शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

न्यायधीशों की नियुक्ति (Appointment of judges )

न्यायाधीशों की नियुक्ति


चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिये कोलेजियम द्वारा अनुशंसित 213 पद केंद्र सरकार की स्वीकृति न मिलने के कारण लंबित हैं।


कॉलेजियम सिस्टम क्या होता है? 


कॉलेजियम सिस्टम का भारत के संविधान में कोई जिक्र नही है.
यह सिस्टम 28 अक्टूबर 1998 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के जरिए प्रभाव में आया था.

कॉलेजियम सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक फोरम जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है.

 कॉलेजियम की सिफारिश दूसरी बार भेजने पर सरकार के लिए मानना जरूरी होता है.

 कॉलेजियम की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे सीनियर जजों से मिलकर की जाती है

सुप्रीम कोर्ट तथा हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला भी कॉलेजियम ही करता है.

 इसके अलावा उच्च न्यायालय के कौन से जज पदोन्‍नत होकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है.

UPA सरकार ने 15 अगस्त 2014 को कॉलेजियम सिस्टम की जगह NJAC (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग) का गठन किया था

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2015 को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को असंवैधानिक करार दे दिया था.
इस प्रकार वर्तमान में भी जजों की नियुक्ति और तबादलों का निर्णय सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम सिस्टम ही करता है.( sorce -jagaran josh)

External link

-  न्यायधिशो की नियुक्ति कैसे होती है? 

 - उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को  हटाने की प्रक्रिया क्या है? 

को  हटाने की प्रक्रिया क्या है?

न्यायिक नियुक्ति आयोग 

Justice

इस व्यवस्था को बदलकर इसके स्थान पर अधिक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान (संशोधन) विधेयक,

2014 लोक सभा में 11 अगस्त 2014 को प्रस्तुत किया गया था।
 संसद के दोनों सदनों से पास होने और इस पर आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति मिलने के बाद इस विधेयक को 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो गई

 और यह ‘संविधान (99वाँ) संशोधन अधिनियम, 2014’ के रूप में भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

 इस संशोधन के तहत संविधान में एक नया अनुच्छेद 124-क जोड़ा गया जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग  के संगठन के बारे में उपबंध था।

इसके अनुसार राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की संरचना निम्नानुसार तय की गई-

1. भारत के मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष),
 2. उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश,
3. केंद्रीय क़ानून मंत्री,

4. दो प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिन्हें मुख्य न्यायमूर्ति, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता से मिलकर बनने वाली समिति द्वारा नाम-निर्देशित किया जाना था।

इन दो व्यक्तियों में से एक को अजा, जजा, ओबीसी, अल्पसंख्यक या महिला होना चाहिए था।

अक्तूबर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असांविधानिक घोषित करते हुए देश के लगभग समूचे राजनीतिक वर्ग को कठघरे में खड़ा कर दिया था।

वह अच्छा मौका था, जब व्यवस्था में सुधार के रास्ते खोले जाते। यदि संसदीय प्रस्ताव में दोष थे,

तो उन्हें दुरुस्त करने के रास्ते बताए जाते।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग न्यायपालिका के कामकाज में दखल देता है।

 पुराने तरीके यानी कॉलेजियम सिस्टम से ही जजों की नियुक्ति होगी।

उसके बाद से व्यवस्था में दोतरफा ठहराव आ गया है।

 उसी वक्त से यह सवाल भी उभरकर सामने आ रहा है कि इस टकराव या तकरार को कैसे खत्म किया जाए?

एनजेएसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

एक तो यह कि नियुक्ति का अधिकार जजों तक सीमित रहना न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जरूरी है।

 यानी कि कार्यपालिका या सिविल सोसायटी की किसी भी किस्म की भागीदारी ठीक नहीं।

दूसरे, न्यायाधीश की योग्यता और उपयुक्तता का आकलन करने की समझदारी न्यायपालिका से बाहर के किसी व्यक्ति में नहीं हो सकती।
 और यह कि राजनेता भ्रष्ट और अयोग्य हैं।
 (sorce – swarajyamag )

भारत का मुख्य न्यायधीश


(Chief Justice of India / CJI) भारतीय न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय का अध्यक्ष होता है।
भारत के भारत का मुख्य न्यायाधीश

Emblem of the Supreme Court of India
पदस्थ

जस्टिस शरद अरविंद बोबडे
(18 नवंबर 2019 से)

भारतीय न्यायपालिका

संक्षेपाक्षर - CJI
अधिस्थान-नई दिल्ली

नामांकनकर्ता Collegium of the Supreme Court
नियुक्तिकर्ता भारत के राष्ट्रपति

अवधि काल
till the age of 65 yrs[1]

गठनीय साधन भारतीय संविधान (under article 124)

गठन 1950

प्रथम धारक -

जस्टिस एस जे कानिया(26/01/1950 - 06/11/195
( sorce -विकिपीडिया )

मुख्य बिंदु:


1 दिसंबर, 2019 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिये स्वीकृत कुल पदों के 38% पद रिक्त हैं।

आंध्र प्रदेश और राजस्थान सहित कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में वास्तविक क्षमता के आधे से भी कम न्यायाधीश हैं।


नियुक्ति संबंधी प्रावधान:


सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये छह महीने की समयावधि तय की है

जिनके नाम पर सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम, उच्च न्यायालय और सरकार ने सहमति व्यक्त की है।

उच्च न्यायपालिका के लिये न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के अंतिम अनुमोदन हेतु निर्दिष्ट समय-सीमा तय की गई है।

मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (Memorandum of Procedure) के अनुसार -

 एक पद रिक्त होने के कम-से-कम छह महीने पहले नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिये

 तथा उसके बाद छह सप्ताह का समय राज्य द्वारा केंद्रीय कानून मंत्री को सिफारिश भेजने के लिये निर्दिष्ट किया गया है।

तत्पश्चात् चार सप्ताह के अंदर प्रक्रिया संबंधी संक्षिप्त विवरण सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम के पास भेजा जाता है।

एक बार जब कॉलेजियम द्वारा नामों की मंजूरी दे दी जाती है तो कानून मंत्रालय को इसे तीन सप्ताह में प्रधानमंत्री को सिफारिश के लिये भेजना होगा।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा तबादले के लिये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम बनाया था,

जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम को यह कहते हुए असंवैधानिक करार दिया था

कि ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ अपने वर्तमान स्वरूप में न्यायपालिका के कामकाज में एक हस्तक्षेप मात्र है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को भेजे गए नामांकनों पर कार्रवाई नहीं करने के लिये केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कोलेजियम द्वारा इन नामों को पुनः नामांकित किया जाता है
तो सरकार के पास न्यायाधीशों को नियुक्त करने के अला3वा कोई विकल्प नहीं है।

निष्कर्ष 


कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेदों का सार्वजनिक होना लोकतंत्र के लिये नुकसानदायक है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका के अपने-अपने अधिकार क्षेत्र हैं। संविधान के तहत दोनों की सुपरिभाषित भूमिकाएँ हैं और अदालतों की भूमिका अंततः विधि का शासन सुनिश्चित कराने की है। न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों अपना-अपना काम करती हैं। विधायिका कानून बनाती है और इसे लागू करना कार्यपालिका का तथाविधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने की जाँच करना न्यायपालिका का काम है।


स्रोत-द हिंदू, दृष्टि आईएएस , jagaran जोश, swarajyamag


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