विध्वंस की संभावना स्पष्ट दिखाई देने लगी।


जामिया को दिल्ली लाया गया


यह कहावत कि-जब वक्त खराब आता है साया भी साथ छोड जाता है-

जामिया के बारे में चरितार्थ नहीं हो सकी।

जब संकट गहराया तब हकीम अजमल ख़ान, डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी और अब्दुल मजीद ख़्वाजा तीनों ने गाँधीजी की सहायता से जामिया को 1925 में अलीगढ़ से करोल बाग, नई दिल्ली में स्थानांतरित किया।

गाँधीजी ने यह कहकर कि -जामिया को चलना होगा, अगर तुम को वित्तीय सहायता की चिंता है तो मैं इसके लिए कटोरा लेकर भीख मांगने के लिए तैयार हूँ।

 इस बात ने जामिया का मनोबल बढ़ाया। जब आत्मनिर्भरता के लिए गांधी जी ने चरखा और तकली के रचनात्मक कार्यक्रम को पसंदीदा पेशे के रूप में अपनाया, जामिया ने उसका अनुगमन किया।

हालांकि गांधीजी ने जामिया की वित्तीय मदद को सुरक्षित करने के लिए बहुत लोगो से संपर्क भी किया,

 लेकिन ब्रिटिश राज के तहत कांग्रेस समर्थित संस्था की मदद करने का जोखिम कई इच्छुक संरक्षक नहीं उठाना चाहते थे।

रूढिवादी मुसलमानों ने भी जामिया को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए खतरे के रूप में देखा।

उन मुश्किल दिनों के दौरान हकीम अजमल खान ने अपनी जेब से जामिया के ज्यादातर खर्च उठाए।

डॉ एम.ए. अंसारी और अब्दुल मजीद ख़्वाजा ने भारत और विदेशों में जामिया के महत्व को समझाने और इस महान संस्थान के लिए धन इकट्ठा करने के लिए दौरा किया।

उनके सामूहिक हस्तक्षेप ने इसके निश्चित पतन को टाल दिया।

पुनरुत्थानः दूसरी तिकड़ी



1925 में, लंबी विवेचना के बाद तीन दोस्तों के एक समूह -

डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. आबिद हुसैन और डॉ. मोहम्मद मुजीब ने जर्मनी में अध्ययन करने के बाद जामिया की सेवा करने का फैसला किया।

डॉ. जाकिर हुसैन, जिन्होने बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट प्राप्त की थी

, एक प्राकृतिक और करिश्माई नेता थे। डॉ. आबिद हुसैन ने अपनी पी.एच. डी. शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त की थी।

 मौहम्मद मुजीब इतिहास के एक ऑक्सफोर्ड विद्वान और जर्मनी में मुद्रण के छात्र थे और वह जोशीले एवं प्रतिबद्ध सुधारवादी नेता थे।

 फरवरी 1926 के प्रारंभ में, तीन दोस्त जर्मनी से ‘नार्दयुशर लॉयड स्टीमर एस एस डेरफिलंगर’ द्वारा जामिया आए।


जामिया में डॉ. जाकिर हुसैन को 100 रूपये वेतन की पेशकश की गई।

यूरोपीय योग्यता प्राप्त उनके दो अन्य दोस्तों को 300 रूपये वेतन की पेशकश की गई।

जामिया के सीमित संसाधनों से भुगतान की कठिनाई का एहसास होने पर आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब ने स्वेच्छा से अपने वेतन को घटाकर 100 रूपये किया।

अपने दोस्तों की प्रतिबद्धता को देखते हुए डॉ. जाकिर हुसैन ने भी अपना वेतन 80 रु. करने का फैसला किया।


 उन्होने जो कदम उठाए उनमे पहला एक बेहद लोकप्रिय कदम शाम की कक्षाओं में प्रौढ़ शिक्षा की शुरूआत करना था।

यह आंदोलन बाद में अक्तूबर 1938 में इदारा-ए-तालीम-ओ-तरक्की नामक एक संस्था के रूप में जाना जाने लगा।

यह इतना लोकप्रिय हुआ कि छात्रों को समायोजित करने के लिए अलग-अलग कमरे बनाए गए।


1928 में हकीम अजमल खान का निधन हो गया। हकीम साहब जामिया की वित्तीय जरूरतों का इंतजाम करते थे

इसलिए यह दूसरे वित्तीय संकट की शुरुआत थी। जामिया का नेतृत्व फिर डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों में आ गया

जो 1928 में जामिया के वाइस चांसलर बने।

जामिया के लगातार संकटों के समाधान के  लिए प्रतिज्ञाबद्ध युवा शिक्षकों के एक समूह ने डॉ. जाकिर हुसैन के नेतृत्व में अगले बीस वर्षों के लिए 150 रूपये के वेतन पर काम करने का संकल्प लिया।

 यह समूह जामिया का आजीवन सदस्य कहलाया  (जब जामिया के शिक्षकों का एक दूसरा समूह एक समान प्रतिज्ञा लेकर 1942 में आया तब इतिहास दोहराया  गया।)


जामिया का मुद्रण और प्रकाशन विभाग दरिया गंज में स्थापित नयी जामिया प्रेस, उर्दू अकादमी और

 मकतबा जामिया के साथ 1928 में प्रो मोहम्मद मुजीब, डॉ. आबिद हुसैन और श्री हामिद अली के प्रभार के तहत क्रमशः स्थापित किया गया।


नये परिसर में स्थानांतरण


1 मार्च 1935 को दक्षिणी दिल्ली के बाहरी इलाके के एक गांव, ओखला में एक विद्यालय भवन की आधारशिला रखी गयी।

 1936 में जामिया प्रेस, मकतबा और पुस्तकालय को छोड़कर सभी संस्थान नये परिसर में स्थानांतरित कर दिए गए।

जामिया का बुनियादी महत्व शिक्षा के नवीन विधियों को विकसित करना था।

 इसने 1938 में टीचर्स कालेज (उस्तादों का मदरसा) की स्थापना की।

1936 में डॉ.  एम.ए. अंसारी का निधन हो गया। 4 जून 1939 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक संस्था के रूप में पंजीकृत हुआ।


जामिया के नवीन शिक्षा आंदोलन की प्रसिद्धि फैली और विदेशों से गणमान्य व्यक्ति जामिया को देखने आने लगे।

 हुसैन रउफ बे (1933) काहिरा के डॉ. बेहदजेत वाहबी (1934) तुर्की की सुश्री हलीदे अदीब (1936) उनमें से कुछ एक हैं।

विदेशी आगन्तुक जामिया से प्रभावित हुए और जामिया में काम करना शुरू किया।

जर्मन महिला सुश्री गर्दा फिलिप्सबोर्न (आपाजान के नाम से लोकप्रिय) ने कई वर्षों तक जामिया की सेवा की।

 जिन्हें मरणोपरांत जामिया में दफनाया गया।

1939 में डा. जाकिर हुसैन के निमंत्रण पर मौलाना उबेदुल्लाह सिंधी (1872-1944), जोकि एक धर्मज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी थे

जामिया में रहने के लिए आये।

उन्होंने जामिया में बैतुल हिकमल नाम से एक इस्लामी अध्ययन का स्कूल शाह वलीउल्लाह की विचारधारा को प्रचारित करने के लिए शुरू किया।

जाकिर हुसैन जो कि बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, उन दिनों को बुराई के समक्ष अविनाशी आशावाद के रूप में  याद करते थे ,जैसे वह संतोष के दिन थे

, जब उन्हें बहुत कुछ करने की अभिलाषा थी लेकिन करने के साधन नहीं थे।

1946 में जामिया के रजत जयंती समारोह के दौरान एक संकट देखा गया जिसका सामना भारत को आने वाले वर्षों में करना पडा़;

 श्री और श्रीमती मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली खान मंच पर डॉ. जाकिर हुसैन, कुलपति महोदय के एक तरफ़ थे


और पंडित जवाहरलाल नेहरू, आसफ अली और सर सी. राजगोपालाचारी दूसरी तरफ थे।

स्वतंत्रता और उसके बाद


विभाजन के बाद दंगों ने उत्तर भारत को हिलाकर रख दिया जिससे जामिया भी प्रभावित हुआ लेकिन इसका परिसर नहीं।

 गांधी जी ने यह देखा कि यह परिसर साम्प्रदायिक हिंसा के ”मरूस्थल में एक रमणीय स्थान की तरह है”।

मकतबा जामिया ने आगजनी में 7 लाख रूपये मूल्य की पुस्तकें खो दीं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जामिया भिन्नता के साथ एक शैक्षणिक संस्था के रूप में निरंतर विकास करता रहा।

कई विदेशी गणमान्य व्यक्ति नई दिल्ली भ्रमण के दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया का दौरा करते रहे।

जिनमें मार्शल टीटो (1954), राजा जहीर शाह अफगानिस्तान (1955), युवराज फैसल, सऊदी अरब, राजा रज़ा शाह पहलवी, ईरान (1956) और शहज़ादा मुर्करम जाह (1960) शामिल हैं।

1962 में श्री अब्दुल मजीद ख़्वाजा की मौत के बाद डॉ. ज़ाकिर हुसैन

जो तब तक भारत के उप राष्ट्रपति का प्रभार संभाल रहे थे वह जामिया के कुलाधिपति (1963) बने।

मानित विश्वविद्यालय


1962 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जामिया को मानित विश्वविद्यालय घोषित किया।

इसके तुरंत बाद 1967 में समाज कार्य विद्यालय स्थापित किया गया।

1971 में जामिया ने डॉ जाकिर हुसैन जिनका 1969 में निधन हो चुका था,

के सम्मान में डॉ. जाकिर हुसैन इस्लामी अध्ययन संस्थान की शुरूआत की

1978 में सिविल इंजीनियरी में बी.ई. पाठ्यक्रम शुरू किया गया, 1981 में मानविकी एवं भाषा संकाय, प्राकृतिक विज्ञान संकाय,  सामाजिक विज्ञान संकाय, और राज्य संसाधन केन्द्र की स्थापना की गई।

1983 में जनसंचार एवं अनुसंधान केन्द्र और कोचिंग एवं कैरियर योजना केंद्र शुरू किया गया।

 1985 में इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी संकाय और विश्वविद्यालय कंप्यूटर केंद्र स्थापित हुआ।

 1987 और 1988 में अकादमिक स्टाफ कॉलेज और तीसरी दुनिया अध्ययन अकादमी शुरू की गयीं।

केंद्रीय विश्वविद्यालय


दिसंबर 1988 में संसद के एक विशेष अधिनियम के द्वारा जामिया मिल्लिया इस्लामिया भारत का एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय बना।

संकायों की सूची में अर्थात् शिक्षा, मानविकी एवं भाषा,  प्राकृतिक विज्ञान,  सामाजिक विज्ञान, इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी में एक और संकाय-विधि संकाय के रूप में 1989 में जुड़ गया।

स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर कई नए पाठ्यक्रम एवं कार्यक्रम शुरू किए गए।


जामिया में नौ संकायों के अलावा, शिक्षण और अनुसंधान के कई केंद्र जैसे एजेके जनसंचार एवं अनुसंधान केंद्र

(एमसीआरसी), अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन अकादमी इत्यादि हैं।

जामिया सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के क्षेत्र में अग्रणी है।

 यह विभिन्न स्नातक एवं स्नातकोत्तर आईटी पाठ्यक्रम प्रदान करता है। इसके अलावा जामिया का एक विस्तृत परिसर नेटवर्क है

जो उसके विभागों और कार्यालयों की एक बड़ी संख्या को आपस में जोड़ता है।

Sorce - NDTV, जामिया इस्लामिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी का ऑफिशियल वेबसाइट


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