गुरुवार, 7 नवंबर 2019

भारतीय रेलवे का निजीकरण से क्या होगा सकारात्मक और नकारात्मक परिणाम?

भारतीय रेलवे का निजीकरण जानिये सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष 

 चर्चा में है 150  ट्रेनों और 50 रेलवे स्टेशन की कमान निजी कंपनी के हाथ में जाने की. नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने 50 रेलवे स्टेशनों की छवि सुधारने को लेकर रेलवे को दिखाएं एक पत्र. जिसे कारण रेलवे कर्मचारियों सहित आम लोगों ने सरकार की इस पहल के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया है. 

 पीयूष गोयल ने कहा है कि सरकार रेलवे का निजीकरण करने नहीं जा रही है बल्कि निवेश लाने के लक्ष्य से ppp पब्लिक,  प्राइवेट,  पार्टनरशिप को बढ़ावा देने के लिए विचार कर रही है. हालांकि सरकार की मंशा है कि निजीकरण के द्वारा यात्रा को सुविधाजनक बनाया जा सके. 
 अब सवाल यह है,  कि क्या सरकार ने निजीकरण की नकारात्मक परिणाम के लिए कोई उपाय सोच रखा है या नहीं? 
 क्या सरकार ने रेलवे के निजीकरण का अध्ययन किया है या नहीं? 
 इस प्रकार के प्रश्नों सहित रेल किराए की इजाफे और रेलवे भर्ती  समेत तमाम पहलुओं पर विचार किया जा रहा है. कुछ भी हो ऐसा लगता है कि निजी करण से हमारे अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा|

क्या है पूरा मामला? 

 नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने एयरपोर्ट की तर्ज पर ट्रेनों को भी निजी कंपनियों के हाथों में सौंपने की वकालत की है. 50 स्टेशनों को वरीयता के आधार पर विश्व स्तर का बनाने और इस काम में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया है, इसी के आधार पर उन्होंने ट्रेनों के  निजीकरण के लिए एक एम्पॉवर्ड  ग्रुप ऑफ सेक्रेट्री का भी गठन करने की सलाह दि है. 
 रेलवे स्टेशन और ट्रेनों के निजीकरण के लिए एक कमेटी के गठन किए हैं, जिसके सदस्य नीति आयोग के सीईओ,  रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष, आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव और रेलवे के फाइनेंशियल कमिशनर  शामिल है|
 नीति आयोग एक ऐसी योजना पर जोर दे रहा है जिसमें निजी निवेश को आकर्षित करके , स्टेशनो के  आसपास के क्षेत्रों का समग्र विकास किया जा सके |

निजीकरण का मतलब है 

 रेलवे को परिचालित करने वाले आवश्यक साधन मसलन प्रक्रिया स्टेशन कर्मचारी रेलवे की ही रहेंगे यात्रियों की सुविधा बढ़ाने और टिकटिंग जैसे काम प्राइवेट कंपनियां करेंगे|

रेलवे के निजीकरण के कारण 


 1.) लगातार आर्थिक घाटे में चलने वाली उपक्रम है भारतीय रेलवे, सेवाओं की गुणवत्ता के उच्च मानकों  को प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाई है|

2.) रेलगाड़ी का समय प्रबंधन भी भारतीय रेलवे के समक्ष है एक बड़ी चुनौती|

3.) 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिए संसाधन जुटाने  और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए विवेक देबरॉय  समिति का गठन किया था. समिति ने 2015 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और रेल के डिब्बो तथा  इंजन के निजीकरण की बात कही थी;

4.) समिति ने रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए एक अलग कंपनी के निर्माण की भी मांग की है,  माना जा रहा है कि सरकार की इस पहल के पीछे इस समिति की सिफारिश का भी योगदान है;

निजीकरण से क्या फायदे होंगे? 


 1.) टिकटिंग  और रखरखाव जैसे  काम निजी कंपनियों को सौपने  के बाद रेल में घाटे का सिलसिला हो सकता है खत्म;

2.) रेलवे में निजी कंपनियों के आने से बेहतर हो सकेगी  प्रबंधन, बेहतर हो सकेगी  सेवाओं की गुणवत्ता ;

3.) इसके अलावा रेलवे में दुर्घटना भी एक बहुत बड़ी समस्या है घटनाओं का मुख्य कारण रखरखाव है. ऐसा माना जा रहा है कि अगर हमें इन दुर्घटनाओं से निजात पाना होगा तो निजी क्षेत्र को अनुमति देनी होगी;

4.) रेलवे में एकाधिकार के समाप्त होने से पैदा होगा प्रतिस्पर्धा का माहौल रेलवे को मुनाफा पहुंचाने का मार्ग भी हो सकेगा प्रस्त ;

निजीकरण के नाकारात्मक पक्ष ;


1.) निजी कंपनियों के भर्ती के स्तर तक साझेदारी करने से कर्मचारियों की हो सकती है छटनी ;

2.) निजी कंपनियों को तय करने की छूट देने पर आम लोगों की जेब पर पड़ सकती है मंगाई;

3.) रेलवे की निजीकरण से इसकी कनेक्टिविटी हो सकती है सीमित;

4.) अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होने के कारण निजी कंपनी में पाई जाती है जवाब देता की कमी ;

आगे की राह क्या होनी चाहिए? 


 रेलवे के निजीकरण का दुनिया भर में देखने को मिला है अनुभव पहल में बेहद सावधानी बरतने की जरूरत है.

 ब्रिटिश रेलवे का निजीकरण रहा है बेहद विवादास्पद विरोधियों का तर्क है कि निजीकरण से कोई फायदा नहीं है,  क्योंकि यात्री किराया अधिक है.
 ट्रेन पहले की अपेक्षा ज्यादा विलम्ब  से चलती है और यात्रीयों में काफी असंतोष देखने को मिला है. इसलिए ब्रिटेन में रेलवे को निजी हाथों से छीन कर फिर से राष्ट्रीयकरण करने की योजना बनाई जा रही है.

 हालांकि जापान में रेलवे का निजीकरण बेहद प्रभावी रहा है, बल्कि लागत में कमी आई और सेवाओं में भी सुधार आई है

 भारत की बात करें तो सरकार का कोई भी उपक्रम जाए वह बैंकिंग हो या पावर सेक्टर या फिर सुदूर संचार कंपनी इसके बारे में ना कोई ज्यादा लोग जानते हैं ना ही प्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं. इसलिए लोग उनकी निजी करण का परवाह नहीं करते.
 लेकिन भारतीय रेल लोगो के जीवन से सीधे तौर से जुड़ा हुआ है लोग इसे अपनी संपत्ति मानते हैं इसलिए रेलवे का  निजी हाथों में जाने से लोगों पर मनो वैज्ञानिक असर पड़ेगा;
 संसाधनों से लैस दसको के  अनुभव के बाद भी सरकार की अक्षमता है चिंता का विषय. बड़ी कदम को उठाने से पहले हुए व्यापाक चर्चा करने की जरुरत है 
भारत के रेलवे के निजीकरण का क्या परिणाम होगा ये तो भविष्य में ही देखा जायेगा. 
लिहाजा यह जरुरी है की एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाय. और सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर आगे बढ़ा जाय |

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