शनिवार, 28 दिसंबर 2019

Hindu marrige Act 1955 (हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के तहत तलाक का प्रावधान)

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के तहत तलाक का प्रावधान


प्रीलिम्स के लिये -

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

मेन्स के लिये -

महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय


चर्चा में क्यों है?
 


हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद-142 का प्रयोग करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज (Irretrievable Breakdown of Marriage) को तलाक का आधार माना।

हिन्दू विवाह अधिनियम 1955


हिन्दू विवाह अधिनियम भारत की संसद द्वारा सन् १९५५ में पारित एक कानून है।

इसी कालावधि में तीन अन्य महत्वपूर्ण कानून पारित हुए:

हिन्दू उत्तराधिका अधिनियम, हिन्दू अल्पसंख्यक तथा अभिभावक अधिनियम और हिन्दू एडॉप्शन और भरणपोषण अधिनियम

. ये सभी नियम हिन्दुओं के वैधिक परम्पराओं को आधुनिक बनाने के ध्येय से लागू किए गये थे।

मुख्य बिंदु:


वर्तमान में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act, 1955) के तहत इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार नहीं माना जाता हैं।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये अनुच्छेद-142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग किया है।

हिंदू विवाह अधिनियम,1955 में तलाक का आधार:


हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक की प्रक्रिया दी गई है जो कि हिंदू, बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म को मानने वालों पर लागू होती है।

इस अधिनियम की धारा-13 के तहत तलाक के निम्नलिखित आधार हो सकते हैं:

o व्यभिचार (Adultry)- यदि पति या पत्नी में से कोई भी किसी अन्य व्यक्ति से विवाहेतर संबंध स्थापित करता है तो इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।

o क्रूरता (Cruelty)- पति या पत्नी को उसके साथी द्वारा शारीरिक, यौनिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो क्रूरता के तहत इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।

o परित्याग (Desertion)- यदि पति या पत्नी में से किसी ने अपने साथी को छोड़ दिया हो तथा तलाक की अर्जी दाखिल करने से पहले वे लगातार दो वर्षों से अलग रह रहे हों।
o धर्मांतरण (Proselytisze)- यदि पति पत्नी में से किसी एक ने कोई अन्य धर्म स्वीकार कर लिया हो।

o मानसिक विकार (Unsound Mind)- पति या पत्नी में से कोई भी असाध्य मानसिक स्थिति तथा पागलपन से ग्रस्त हो और उनका एक-दूसरे के साथ रहना असंभव हो।

इसके अलावा अधिनियम की धारा-13B के तहत आपसी सहमति को तलाक का आधार माना गया है।

विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) की धारा-27 में इसके तहत विधिपूर्वक संपन्न विवाह के लिये तलाक के प्रावधान दिये गए हैं।

हालाँकि इन दोनों अधिनियमों में से किसी में भी इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार नहीं माना गया है।


इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज

(Irretrievable Breakdown of Marriage):

हाल ही में के आर. श्रीनिवास कुमार बनाम आर. शमेथा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न न्यायिक निर्णयों की जाँच करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को आधार मानते हुए तलाक का निर्णय दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने इस निर्णय में कहा कि जिन मामलों में वैवाहिक संबंध पूर्ण रूप से अव्यवहार्य,

भावनात्मक रूप से मृतप्राय यानी जिसमें सुधार की कोई संभावना न हो तथा अपूर्ण रूप से टूट चुके हों उन्हें तलाक का आधार माना जा सकता है।

ऐसे वैवाहिक संबंध निष्फल होते हैं तथा इनका जारी रहना दोनों पक्षों को मानसिक प्रताड़ना देता है।

इन मामलों में किसी वैधानिक प्रावधान की अनुपस्थिति के कारण न्यायालय द्वारा अनुच्छेद-142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करना आवश्यक है।

अनुच्छेद-142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति है कि जिन मामलों में कानून या विधि द्वारा निर्णय नहीं किया जा सकता है

ऐसी स्थिति में वह उस मामले को स्वयं के अधिकार क्षेत्र में लाकर अंतिम निर्णय दे सकता है।

न्यायालय ने पहले भी कई मामलों में, जहाँ वैवाहिक संबंध मृतप्राय हो जाते हैं,

अनुच्छेद-142 का प्रयोग करते हुए इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का आधार माना है।

भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) ने पहले भी दो बार हिंदू धर्म में अपरिवर्तनीय संबंध विच्छेद को तलाक का आधार बनाने के लिये

हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) तथा विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) में इसे शामिल करने की अनुशंसा की है।

विधि आयोग ने इस संबंध में पहली बार वर्ष 1978 में अपनी 71वीं रिपोर्ट में तथा दूसरी बार वर्ष 2009 में 217वीं रिपोर्ट में अधिनियम में संशोधन की अनुशंसा की थी।

संविधान का अनुच्छेद-142:


संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत सर्वोच्च न्यायालय अपने न्यायाधिकार का प्रयोग करते समय ऐसे निर्णय या आदेश दे सकता है

जो इसके समक्ष लंबित पड़े किसी भी मामले में पूर्ण न्याय प्रदान करने के लिये आवश्यक हो।

इसके तहत दिये गये निर्णय या आदेश पूरे भारत संघ में संसद या उसके अधीन बने नियमों की भाँति ही तब तक लागू होंगे,

जब तक इससे संबंधित कोई अन्य प्रावधान राष्ट्रपति या उसके आदेश द्वारा लागू नहीं कर दिया जाता।

अनुच्छेद 142(2) के तहत सर्वोच्च न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को हाज़िर कराने,

 किन्हीं दस्तावेज़ों के प्रकटीकरण या अपनी किसी अवमानना का अन्वेषण करने या दंड देने के संबंध में आदेश देने की शक्ति होगी।

यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करता है

तथा इसका प्रयोग प्रायः मानवाधिकार तथा पर्यावरण संरक्षण के मामलों में ही किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोध्या भूमि विवाद मामले में भी संविधान के अनुच्छेद-142 का प्रयोग किया गया था।


स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस,  दृस्टि आईएएस 

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