मंगलवार, 14 जुलाई 2020

Finance commission 


चलिए जानते है फाइनेंस कमिशन के बारे में

 पैसा हम सबके लिए जरूरी है एक परिवारके लिए घर चलाने से लेकर  एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जिस तरह पैसे की जरूरत होती है

 ठीक वैसे ही सरकार को देश या राज्य चलाने के लिए पैसों की जरूरत होती है.

 परिवार में कमाई के बावजूद यदि पैसा कम पड़ जाए तो हम अपने दोस्तों यह मां-बाप से पैसा ले सकते हैं

 संविधान में भी देश को एक परिवार की तरह ही देखा गया है
 इस परिवार के मुखिया यानी केंद्रीय राज्य के पास कमाई की कई स्रोत है

 एक आम परिवार के पास जैसे एक सेविंग अकाउंट होता है ठीक उसी प्रकार केंद्र और राज्य की पूरी कमाई देश के संचित निधि में चला जाता है

 कमाई का हिस्सा भले ही कम या ज्यादा हो लेकिन इसका बटवारा संविधान के मुताबिक समान रूप से होना चाहिए
 और इस कमाई को सब में बराबर तरीके से बांटने का जीमा है 
फाइनेंस कमीशन यानी वित्त आयोग का

 फाइनेंस कमीशन यानी वह संवैधानिक संस्था जो केंद्र से लेकर राज्य के विकास के तमाम कामों के लिए वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करती है

 1951 से लेकर अब तक 15 वित्त आयोग गठित हो चुके हैं

. बैकग्राउंड


फाइनेंस कमीशन को हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के  आर्टिकल 280 में मेंशन किया गया है

चुकी कॉन्स्टिट्यूशन में मेंशन किया गया है इसलिए यह कॉन्स्टिट्यूशन  बॉडी है

यह 22 नवंबर 1951 को गठित हुआ

फाइनेंस कमीशन quasi-judicial बॉडी है

मींस ये  अपनी अपनी खुद की कुछ डिसीजन ले सकती है और इट कैन परफॉर्म ज्यूडिशरी सिस्टम

फाइनेंस कमीशन कांस्टीट्यूट किया जाता है प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया द्वारा

यह हर 5 साल में कांस्टीट्यूट किया जाता है

इसे कुछ कंडीशन पर 5 साल से पहले भी कॉन्स्टिट्यूशन जा सकता है

 कंपोजीशन


इसमें एक चेयरमैन और 4 मेंबर होते हैं

जिसमें दो टेंपरेरी होते हैं दो परमानेंट मेंबर होते हैं

इसे प्रेसिडेंट  अपॉइंट करते हैं

यह अपनी रिअप्वाइंटमेंट के लिए एलिजिबल होते हैं

 क्वालिफिकेशन


 क्या क्वालिफिकेशन होनी चाहिए चेयरमैन या मेंबर को अप्वॉइंट होने के लिए

क्वालीफिकेशन पार्लियामेंट स्पेसिफाइड करती है

पब्लिक अफेयर्स का नॉलेज होना चाहिए चेयरमैन अप्वॉइंट होने के लिए

और 4 मेंबर्स में से पहले मेंबर के लिए जरूरी है कि हाईकोर्ट का जज हो या फिर  हाई कोर्ट का  जज अप्वॉइंट होने के लिए एलिजिबल हो

दूसरे मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके पास स्पेशलाइज नॉलेज होना चाहिए फाइनेंस एंड अकाउंट का

तीसरी मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके वाइड एक्सपीरियंस होना चाहिए फाइनेंस एंड एडमिनिस्ट्रेशन में

चौथे मेंबर के लिए जरूरी है कि उसके पास स्पेशल नॉलेज होना चाहिए इकोनॉमिक्स का 

 फंक्शंस

 फाइनेंस कमीशन का नाम सुनते ही आप सोच रहे होंगे कि क्या जरूरत है फाइनेंस कमीशन का गठन करने के लिए हमारे देश में
फाइनेंस कमीशन फॉलोइंग मैटर पर रिकमेंडेशन देता है प्रेसिडेंट को

डिसटीब्यूशन करता है टैक्स का सेंट्रल स्टेट के बीच

सहायता में अनुदान कंसोलिडेटेड फंड आफ इंडिया  से दी जाती है उस से रिलेटेड जो भी रिकमेंडेशन होता है वह भी फाइनेंस कमीशन द्वारा दिया जाता है

इसके अलावा पंचायत और म्युनिसिपालिटी के लिए फण्ड  स्टेट फाइनेंस कमिशन द्वारा दिया जाता है लेकिन स्टेट फाइनेंस कमिशन को रिकमेंड करता है सेंट्रल फाइनेंस कमिशन

इन सभी का रिपोर्ट फाइनेंस कमिशन प्रेसिडेंट के पास भेजता है

और प्रेसिडेंट पार्लियामेंट की बोथ हाउसेस लोकसभा और राज्यसभा के सामने पेश करता है

चीजें डिस्कस होती है

हमारे संविधान में यह मेनशन है कि फाइनेंस कमिशन का रिकमेंडेशन गवर्नमेंट के ऊपर  बाइंडिंग नहीं होगा



शनिवार, 11 जुलाई 2020

यूपीएससी क्या है? 


 यूपीएससी भारत की प्रमुख सेंटर रिक्रूटमेंट एजेंसी में से एक है

 यह सभी इंडियंन सर्विसेज और सेंट्रल सर्विसेज के ग्रुप ए और ग्रुप बी  के लिए नियुक्तीया करता है,  और परीक्षाओं का आयोजन भी

 जिसमें देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाएं जैसे आईएएस,  आईपीएस, आईआरएस,  आईएस एनडीए ने आईएफएससी आदि शामिल है

 यूपीएससी कर्मियों के प्रमोशन और ट्रांसफर से संबंधित मामले को भी देखता है

 पृष्ठभूमि

 तो  चली अब यूपीएससी के बैकग्राउंड के बारे में जान लेते हैं

भारत में लोक सेवाओं का जन्म  काल में हुआ

ली कमीशन के सुझाव पर 1926 में पहली बार सेंट्रल पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना की है

ली कमीशन के चेयरमैन ली  वार्कर  थे 

इंडियन गवर्नमेंट एक्ट 1935 के तहत इसका नाम बदलकर फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन यानी संघीय लोक सेवा आयोग कर दिया गया

आजादी के बाद 1950 में कुछ बदलाव कर एवं इसके  अधिकारो में  विस्तार करके इसे  यूपीएससी नाम दिया गया

 कांस्टीट्यूशनल स्टेटस

 चलिए कॉन्स्टिट्यूशन स्टेटस को देखते हैं

यूपीएससी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट 14 के आर्टिकल 315 से 323 के बीच कवर किया गया है

यूपीएससी इंडिपेंडेंस कॉन्स्टिट्यूशन बॉडी है क्योंकि इसका गठन कांस्टीट्यूशनल प्रोविजन के द्वारा किया गया है

कंपोजिशन

 तो चली अब यूपीएससी के कंपोजीशन के बारे में जान लेते हैं

इसमें एक चेयरमैन और कुछ मेंबर होते हैं

इसे प्रेसिडेंट ऑफ पॉइंट करते हैं

कॉन्स्टिट्यूशन में आयोग के सदस्यों की संख्या का उल्लेख नहीं किया गया है..

यह राष्ट्रपति के विवेक के ऊपर छोड़ दिया गया है जो आयोग की संरचना का निर्धारण करता है

एलिजिबिलिटी

संविधान कमीशन के सदस्य की एलिजिबिलिटी के संबंध में भी मौन है

हालाकी आवश्यक है कि आयोग की आधे सदस्य को इंडियन गवर्नमेंट या स्टेट गवर्नमेंट के अधीन कम से कम 10 साल का वाकिंग एक्सपीरियंस हो

कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया प्रेसिडेंट को चेयरमैन या मेंबर की सेवा की शर्तें निर्धारित करने का राइट दिया है

 टर्म्स ऑफ़ ऑफिस

6 year or 65 years of age which  ever is earlier 

राष्ट्रपति को कभी भी त्यागपत्र दे सकते हैं

टर्म्स ऑफ़ ऑफिस पूरा होने से पहले भी प्रेसिडेंट द्वारा संविधान में वर्णित प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जा सकता है

 रिमूवल आफ यूपीएससी

प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया निम्नलिखित परिस्थितियों में यूपीएससी के चेयरमैन या मेंबर को हटा सकता है

1.) यदि उस पर्सन को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है

2.) यदि यूपीएससी के मेंबर या चेयरमैन किसी पेड़ एंप्लॉयमेंट में पाए जाते हैं

3.) और यदि प्रेसिडेंट को लगता है कि वह फिजिकली और मेंटली अनफिट है अपने ऑफिस को continue  करने के लिए

4.) प्रेसिडेंट मिसबिहेवियर के आधार पर भी चेयरमैन या मेंबर को हटा सकता है

5.) किंतु इस प्रकार के मैटर की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जाती है

6.) प्रेसिडेंट ,सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मैटर में दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य है

 इंडिपेंडेंस ऑफ यूपीएससी

 Security of tenure –

चेयरमैन या मेंबर को प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया संविधान में वर्णित आधार पर ही हटा सकता है

Conditions  of services – 

हालांकि चेयरमैन या मेंबर की सेवा की शर्तें प्रेसिडेंट डिसाइड करता है लेकिन अपॉइंटमेंट के बाद इसमें अलाभ कारी  परिवर्तन नहीं किया जा सकता है

सैलेरी एंड पेंशन से सम्बंधित सभी  खर्चे कंसोलिडेटेड फंड आफ इंडिया यानी भारत की संचित निधि से दी जाती है

यूपीएससी के इंडिपेंडेंट से रिलेटेड एक और प्रोविजन है कॉन्स्टिट्यूशन में

यूपीएससी के चेयरमैन सेंट्रल गवर्नमेंट स्टेट गवर्नमेंट एंप्लॉयमेंट के लिए एलिजिबल नहीं होंगे

इसके अलावा यूपीएससी के जो मेंबर है वह सिर्फ यूपीएससी के चेयरमैन बन सकते हैं या फिर स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशन के चेयरमैन बन सकते हैं

यूपीएससी के चेयरमैन या मेंबर अपने सेकंड टर्म के लिए एलिजिबल नहीं होते

 फंक्शंस ऑफ यूपीएससी

ऑल इंडिया सर्विसेज या अखिल भारतीय सेवाओं सेंट्रल सर्विसेज व यूनियन टेरिटरीज की लोक सेवाओ  में नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का आयोजन करता है

दो या दो से अधिक स्टेट्स द्वारा रिक्वेस्ट करने पर संयुक्त भर्ती की योजना व प्रवर्तन करने में सहायता करता है

किसी राज्यपाल के अनुरोध पर प्रेसिडेंट की स्वीकृति के उपरांत सभी या  किन्ही  मामलों पर राज्यों को सलाह प्रदान करता है

 यूपीएससी की भूमिका

सविधान आशा करता है यूपीएससी इंडिया में मेरिट  system का  प्रहरी होगा
इसके अलावा यह गवर्नमेंट को एडवाइज भी देता है जब consult  किया जाता है

मंगलवार, 7 जुलाई 2020



तो चलिए आज जानेंगे इलेक्शन कमिशन के बारे में इलेक्शन कमिशन की कंपोजिशन एंड फंक्शन के बारे में जानने से पहले चलिए कुछ फैक्ट्स एंड फिगर्स के बारे में जान लेते हैं

हमारा भारत देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ

इंडिया में पहला जनरल इलेक्शन 1951 से 1952 के बीच कंडक्ट कराया गया था

जिसमें 17.3 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर्स थे

इंडिया के पहले चीफ इलेक्शन कमिश्नर सुकुमार सेन थे

1982 के आसपास ही इंडिया में पहली बार ईवीएम यूज़ की गई थी

1998 तक हम  बैलट पेपर के थ्रू वोट कास्ट करते थे

2004 से वोटिंग के लिए सिर्फ ईवीएम मशीन यूज़ की जाती है

हमारे करंट चीफ इलेक्शन कमिश्नर है सुनील अरोड़ा


 क्या आपको पता है 17th  जनरल इलेक्शन में दुनिया के सबसे ज्यादा रजिस्टर वोटर थे 900000000 रजिस्टर वोटर
 अब आप सोच रहे होंगे कि मैं बार-बार जनरल इलेक्शन का नाम क्यों ले रही हूं
  •  इंडिया में चार प्रकार के इलेक्शन होते हैं

1. लोक सभा इलेक्शन या जनरल इलेक्शन
2. राज्य सभा इलेक्शन
3. स्टेट असेंबली इलेक्शन
4. पंचायत और म्युनिसिपालिटी इलेक्शन


 चलिए आगे बढ़ते हैं अच्छा आपको यह तो पता ही होगा कि हमारे 
गवर्नमेंट के तीन और organs  होते हैं

1. लेजिसलेटिव
2. एग्जीक्यूटिव
3. ज्यूडिशरी

अब चुके हमारे कंट्री में फेडरल सिस्टम फॉलो होता है

फेडरल सिस्टम मींस जो भी पावर है  उसे इक्वली सेंटर और स्टेज के बीच बांटा जाता है

इसलिए व्यवस्थापिका को भी दो पार्ट में डिवाइड किया गया है सेंट्रल और स्टेट

स्टेट में होता है स्टेट लेजिसलेच्योर जिसे विधानसभा भी बोला जाता है

वही सेंटर में होता है पार्लियामेंट

पार्लियामेंट दो हाउसेस से मिलकर बनता है लोकसभा और राज्यसभा

राज्यसभा में मैक्सिमम ढाई सौ मेंबर्स हो सकते हैं और इसी करंट ऑक्युपेंसी है 245 सीट की

इसका सीट एलोकेशन भी देख लेते हैं

233 मेंबर्स स्टेट असेंबली से आते हैं

वहीं 12 मेंबर्स डायरेक्टरी प्रेसिडेंट नॉमिनेट करते हैं

अब लोकसभा को देखते हैं इसकी मैक्सिमम ऑक्युपेंसी 552 मेंबर की है

और इसकी करंट ऑक्युपेंसी 545 मेंबर के हैं

इसमें 530 मेंबर्स स्टेट से आते हैं 20 यूनियन टेरिटरीज जाते हैं वही दो एंग्लो इंडियन प्रेसिडेंट अप्वॉइंट करते हैं

लोकसभा में जिसके पास 50% से ज्यादा शीर्ष आती हैं वही गवर्नमेंट फार्मूलेट करता है


 तो चलिए अब इलेक्शन कमीशन के कंपोजीशन के बारे में जान लेते हैं
हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट 15 के आर्टिकल 324 से 329 के बीच में इलेक्शन कवर किया गया है

आर्टिकल 324 यह कहता है कि हमारे कंट्री में एक इंडिपेंडेंट इलेक्शन कमिशन होगा जो फ्री एंड फेयर इलेक्शन कंडक्ट करवा सकें

आर्टिकल 324 ये भी कहता है कि पार्लियामेंट,  स्टेट असेंबली, प्रेसिडेंट,  वाइस प्रेसिडेंट इन चारों का इलेक्शन इलेक्शन कमिशन ही कंडक्ट करवाएगा

पंचायत और म्युनिसिपालिटीज का इलेक्शन स्टेट इलेक्शन कमिशन कंडक्ट कराता है

याद रखिए स्टेट इलेक्शन कमिशन और इलेक्शन कमिशन 2 डिफरेंट और इंडिपेंडेंट अथॉरिटी से

 
 हमारा इलेक्शन कमीशन एक चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो अन्य इलेक्शन कमिश्नर से मिलकर बना है

चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दो इलेक्शन कमिश्नर इन तीनों को प्रेसिडेंट appoint  करते हैं

इन तीनों के पावर इक्वल होते हैं

अगर कोई डिस्प्यूट होता है तो वोटिंग के थ्रू मेजॉरिटी से सॉल्व कर लिया जाता है

और इन तीनों की सैलरी इक्वल होता है और सिमिलर होता है सुप्रीम कोर्ट के जज से

इनका टर्म्स ऑफ़ ऑफिस होता है 6 ईयर या फिर 65 ईयर of age which ever is earlier

1950 से 1989 तक हमारा इलेक्शन कमिशन एक सिंगर मेंबर बॉडी था

 अब चलते हैं आर्टिकल 326 पर जो हमें right to vote प्रदान करता है

1988 तक आर्टिकल 326 कहता था कि वोटिंग का मैक्सिमम एज 21 ईयर होगा

लेकिन 1988 में 61st amendment act के थ्रू मिनिमम वोटिंग एज 21 ईयर्स कम करके 18 ईयर कर दिया गया

हम यह रिड्यूस की थी तो वोटर्स बढ़ गए थे और उनके साथ साथ काम भी

इसलिए 1989 में सिंगल मेंबर बॉडी बन गया मल्टी मेंबर बॉडी

लेकिन 1990 को इस पोजीशन को फिर से रिवर्स कर दिया गया और इसे बना दिया गया सिंगर नंबर बॉडी

पर 1993 को इस पोजीशन को फिर से रिवर्स किया गया

और 1993 से आज तक हमारा इलेक्शन कमिशन मल्टी मेंबर बॉडी है

 कुछ और ऑफिसर का नाम जान लेते हैं

District  में जो भी इलेक्शन होता है उन इलेक्शन को सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं district इलेक्शन ऑफीसर

स्टेट या यूनियन टेरिटरी में जो भी इलेक्शन होते हैं उसे सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं चीफ इलेक्शन ऑफिसर

पार्लियामेंट में जो भी इलेक्शन होते हैं उसको सुपरवाइज करने के लिए रिस्पांसिबल होते हैं रिटर्निंग ऑफिसर

 दोस्तों उम्मीद करती हूं कि आपको मेरे इस ब्लॉग से कुछ नया सीखने को मिला होगा यदि हां तो प्लीज  शेयर करना न भूले |

गुरुवार, 11 जून 2020

Stock exchange   -

http://www.clearknowledges.com/2020/06/Stock-exchange-kya-hai-ye-kaise-kary-krta-hai.html?m=1


 normally जैसे हम किसी मंडी को ले लेते है वहाँ एक सब्जी बेचने वाला रहता है और buyers सब्जी buy करने जाता है 
तो यहाँ मंडी एक ऐसा प्लेटफार्म है जो buyers और sellers को मिलाने का काम करता है 

जो एक unorganized market  है 
अब  आप  इसी के उदाहरण से stock exchange को easily समझ पाएंगे |

Stock exchange एक organized market है जो buyers और sellers को एक platform प्रदान करता है इस platform पर trader stocks को खरीद और बेच सकते  है 
शेयर का मतलब होता है हिस्सा. बाजार उस जगह को कहते हैं जहां आप खरीद-बिक्री कर सकें.

  • अगर शाब्दिक अर्थ में कहें तो शेयर बाजार (Stock Market) किसी सूचीबद्ध कंपनी में हिस्सेदारी खरीदने-बेचने की जगह है. भारत में बोम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) नाम के दो प्रमुख शेयर बाजार हैं.

BSE या NSE में ही किसी लिस्टेड कंपनी के शेयर ब्रोकर के माध्यम से खरीदे और बेचे जाते हैं. शेयर बाजार (Stock Market) में हालांकि बांड, म्युचुअल फंड और डेरिवेटिव का भी व्यापार होता है.
Stock exchange एक secondary market  है  |


Secondary market क्या है? 
http://www.clearknowledges.com/2020/06/Stock-exchange-kya-hai-ye-kaise-kary-krta-hai.html?m=1


साधारण भाषा में समझे तो जैसे हम किसी शेयर को buy करते है तो stock exchange के पास जाते है क्युकी वह एक platform है जहा हम शेयर का trade करते है 


इस मार्केट में किसी लिस्टेड कंपनी के शेयरों की खरीद-बिक्री होती है. इस बाजार में किसी व्यक्ति के पास मौजूद शेयर बाजार भाव पर कोई दूसरा व्यक्ति रियल टाइम में खरीदता है. आमतौर पर यह खरीद-बिक्री किसी ब्रोकर के जरिये होती है. सेकेंडरी शेयर मार्केट के जरिये ही किसी निवेशक को यह सुविधा मिल पाती है कि वह अपने शेयर किसी और व्यक्ति को बेचकर बाजार से बाहर निकल सकता है.

मसलन, टाटा स्टील के शेयरों का भाव अभी 230 रुपये है. कोई व्यक्ति इन शेयरों को मौजूदा बाजार भाव पर खरीदना चाहता है. उस समय कोई व्यक्ति इन शेयरों को इसी भाव पर बेचना भी चाहता होगा. ब्रोकर खरीदने वाले के लिए बाय आर्डर देकर और पैसे चुकाकर उस निवेशक के लिए इसे खरीद लेता है. इस तरह एक नया निवेशक उस कंपनी में हिस्सेदार बन जाता है.
Stock exchange पर share buy और sell दोनों किया जा सकता है इसीलिए हम इसे secondary market कहते है |

Shares को buy करने के लिए mainly 2 stock exchange है 
1.NSE
2. BSE
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1.NSE (national stock exchange ) –

नेशनल स्टॉकएक्सचेंज  india का   सबसे बड़ा और तकनीकी रूप से अग्रणी stock exchange है  । यह मुंबई में  स्थित है। इसकी स्थापना 1992 में हुई थी। कारोबार के लिहाज से यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है। इसके वीसैट (V-SAT) टर्मिनल india के  320 शहरों तक फैले हुए हैं। एनएसई देश में एक आधुनिक और पूरी तरह से स्वचालित स्क्रीन-बेस्ड इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम प्रदान करने वाला पहला एक्सचेंज था। एनएसई की इंडेक्स- निफ्टी 50 है 

2.BSE (bombey stock exchange ) –


मुंबई स्टॉक एक्सचेंज भारत  और एशिया  का सबसे पुराना stock exchange है  । इसकी स्थापना 1875 में हुई थी। इस एक्सचेंज की पहुंच 417 शहरों तक है। मुंबई स्टॉक एक्सचेंज भारतीय share market में  दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है | भारत को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार में अपना श्रेष्ठ स्थान दिलाने में बीएसई की अहम भूमिका है 
BSE का index सेंसेक्स है 

शेयर खरीदने का मतलब –

मान लो NSE में listed कोई company अपना 10 लाख  शेयर जारी करती है  उस company के प्रस्ताव के अनुसार आप अपना शेयर खरीद लेते हो तो company के उतना मालिकाना हक आपको प्राप्त हो जाता है 
आप उस शेयर को ज़ब चाहे बेच सकते हो |

Stock exchange के गुण

स्टॉक एक्सचेंज के साथ लिस्टिंग से कंपनी की प्रतिभूतियों के लिए विशेष विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।  उदाहरण के लिए, केवल सूचीबद्ध कंपनी के शेयरों को स्टॉक एक्सचेंज में उद्धृत किया जाता है।

 प्रतिष्ठित स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होना कंपनियों, निवेशकों और आम जनता के लिए फायदेमंद माना जाता है 

आप  शेयर बाजार में निवेश की शुरूआत कैसे कर सकते है?
 
आपको सबसे पहले किसी ब्रोकर की मदद से डीमैट अकाउंट खुलवाना होगा. इसके बाद आपको डीमैट अकाउंट को अपने बैंक अकाउंट से लिंक करना होगा.

बैंक अकाउंट से आप अपने डीमैट अकाउंट में फंड ट्रांसफर कीजिये और ब्रोकर की वेबसाइट से खुद लॉग इन कर या उसे आर्डर देकर किसी कंपनी के शेयर खरीद लीजिये.

इसके बाद वह शेयर आपके डीमैट अकाउंट में ट्रांसफर हो जायेंगे. आप जब चाहें उसे किसी कामकाजी दिन में ब्रोकर के माध्यम से ही बेच सकते हैं.


मंगलवार, 31 मार्च 2020

MFI क्या है? 

Microfinance institutions kya hai?

 बड़े-बड़े बैंक की स्थापना होने के बाद भी जब रीजनल रूरल बैंक  की स्थापना की गई फिर भी ग्रामीणों को यह लाभ नहीं पहुंचा पा रही थी

 गांव की गरीब और वंचित लोगों को महा जनों से ऋण अधिक ब्याज दर पर लेना पड़ता था

 यह सब देखते हुए सूक्ष्म  वित्तीय संस्थाओं का गठन किया गया.
   सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं बड़े बड़े बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण लेकर ग्रामीणों को कम ब्याज दर पर ऋण प्रदान  करते है.
ग्रामीण इस ऋण की अदायगी सप्ताह या महीनो में करते है

सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं सिर्फ ऋण दे सकती है.

इस प्रकार  सूक्ष्म वित्तीय संस्थाएं ग्रामीण  क्षेत्र की NBFC है

इस प्रकार RBI द्वारा निर्धारित सर्त जैसे Rbi ने सभी वाणिज्यिक बैंको पर चाहे वो देशी हो या विदेशी को अपने ऋण का 40 % ऋण प्राथमिक क्षेत्र देयता में देने के लिए निर्धारित किया है.

 चुकी MFI ग्रामीण क्षेत्र के वंचित और गरीब लोगो को ऋण देता है.  जो स्वरोजगार स्थापित करना चाहते है. इसलिय MFI प्राथमिक क्षेत्र देयता के अंतर्गत आता है.

इसलिए ज़ब वाणिज्यिक बैंक MFI को कम ब्याज दर पर ऋण देती है तो इससे RBI का मानक भी पूरा हो जाता है

माइक्रोफाइनेंस संस्थान की कार्यप्रणाली?

Micro Finance, इसके तहत दी जानेवाली रकम भले ही छोटी होती है किन्तु ये भी सत्य है कि इसके जरिये ही कामयाबी की राह खोजी गयी.

बड़े – बड़े कर्जदार जैसे बड़े बैंकों के लिए सरदर्द बने हुए हैं वहीँ दूसरी ओर Micro Finance कम्पनियाँ प्रत्येक वर्ष कारोबार में वृद्धि कर रही है

. ये कोई चिटफण्ड कंपनी नहीं है जो लोगों का पैसा लेकर भाग जाएगी क्योंकि MFI सिर्फ कर्ज दे सकती है लोगों का पैसा जमा नहीं कर सकती है.

Micro Finance कम्पनियों की कार्यप्रणाली पारम्परिक बैंकिंग प्रणाली से भिन्न है.

 इस क्षेत्र में सम्बंधित वित्तीय संस्थानों द्वारा एक अधिकारी को नियुक्त किया जाता है. यह नियुक्त किया गया अधिकारी लोगों के समूह के संपर्क में रहता है और आवेदक की आवश्यकताओं को समझते हुए उसी आधार पर अंतिम राशि तय करता है.

 ऋण लेनेवालों को भी माइक्रोफाइनेंस संस्थानों द्वारा निर्धारित की गयी कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है.

वास्तव में माइक्रोफाइनेंस संस्थान उन लोगों के लिए उपयोगी है जिन लोगों की पहुँच बैंकों तक नहीं है.

 इसके जरिये कम आय वाले लोग अपने पैरों पर खड़े होते है. माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का काम केवल ऋण देना नहीं होता है बल्कि उधारकर्ता का साथ तब तक नहीं छोड़ते हैं

 जब तक वे स्वयं अपना कारोबार चलाने के लिए सक्षम नहीं हो जाते हैं. यही एक विशेष कारण है कि हमारे देश में MFI कंपनियों की सफलता दर अधिक है.

Silent features of MFI

गरीब और वंचित लोगों को जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए होते हैं उन्हें  ऋण  प्रदान करते हैं

एम एफ आई एक प्रकार का एनबीएफसी है
यह मुख्यतः महिलाओं को ऋण प्रदान करता है

आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को ऋण प्रदान करता है तथा उन्हें प्रशिक्षित भी करता है जिसे वे छोटी-छोटी रोजगार कर सके

इसके द्वारा दिए यह ऋण  की भुगतान सप्ताह या महीनों में किया जाता है

एमएफआई द्वारा प्रदान किए गए माइक्रो लोन की पुनर्भुगतान आवृत्ति अधिक है और उधारकर्ता को त्वरित अंतराल पर राशि चुकाने की जरूरत है।

ज्यादातर मामलों में, इन संगठनों द्वारा आय-पीढ़ी के उद्देश्यों के लिए ऋण प्रदान किए जाते हैं।


कैसे एमएफआई उधारकर्ताओं को ऋण देते हैं [How MFIs Give Loan to the Borrowers in hindi]


समाज के गरीब वर्गों को सूक्ष्म वित्तीय सहायता देना एक बहुत जटिल मामला है।

 लेकिन मिक्रोफिनांस संगठन इस कार्य को पूर्णता के साथ करते हैं।

 प्रशासनिक अधिकारी को जगह पर जाना, उधारकर्ताओं से मुलाकात करना और उनके कौशल का विश्लेषण करना है।

इस पूरी प्रक्रिया में समय, ऊर्जा और जनशक्ति होती है।

ज्यादातर समय वित्तीय संस्थान उन्हें कुशल श्रम में विकसित करने के लिए सभी आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था करते हैं।

ऋण देने से पहले एमएफआई द्वारा विचार किए जाने वाले कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निम्नानुसार हैं:

ऋण अवधि- कभी-कभी उधारकर्ताओं को समय की छोटी अवधि के लिए ऋण दिया जाता है जो कुछ महीनों से 1 वर्ष तक हो सकता है। ऋण की चुकौती मासिक, साप्ताहिक या दैनिक आधार पर की जाती है।

जोखिम कारक- क्षेत्रीय अधिकारी को ऋण मंजूर करने से पहले आवेदकों की पुनर्भुगतान क्षमता का विस्तृत विश्लेषण करना पड़ता है।

पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन विभिन्न मानदंडों के आधार पर किया जाता है और यह कार्य अधिकारी द्वारा आयोजित किया जाता है।

शिक्षा- क्षेत्रीय अधिकारी भी सफल व्यवसाय शिक्षा चलाने के लिए उधारकर्ता के शिक्षा स्तर की जांच करता है, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

विशिष्ट कौशल- उधारकर्ता को व्यवसाय का पूरा या न्यूनतम ज्ञान होना चाहिए। एमएफआई उम्मीद करता है कि उधारकर्ता को उस व्यवसाय के बारे में पर्याप्त जानकारी हो जो वह आगे बढ़ने जा रही है।

समझौता- उधारकर्ता और ऋण प्रदान करने वाली संस्था के बीच एक समझौता होगा। समझौते में पुनर्भुगतान प्रक्रिया और धन आवंटन शामिल होगा। दोनों पार्टियों को सहमत होना है और फिर धनराशि का अंतिम आवंटन होगा।

भारत में एमएफआई के प्रकार क्या हैं [What are the Types of MFIs in India in hindi]


जेएलजी या संयुक्त देयता समूह
एसएचजी या सेल्फ हेल्प ग्रुप
ग्रामीण बैंक मॉडल
ग्रामीण सहकारी समिति



भारत में प्रमुख एमएफआई कौन सा हैं [Which are the Prominent MFIs in India in hindi]

भारत के कुछ प्रमुख वित्तीय संस्थान निम्नलिखित हैं जो समाज के आर्थिक रूप से वंचित वर्ग को वित्तीय सहायता दे रहे हैं:
भारत वित्तीय समावेशन लिमिटेड
स्पंदना स्पोर्टी फाइनेंशियल लिमिटेड
माइक्रोफिन लिमिटेड साझा करें
Asmitha Microfin लिमिटेड
श्री क्षेत्र धर्मस्थल ग्रामीण विकास परियोजना
भारतीय समृद्धि फाइनेंस लिमिटेड (बीएसएफएल)
बंधन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
कैशपोरो माइक्रो क्रेडिट (सीएमसी)
ग्रामा विद्यालय माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड (जीवीएमएफएल)
ग्रामीण कुट्टा फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (जीएफएसपीएल)
उत्कर्ष माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
उज्जिवन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
स्वधा फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड
अन्नपूर्णा माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
अरोहान फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
असिवाड माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
बीएसएस माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
दीशा माइक्रोफिन प्राइवेट लिमिटेड
इक्विटास माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
ईएसएफ़ माइक्रोफाइनेंस एंड इंवेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड
फ्यूजन माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
जनलक्ष्मी फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
मदुरा माइक्रो फाइनेंस लिमिटेड
आरजीवीएन (उत्तर पूर्व) माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
साटन क्रेडिटकेयर नेटवर्क लिमिटेड
एसएमआईएलई माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
सोनाटा फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
एसवी क्रेडिटलाइन प्राइवेट लिमिटेड
स्वधा फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड
सूर्योदय माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
अधिकारी माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
महासाम ट्रस्ट
मार्गदारशक फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड
पहल फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
राष्ट्रीय सेवा समिति
राष्ट्रीय ग्रामीण विकास निधि
सहारा उत्तरागा कल्याण सोसायटी
सहयोग माइक्रोफाइनेंस लिमिटेड
साईं फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
संहिता सामुदायिक विकास सेवाएं
संघमित्र ग्रामीण वित्तीय सेवाएं
सरला महिला कल्याण सोसायटी
शिखर माइक्रोफाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
उत्तरायन फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
वेदिका क्रेडिट कैपिटल लिमिटेड
ग्राम फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
वाईवीयू फाइनेंशियल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
हाथ में हाथ (HIH)
आरओआरईएस माइक्रो उद्यमी विकास ट्रस्ट (आरएमईडीटी)

एमएफआई की सफलता दर क्या है [What is the Success Rate of MFI in hindi]

भारत वर्तमान में दुनिया के अग्रणी देशों में से एक है जो सफलतापूर्वक बहुत से मिक्रोफिनांस इंस्टीटूशन चला रहा है।

 सभी सरकारी और गैर-सरकारी संगठन वंचित अनुभाग के जीवन को ऊपर उठाने के लिए विभिन्न परियोजनाएं चला रहे हैं और सफलता दर काफी अधिक है।

 इन संस्थानों का काम केवल ऋण प्रदान करने के साथ खत्म नहीं होता है।

वे उधारकर्ता से भी चिपके रहते हैं जब तक कि वे अपने कारोबार को अपने आप चलाने में सक्षम न हों।

नतीजतन, जोखिम कारक नीचे आता है और पुनर्भुगतान की संभावना निश्चित रूप से उच्च हो जाती है।

इसलिए, यह रिकॉर्ड है कि भारत में एमएफआई की सफलता दर बहुत अधिक है और ये संस्थान हर गुजरने वाले दिन के साथ बढ़ रहे हैं।

भारत में एमएफआई जितना अधिक सफल होगा, देश में गरीब वर्ग की सुधार दर अधिक होगी।

Microfinance : अंत में हमारा निष्कर्ष

एक ओर जहाँ Microfinance कम्पनियाँ वित्तीय सेवाएं प्रदान करने का कार्य कर रही है

 वहीँ दूसरी ओर गरीब और वंचित वर्ग की मदद करके देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का कार्य भी कर रही है.

साथ ही साथ ये कम्पनियाँ लोगों को धन का समुचित उपयोग करने के बारे में भी शिक्षित कर रही है.

माइक्रोक्रेडिट माइक्रोफाइनेंस के लिए एक और शब्द है जिसका प्रयोग भी लोगों के द्वारा किया जाता है.

हम सभी जानते हैं कि कम आय वाले वंचित लोगों को आसानी से अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का अवसर प्राप्त नहीं होता है.

ऐसे लोग बैंक ऋण के लिए भी योग्य नहीं होते हैं. ऐसे लोग ही Microfinance कंपनियों से वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं.
आपकी राय हमारे मार्गदर्शन के लिए आवश्यक है. आपको आज का लेख Microfinance kya hai? कैसा लगा हमें comment करके सूचित जरुर करें. यदि पसंद आई हो तो दोस्तों के साथ शेयर करना ना भूलें.

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020


चीन की राजनीतिक व्यवस्था,  राष्ट्रीय जन -कांग्रेस के  कार्य व अधिकार के बारे में समझाइए

चीन – 

चीनी जनवादी -गणराज्य एशिया महाद्वीप के पूर्व में स्थित 1.3 अरब जनसंख्या वाला देश है, यह क्षेत्रफल के दृस्टि से रूस, कनाडा, अमेरिका के बाद विश्व में चौथा स्थान  रखता  है |

इतना अधिक क्षेत्रफल होने के कारण यह बहुत से देशो के साथ सीमा साझा करता है (लगभग रूस के बराबर ) ही.

उत्तर से दक्षिण की ओर – रूस, मंगोलिया, ताईवान, भारत, तिबत, नेपाल, भूटान, भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान इत्यादि |

रूस में साम्यवाद का पतन होने के बावजूद भी चीन साम्यवाद को अपनाया हुआ है

चीनी सविधान – 

चीन में सविधान पहली बार 1954 में बना था जिसमे 106 अनुच्छेद थे,  दूसरी बार 1975 में बना था जिसमे 38 अनुच्छेद था,

  तीसरी बार 1982 में बना था जो सबसे लम्बा सविधान है इसमें 138 अनुच्छेद है और यही सविधान आज तक चीन में लागु है |

 चीन के सविधान की विशेषताए –

1. लिखित एवं विस्तृत सविधान 


2. समाजवादी गणराज्य की स्थापना – 

पूर्वी यूरोप में साम्यवाद के पतन के बावजूद भी चीन ने साम्यवाद का मार्ग नही त्यागा है |

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपनाये जाने के बावजूद भी सैद्धांतिक रूप से चीन अपने आप को ‘समाजवादी ‘ कहता है |

3.जनता की सम्प्रभुत्ता –

चीन के सविधान में सम्प्रभुता वहाँ कीं जनता में निहित है |
सविधान के अनुच्छेद 2 के अनुसार,

“चीनी जनवादी गणराज्य में सम्पूर्ण सत्ता का वास जनता में होगा |”

 साथ ही यह भी कहा गया है की इस सत्ता का प्रयोग राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस तथा स्थानीय जनवादी कांग्रेस के माध्यम से किया जायेगा

4.लोकतांत्रिक केन्द्रवाद – 

 पुराने साम्यवादी देशों में अपनाइ गयी व्यवस्था को बनाए रखते हुए इनकी शासन व्यवस्था में लोकतांत्रिक केंद्र वाद के सिद्धांत को बनाया गया है

इस सिद्धांत के अनुसार शासन के सभी प्रतिनिधि अंग नीचे से ऊपर की ओर निर्वाचित होते हैं

 नीचे की इकाइयां ऊपर की इकाई का निर्वाचन करती है यह तो हुआ  लोकतंत्र|

 दूसरी ओर शासन की सभी ऊपर की इकाइयों के आदेश को नीचे की इकाइयों को मानना पड़ता है यह हुआ केंद्रवाद |

5. एकात्मक शासन-

 चीन में एकात्मक शासन की व्यवस्था की गई है संविधान कोई शक्ति विभाजन नहीं करता परंतु चीन के एक विशाल देश होने के कारण ऐसा स्वभाविक है |

कि प्रशासनिक सुविधा के लिए चीन कई प्रांतों में बांटा जाए चीन में 21 प्रांत 5 स्वायत्तशासी क्षेत्र तथा तीन महानगर हैं तिब्बत और सिंकियांग स्वायत्तसासि  क्षेत्र है

एवं स्पीकिंग शंघाई और तिनसिन महानगर है चीन के प्रांत स्वायत्त शासित क्षेत्र तथा महानगरों की नगरपालिका है सभी अपनी शक्तियां केंद्र से ही प्राप्त करते हैं|

6. बहुराष्ट्रीय समाज –

 एकात्मक शासन होती हुई भी चीन में यह तथ्य स्वीकार किया गया है कि उसका समाज एक बहुल  समाज है |

 वहां कई राष्ट्रीयताये हैं| देश में लगभग 60 जातियां हैं जिनके रीति-रिवाज और संस्कृति को सुरक्षित रखने का आश्वासन दिया गया  है,

चीन में विभिन्न जाति के लोगों को राष्ट्रीय अल्प तम कहा गया जबकि रूस में इन्हें अल्पतम राष्ट्रीयता कहा जाता है |

7. मौलिक अधिकार – 

 चीन के संविधान की एक जोरदार बात यह भी है कि संविधान अपने नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार भी प्रदान करता है|

 अधिकारों में सर्वाधिक उल्लेखनीय है संपत्ति का अधिकार| मेहनत से और वैध उपायों से अर्जित की गई संपत्ति रखने का अधिकार नागरिकों को प्राप्त है
संविधान के अनुच्छेद 38 से 45 तक नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों का वर्णन है |

 संपत्ति के अधिकार की व्यवस्था है परंतु साथ ही संविधान में यह भी कहा गया है कि सार्वजनिक हित के लिए राज्य संपत्ति अधिग्रहित कर सकता है|

संपत्ति के अधिकार के अतिरिक्त चीन में नागरिकों को और भी कई अधिकार दिए गए हैं जैसे - मत देने का अधिकार,  विचार और अभिव्यक्ति का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार,

  काम पाने  का अधिकार,  सामाजिक सुरक्षा का अधिकार,  कानून के समक्ष समानता का अधिकार,  अधिकार केवल दिखावटी हैं

 चीन के संविधान में अधिकारों का उल्लेख किया गया है सविधान में अधिकारों के क्रियान्वयन का कोई उपबंध  नहीं किया गया है|

8. मौलिक कर्तव्य- 

 चीन के संविधान में अधिकारों के साथ कर्तव्य का भी उल्लेख किया गया है किन का संविधान कर्तव्य को और अधिक करता है

कर्तव्य किस सूची में जिन कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है उनमें मुख्य  कर्तव्य है- क़ानून का पालन,  सार्वजानिक सम्पति की रक्षा, करो का भुकतान तथा मातृभूमि की रक्षा  करना |

 प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है कि वह इन कर्तव्यों का सम्मान करें और इनका पालन करें|

9. एक सदनात्मक व्यवस्था- 

चीन में विधि निर्माण सम्बन्धी समस्त शक्तियो  का वार संसद में है| संसद है - राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस इसमें जनता तथा विभिन्न

स्थानीय निकायों व व्यवसायिक संगठनों से प्रतिनिधि चुने जाते हैं 1987 में इस कांग्रेस की सदस्य संख्या 2978 थी|
10. शासन का स्वरूप मंत्रीमंडलात्मक- 

 चीन में शासन का स्वरूप काफी हद तक मंत्रीमण्डलात्मक ही   है यद्यपि चीन  में राष्ट्रपति भी है
और उपराष्ट्रपति भी परंतु कार्यपालिका की वास्तविक शक्तियों का वास प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल में मंत्रिमंडल राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के प्रति उत्तरदाई है

राष्ट्रपति के पति नहीं मंत्रिमंडल के सदस्य संख्या निश्चित नहीं है इसे परिवर्तन होता रहता है|


 राष्ट्रीय जन कांग्रेस के कार्य –

1. कानून निर्माण करने का कार्य करता है
2. प्रधानमंत्री के नाम का प्रस्ताव तो राष्ट्रपति करता है किंतु राष्ट्रपति के नाम निर्देशन के पश्चात राष्ट्रीय जन कांग्रेश उस पर विचार करती  हैं
3. राष्ट्रीय जनवादी कांग्रेस के सदस्यों को मंत्रिपरिषद से प्रश्न पूछने का अधिकार है
4. राष्ट्रीय जन कांग्रेस परिषद के सदस्य को आवश्यकतानुसार परिचित भी कर सकती हैं
5. राष्ट्रीय जन कांग्रेस की स्थाई समिति को परिषद के कार्य की देखभाल करने तथा उसके निर्णय एवं आज्ञपतियों को  संविधान विरूद्ध  होने की स्थिति में रद्द घोषित करने का अधिकार है

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

भारतीय विधि आयोग

विधि आयोग - Law commission of india
विधि आयोग 

परिचय

भारतीय विधि आयोग न तो एक संवैधानिक निकाय है और न ही वैधानिक निकाय। यह भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है। इसका प्रमुख कार्य है, कानूनी सुधारों हेतु कार्य करना।

आयोग का गठन एक निर्धारित अवधि के लिये होता है और यह विधि और न्याय मंत्रालय के लिये परामर्शदाता निकाय के रूप में कार्य करता है।

इसके सदस्य मुख्यतः कानून विशेषज्ञ होते हैं।
भारत में विधि आयोग का इतिहास

उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक से समय-समय पर सरकार द्वारा विधि आयोग गठित किये गए और कानून की उन शाखाओं में जहाँ सरकार को आवश्यकता महसूस हुई, वहाँ स्पष्टीकरण, समेकन और संहिताकरण हेतु विधायी सुधारों की सिफारिश करने के लिये उन्हें सशक्त किया गया।

ऐसा प्रथम आयोग वर्ष 1834 में 1833 के चार्टर एक्ट के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में गठित किया गया था जिसने दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को संहिताबद्ध करने की सिफ़ारिश की।

इसके बाद द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ विधि आयोग, जो क्रमशः वर्ष 1853, 1861 और 1879 में गठित किये गए थे, ने 50 वर्ष की अवधि में उस समय प्रचलित अंग्रेजी क़ानूनों के पैटर्न पर, जिन्हें कि भारतीय दशाओं के अनुकूल किया गया था, की व्यापक किस्मों से भारतीय विधि जगत को समृद्ध किया।

भारतीय नागरिक प्रक्रिया संहिता, भारतीय संविदा अधिनियम, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम आदि प्रथम चार विधि आयोगों का परिणाम हैं।

विधि आयोग के कार्य

विधि आयोग केंद्र सरकार द्वारा इसे संदर्भित या स्वतः किसी मुद्दे पर कानून में शोध या भारत में विद्यमान कानूनों की समीक्षा तथा उनमें संशोधन करने और नया कानून बनाने हेतु सिफारिश करता है।

उन नए क़ानूनों के निर्माण का सुझाव देता है जो नीति-निर्देशक तत्त्वों को लागू करने और संविधान की प्रस्तावना में तय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये आवश्यक हैं।

न्यायिक प्रशासन: कानून और न्यायिक प्रशासन से सम्बद्ध किसी विषय, जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत विशेष रूप से विधि आयोग को संदर्भित किया हो, पर विचार करना और सरकार को इस पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।

शोध: किसी बाहरी देश को शोध उपलब्ध कराने हेतु निवेदन पर विचार करना जिसे कि सरकार ने विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) के मार्फत इसे संदर्भित किया हो।

लैंगिक समानता को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से मौजूदा कानूनों की जाँच करना और उनमें संशोधन सुझाना।

अपनी सिफ़ारिशों को ठोस रूप देने से पहले आयोग नोडल मंत्रालय/विभाग और ऐसे अन्य हितधारकों से परामर्श करता है जिसे कि आयोग इस उद्देश्य के लिये आवश्यक समझे।

विधि आयोग के प्रतिवेदन

भारत के विधि आयोग ने अभी तक विभिन्न मुद्दों पर 277 प्रतिवेदन (Reports) प्रस्तुत किये हैं, उनमें से कुछ अद्यतन प्रतिवेदन हैं: प्रतिवेदन संख्या 277 अनुचित तरीके से मुक़दमा चलाना (अदालत की गलती): कानूनी उपाय

प्रतिवेदन संख्या 272 – भारत में ट्रिब्यूनलों की वैधानिक संरचनाओं का आकलन

प्रतिवेदन संख्या 271 – ह्यूमन DNA प्रोफाइलिंग

प्रतिवेदन संख्या 270 – विवाहों का अनिवार्य
पंजीकरण या अस्वीकार किया जा सकता है। इन सिफ़ारिशों पर कार्यवाही उन मंत्रालयों/विभागों पर निर्भर है जो सिफारिशों की विषय वस्तु से संबंधित हैं।


विधि आयोग में सुधारों की दरकार

20वें विधि आयोग के अध्यक्ष ए.पी. शाह ने विधिआयोग के सुधारो का समर्थन किया था,  जो निम्नलिखित है -

विधिक हैसियत: इस निकाय को स्वायत्त एवं सक्षम बनाने के लिये यह आवश्यक है कि इसे विधिक आयोग का दर्जा दिया जाए।

21वें विधि आयोग का कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गया था, किंतु 22वें विधि आयोग का गठन अभी तक नहीं किया जा सका है।

नियुक्ति: विधि आयोग के सदस्यों की नियुक्ति केवल अध्यक्ष से परामर्श के पश्चात् ही की जानी चाहिये। वर्तमान व्यवस्था में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर कई बार भेदभाव और पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।

स्वायत्तता: वर्तमान व्यवस्था में विधि सचिव तथा विधायी विभाग के सचिव विधि आयोग के पदेन सदस्य होते हैं।

अब तक तीन-वर्षीय कार्यकाल वाले कुल 21 विधि आयोग गठित किये जा चुके हैं, जिनमें से 21वें विधि आयोग की कार्यावधि 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गई,

22 वा विधि आयोग 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के 22वें विधि आयोग के गठन को तीन साल की अवधि के लिए मंजूरी दे दी है।

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बीएस चौहान की निगरानी भारत के 21 वें विधि आयोग की स्थापना 2015 में की गई थी और इसका कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 तक था। पैनल में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, चार पूर्णकालिक सदस्य (एक सदस्य सचिव सहित), कानून और विधायी विभागों के सचिव और पदेन सदस्य होंगे और साथ ही पांच से अधिक अंशकालिक सदस्य नहीं होंगे।